
100 मीटर अरावली पर्वतमाला परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट में उठे सवाल
अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार और उसकी गठित समिति के बीच मतभेद सामने आए हैं। 100 मीटर ऊंचाई आधारित परिभाषा पर वैज्ञानिक, कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर सवाल उठे हैं।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
अरावली की परिभाषा पर विवाद की पृष्ठभूमि
अरावली पर्वतमाला की भौगोलिक पहचान और इसकी कानूनी परिभाषा को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। यह पर्वतमाला गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। हाल के महीनों में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित 100 मीटर ऊंचाई आधारित परिभाषा पर सवाल उठे हैं।
नई परिभाषा में क्या प्रस्तावित है
केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अदालत के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि स्थानीय जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली माना जाए। इसके अनुसार यदि दो या उससे अधिक ऐसी पहाड़ियां 500 मीटर के दायरे में हों, तो उनके बीच की भूमि भी अरावली क्षेत्र में शामिल होगी।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में इस परिभाषा को स्वीकार किया। अदालत ने कहा कि एक समान और स्पष्ट मानक तय करना आवश्यक है, ताकि सभी राज्यों में नियमों का समान रूप से पालन हो सके। अदालत के अनुसार, यह परिभाषा प्रशासनिक स्तर पर स्पष्टता लाने का प्रयास है।
सीईसी की आपत्ति
हालांकि, सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने इस परिभाषा का समर्थन नहीं किया। समिति ने स्पष्ट किया कि उसने इस प्रस्ताव की न तो समीक्षा की और न ही इसे औपचारिक मंजूरी दी। समिति का कहना था कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा 2010 में सुझाई गई परिभाषा अधिक वैज्ञानिक और व्यापक है।
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की परिभाषा
एफएसआई की परिभाषा के अनुसार, अरावली क्षेत्र की पहचान में ऊंचाई के साथ-साथ ढलान, पहाड़ी का आधार और आसपास का बफर क्षेत्र भी शामिल होना चाहिए। रिपोर्ट में कम से कम तीन डिग्री ढलान और पहाड़ी के आधार से 100 मीटर तक के क्षेत्र को संरक्षित मानने की सिफारिश की गई थी।
एमिकस क्यूरी की दलील
अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी ने 100 मीटर की परिभाषा को अस्पष्ट बताया। उनका कहना था कि इससे बड़ी संख्या में छोटी पहाड़ियां अरावली की सीमा से बाहर हो जाएंगी, जिससे खनन और निर्माण गतिविधियों के लिए रास्ता खुल सकता है।
खनन को लेकर आशंकाएं
अरावली क्षेत्र में लंबे समय से अवैध खनन की शिकायतें रही हैं। 1990 के दशक से केंद्र और राज्य सरकारों ने खनन पर कई प्रतिबंध लगाए, लेकिन इसके बावजूद विभिन्न इलाकों में नियमों के उल्लंघन के मामले सामने आए। 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के कुछ जिलों में खनन पर पूर्ण रोक लगाई थी।
मई 2024 का आदेश
मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली रेंज में नई खनन लीज जारी करने और पुराने परमिट के नवीनीकरण पर रोक लगा दी। अदालत ने सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी को विस्तृत अध्ययन कर सिफारिशें देने का निर्देश दिया था।
सीईसी की सिफारिशें
सीईसी ने मार्च 2024 में अपनी रिपोर्ट में सभी राज्यों में अरावली की वैज्ञानिक मैपिंग, पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन और संवेदनशील इलाकों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध की सिफारिश की। इसमें जल स्रोत, वन क्षेत्र और वन्यजीव गलियारों को संरक्षित रखने पर जोर दिया गया।
ग्रीन वॉल परियोजना
जून 2025 में केंद्र सरकार ने अरावली ग्रीन वॉल परियोजना की शुरुआत की। इस परियोजना का उद्देश्य अरावली के पांच किलोमीटर बफर जोन में हरियाली बढ़ाना है। सरकार के अनुसार, इससे खराब हो चुकी भूमि को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी।
राज्यों के अलग-अलग नियम
गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में अरावली की पहचान के लिए अलग-अलग मानक अपनाए जाते रहे हैं। यही कारण है कि एक समान परिभाषा तय करने की आवश्यकता महसूस की गई।
वैज्ञानिकों की राय
वैज्ञानिकों का कहना है कि अरावली एक प्राचीन पर्वतमाला है और इसकी ऊंचाई मापने के लिए समुद्र तल को आधार बनाना अधिक उपयुक्त होगा। उनका तर्क है कि जमीन की सतह समय के साथ बदलती रहती है, जिससे स्थानीय माप में अंतर आ सकता है।
पर्यावरणीय महत्व
अरावली को थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार माना जाता है। यह जलवायु संतुलन, जैव विविधता और भूजल रिचार्ज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अवैध निर्माण और गैर वानिकी कार्य
अरावली क्षेत्र में फार्म हाउस, रिसॉर्ट, मंदिर और अन्य निर्माणों की संख्या बढ़ी है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, कई निर्माण बिना अनुमति के किए गए हैं, जिससे हरियाली और वन्यजीवों पर असर पड़ा है।
वन्यजीवों पर प्रभाव
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कुछ इलाकों में तेंदुआ, लकड़बग्घा, सियार और अन्य प्रजातियों की संख्या दर्ज की गई है। निर्माण गतिविधियों के कारण इनके प्राकृतिक आवास प्रभावित हुए हैं।
कोर्ट के अन्य निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे अरावली क्षेत्र के लिए सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान तैयार करने का निर्देश दिया है। इसमें पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन, क्षतिग्रस्त क्षेत्रों की बहाली और संवेदनशील इलाकों की मैपिंग शामिल होगी।
आगे की प्रक्रिया
अब निगाहें इस बात पर हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें अदालत के निर्देशों और समिति की सिफारिशों को किस तरह लागू करती हैं। अरावली की परिभाषा और संरक्षण से जुड़े फैसले आने वाले समय में पर्यावरण प्रबंधन की दिशा तय करेंगे।






