
With the death of Dharmendra, Bollywood has lost its true hero. His simplicity, humanity and legacy of films will always live in the hearts of people.
बॉलीवुड के सुपरस्टार धर्मेन्द्र इस वक्त मुंबई के Breach Candy Hospital में भर्ती हैं और उनका इलाज चल रहा है। उनके बेटे सनी देओल की टीम ने बताया है कि उनकी सेहत में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है और अभी उन्हें चमत्कार की उम्मीद है।
📍मुंबई | 🗓️ 11 नवंबर 2025 | ✍️ Asif Khan
89 साल के धर्मेन्द्र इस वक्त अस्पताल में हैं और उनका लगातार इलाज चल रहा है। ब्रीच कँडी अस्पताल में डॉक्टरों की देख-रेख में उनकी स्थिति स्थिर बताई जा रही है।
उनके परिवार में पत्नी हेमा मालिनी, बेटे सनी देओल और बॉबी देओल सभी मौजूद हैं। हाल ही में अस्पताल के बाहर उन्हें देखा गया था।
बताया जा रहा है कि धर्मेन्द्र की हालत में अब धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। सनी देओल की टीम ने कहा है:
“धर्मेन्द्र सर ठीक हो रहे हैं और इलाज का असर हो रहा है। हम सब उनकी सेहत और लंबी उम्र के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। आप सभी से विनती है कि उनकी लंबी उम्र के लिए दुआ करें।”
हेल्थ अपडेट में यह भी कहा गया है कि उन्हें रिस्पॉन्ड करने में धीमी गति है, लेकिन उन्होंने संकेत दिए हैं और परिवार को उम्मीद है कि यह चमत्कार का मोड़ हो सकता है।
पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में सितारों का आना-जाना लगा हुआ है। ख़बरें थीं कि सलमान खान, शाहरुख खान और गोविंदा जैसे नामचीन सितारे उन्हें देखने आए थे। हालांकि, उस वक्त धर्मेन्द्र ICU में थे और कुछ से मुलाक़ात संभव नहीं हो पाई थी।
यह स्थिति हमें याद दिलाती है कि किसी भी बड़े नाम के पीछे एक इंसान होता है, जिसे हमारी संवेदना और सम्मान की ज़रूरत होती है। गलत-खबरों और अफवाहों की भीड़ में सही जानकारी का इंतजार करना हमारी जिम्मेदारी है। धर्मेन्द्र की सेहत को लेकर मीडिया और फैंस को संयम और सहानुभूति के साथ काम करना चाहिए।
ब्रीच कैंडी अस्पताल से राहत भरी खबर, धर्मेंद्र की सेहत स्थिर और धीरे-धीरे सुधार। परिवार और फैंस
बॉलीवुड के महानायक धर्मेंद्र के स्वास्थ्य को लेकर पिछले कुछ दिनों में हमारी क्षेत्रीय मीडिया और बड़े न्यूज चैनलों पर जो खबरें जोरों-शोरों से चलीं, वे बाद में अफवाह साबित हुईं। हमें इस बात का बड़े अफसोस के साथ एहसास हुआ कि बिना पूरी तरह से और पुष्ट सूचना के हम ऐसी खबरें प्रकाशित कर गए, जिनसे धर्मेंद्र जी के परिवार और उनके प्रशंसकों को मानसिक आघात पहुंचा है।धर्मेंद्र जी का परिवार और उनके करीबी सूत्र साफ तौर पर कह चुके हैं कि वे ठीक हैं और उनका इलाज जारी है। हमने इस प्रकरण में मीडिया की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता को कमजोर कर दिया, जो कि काबिल-ए-ग़ौर प्रतिक्रिया है।
इस संपादकीय के माध्यम से हम स्वयं और अपने सभी सहयोगी पत्रकारों की तरफ से स्पष्ट रूप से माफी मांगते हैं। यह माफी हम धर्मेंद्र जी के परिवार और उनके प्रशंसकों से करते हैं, जिनके विश्वास और समर्पण को हमने अनजाने में ठेस पहुंचाई है। हमने जो गलत रिपोर्टिंग की वह न केवल गैर-जिम्मेदाराना थी, बल्कि असंवेदनशील भी थी।हम यह सुनिश्चित करने का संकल्प लेते हैं कि भविष्य में ऐसी गैर-प्रमाणिक खबरों को फैलाने से बचेंगे। हम परिवार की निजता का सम्मान करते हुए केवल और केवल आधिकारिक सूचनाओं पर आधारित ही समाचार प्रकाशित करेंगे।हम सभी से अपील करते हैं कि धर्मेंद्र जी के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना करें और अफवाहों से बचें। हमारा मकसद सच्चाई को सामने लाना है और हम इसके लिए प्रतिबद्ध हैं।धर्मेंद्र जी के प्रति हमारी शुभकामनाएँ और सम्मान सदैव बरकरार हैं।— Shah Times
यह माफीनामा न केवल गलती स्वीकारता है, बल्कि संवेदनशीलता दिखाते हुए भविष्य में सावधानी बरतने का संकल्प भी देता है। साथ ही परिवार और प्रशंसकों का सम्मान भी करता है, जो इस तरह के मामलों में बेहद महत्वपूर्ण होता है।
शाह टाइम्स एडिटोरियल धर्मेन्द्र की रुख़्सती पर सिनेमा, समाज और इंसानियत के पेचीदा सवालों की तह तक जाता है। इसमें उनके काम की रोशनी, उनकी शख़्सियत की गहराई, इंडस्ट्री की प्रतिक्रिया, और हमारी collective यादों की ज़िम्मेदारी को समझने की कोशिश की गई है।
📍मुंबई
🗓️ 11 November 2025
✍️ Asif Khan
दिल-ओ-दिमाग़ को झकझोरती रुख़्सती: धर्मेन्द्र का सफ़र और सवाल
सिनेमा की दुनिया में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो सिर्फ़ पर्दे पर नहीं रहते, बल्कि हमारे रोज़ के जज़्बात में, हमारी गुफ्तगू में, हमारे घरों की दीवारों पर लगे पुराने पोस्टर्स में, हमारे बुज़ुर्गों की दास्तानों में, और हमारी नस्लों के दरमियान बहती यादों में बस जाते हैं। धर्मेन्द्र का नाम भी इन्हीं में है। आज जब ये ख़बर आई कि 89 साल की उम्र में वो हमसे जुदा हो गए, तो दिल में एक अजीब सी सूँई चुभती महसूस हुई—क्योंकि हीरो बूढ़े हो सकते हैं, मौत की दहलीज़ पर पहुँच सकते हैं, मगर हमारी उम्मीदें अक्सर उन्हें अमर समझ लेती हैं।
लोगों ने कहा कि वो आख़िरी दम तक एक्टिव रहे, सेट्स पर आते, मुस्कुराते, अपने अंदाज़ में हल्की सी शरारत करते। लेकिन क्या हम कभी समझ पाए कि इतने लंबे सफ़र में उन्होंने अपने भीतर क्या-क्या सहा होगा? शोहरत का बोझ, परिवार की जद्दोजहद, इंडस्ट्री की बेरहम उम्मीदें—ये सब किसी भी इंसान को थका देते हैं। हम पर्दे पर देखते हैं कि “ही-मैन” सब संभाल लेता है, मगर असल ज़िंदगी में सांस की कमी, थकान, कमजोरी—ये सब हीरो को भी इंसान बना देती हैं।
हॉस्पिटल के बाहर जो भीड़ जमा हुई, उसमें दुआएं भी थीं और डर भी। शाहरुख खान, सलमान खान, गोविंदा—सब दौड़े आए। किसी की आंखें नम थीं, किसी को यक़ीन नहीं हो रहा था। ये सब देखकर एक सवाल भी उभरता है: क्या इंसान की क़ीमत तब ही समझ आती है जब वो हमारे हाथ से फिसल रहा हो? जिंदगी भर हम उनके काम पर तालियाँ बजाते रहे, उनके डायलॉग दोहराते रहे—“बसंती, इन कुत्तों के आगे मत नाचना”—मगर शायद हमने कभी उनके दर्द के पीछे के इंसान को देखने की कोशिश नहीं की।
एक बात कही जाती है, “शौहरत एक चिराग़ है, और चिराग़ की रौशनी जितनी चमकीली हो, उसकी तन्हाई उतनी गहरी होती है।” धर्मेन्द्र की ज़िन्दगी भी कभी-कभी यही लगती थी—चमकदार, मगर तन्हा। वो सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे जो मास, क्लास और दिल—तीनों का संगम थे। हिंदी में उनकी जड़ों की महक थी, उर्दू की नज़ाकत थी और इंग्लिश में एक हल्की सी playful ठाठ। उनकी dialogues delivery में rustic honesty थी, जो आज के digital age में शायद कम होती जा रही है।
जब हेमा मालिनी ने सोशल मीडिया पर उनकी मुस्कुराती तस्वीर पोस्ट की और दुआ की अपील की, तो उसमें एक पत्नी का दर्द, एक साथी की लाचारी और एक लंबी साझेदारी की कहानी छुपी थी। सोशल मीडिया की दुनिया तो अक्सर façade बनाती है, लेकिन उस पोस्ट में असली इंसानी गर्मी थी। कोई भी रिश्ते की उम्र 50+ साल से गुजरते-गुजरते patina-सी चमक ले आती है—और वो चमक तस्वीर में साफ दिख रही थी।
अब चलिए उनकी फिल्मों की बात करें। सात दशकों में 300 से ज़ियादा फिल्में करना सिर्फ़ quantity नहीं है—ये stamina है, जुनून है, commitment है। शोले, चुपके-चुपके, धरमवीर—हर फिल्म में वो अलग रंग में नज़र आए। कॉमेडी में effortless timing, action में raw power, romance में underplayed charm—ये versatility आज की commercialised industry मुश्किल से बना पाएगी। उन्होंने कभी producers के pressure में अपने values नहीं छोड़े। अगर ये बात आज के self-conscious stars सुनें, तो शायद सीख लें कि long-term respect सिर्फ़ PR से नहीं, character से मिलता है।
लेकिन editorial का काम just praise करना नहीं होता, सवाल उठाना भी होता है। तो सवाल ये है: क्या इंडस्ट्री ने उनकी उम्रदराज़ी के दौर में उन्हें वो dignity दी जिसके वो हक़दार थे? या फिर वह भी उस same pattern का शिकार बने, जिसमें legends को सिर्फ nostalgia की चीज़ बना दिया जाता है? उनकी आख़िरी फिल्में देखकर ऐसा लगता था कि उनका दिल अब भी अभिनय में पूरी तरह लगा हुआ था, मगर आसपास की दुनिया उतनी receptive नहीं रही। क्या हमारी society बूढ़े कलाकारों को gracefully age करने देती है, या उन्हें एक relic की तरह showcase करती है?
अक्सर कहा जाता है—”We love our legends only when they stop challenging us.” ये बात धर्मेन्द्र पर भी लागू होती है। जब तक वो हमारी youth-culture की comfort zone में फिट होते रहे, हम उन्हें celebrate करते रहे। जैसे ही उम्र ने उन्हें slow किया, हमने उन्हें एक safe memory box में रख दिया।
इन सबके बावजूद, उनकी legacy इतनी विशाल है कि किसी भी critic को खामोश कर देती है। पंजाब से निकलकर बॉलीवुड के golden era तक पहुंचना आसान नहीं था। उस दौर में फिल्मी दुनिया में जगह बनाना, survive करना और फिर decades तक relevance बनाए रखना—ये सिर्फ talent नहीं, grit भी मांगता है। उनके अंदर एक earthy sincerity थी जो कैमरे से भी ज़्यादा audience को feel होती थी।
आज जब हम उनकी मौत की खबर सुनते हैं, तो एक collective खालीपन उभरता है। उर्दू में कहा जाता है—“जब कोई बड़ा आदमी जाता है, तो शहर का इक हिस्सा उजड़ जाता है।” आज यही हुआ।
मैं एक और perspective रखता हूँ जिसे शायद लोग uncomfortable समझें—क्या हम death को romanticize करते हैं? एक उम्रदराज़ कलाकार की ज़रूरत होती है privacy की, care की, dignity की। लेकिन जैसे ही खबर फैली, मीडिया की lens हॉस्पिटल की ओर दौड़ गई। कैमरे, flashes, breaking-tag—ये सब उस moment की sanctity का violation हैं। क्या ये respect है? या फिर voyeurism? हमें इस पर भी सोचने की जरूरत है।
धर्मेन्द्र की दुनिया अब यादों में है, लेकिन उनकी कहानी का सबक future artists के लिए clear होना चाहिए—stardom हमेशा नहीं रहता, लेकिन sincerity और humility अमर रहते हैं।
यही बात सरल शब्दों में: “Greatness is not in fame, it’s in humanity.”
उनकी इंसानियत ही उनकी सबसे बड़ी फोटो-स्टोरी थी।






