
Geopolitical tension between the US and Iran reshaping the Middle East #Shah Times
ईरान पर दबाव, अरब दूरी और डोनाल्ड ट्रंप की मुश्किल राह
खाड़ी का इनकार और वॉशिंगटन की रणनीतिक उलझन
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को खुली चेतावनी, खाड़ी देशों की दूरी और जॉर्डन का मुमकिन किरदार ने मिडिल ईस्ट की सियासत को एक नए, असहज मोड़ पर ला खड़ा किया है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
ईरान पर दबाव बनाने की अमेरिकी कोशिशें तेज हैं, लेकिन सऊदी अरब, यूएई और कतर का एयरस्पेस न देने का फैसला ट्रंप प्रशासन की रणनीति को कमजोर कर रहा है। जॉर्डन एक मुमकिन साझेदार के तौर में उभर रहा है। सवाल यह है कि धमकी, सैन्य दबाव और बातचीत के बीच कौन सा रास्ता क्षेत्र को स्थिरता देगा।
चेतावनी का लहजा और कूटनीति की कसौटी
डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को दी गई ताजा चेतावनी सिर्फ एक बयान नहीं है। यह उस सोच का इजहार है जिसमें दबाव को बातचीत का सबसे तेज औजार माना जाता है। वॉशिंगटन का संदेश साफ है कि समझौता करना होगा, वरना अंजाम और सख्त होगा। लेकिन सवाल उठता है कि क्या हर बार धमकी ही बात आगे बढ़ाती है। पड़ोस के एक आम घर की मिसाल लें। जब हर बातचीत दरवाजे पर दस्तक नहीं बल्कि दीवार तोड़ने की धमकी से शुरू हो, तो भरोसा कैसे बनेगा।
सैन्य ताकत का प्रदर्शन और उसका मनोविज्ञान
विशाल नौसैनिक बेड़े की बात, अब्राहम लिंकन जैसे जहाज का जिक्र और पिछली कार्रवाई की याद दिलाना, यह सब मनोवैज्ञानिक दबाव का हिस्सा है। यह संदेश दिया जा रहा है कि क्षमता मौजूद है और इरादा भी। लेकिन इतिहास बताता है कि ताकत का प्रदर्शन कई बार सामने वाले को झुकाने के बजाय और सख्त बना देता है। ईरान की राजनीति सिर्फ सैन्य गणित से नहीं चलती। वहां इज्जत, प्रतिरोध और आंतरिक वैधता का सवाल भी जुड़ा है।
खाड़ी देशों की दूरी, बदली हुई हकीकत
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर का एयरस्पेस न देने का फैसला एक संकेत है कि क्षेत्रीय प्राथमिकताएं बदल रही हैं। ये देश अब हर अमेरिकी रणनीति का हिस्सा बनने को तैयार नहीं दिखते। इनके सामने अपनी सुरक्षा, अपनी अर्थव्यवस्था और अपने समाज का सवाल है। वे नहीं चाहते कि उनका इलाका किसी बड़े युद्ध का मैदान बने। यह दूरी वॉशिंगटन के लिए झटका है, लेकिन खाड़ी के नजरिए से यह सावधानी है।
जॉर्डन की उभरती भूमिका
जब बड़े खिलाड़ी पीछे हटते हैं, तब अक्सर मध्यम आकार के देश निर्णायक बन जाते हैं। जॉर्डन का नाम इसी संदर्भ में सामने आता है। वहां अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पहले से है, तकनीकी ढांचा है और राजनीतिक तौर पर वह खुद को संतुलनकारी शक्ति मानता है। लेकिन जॉर्डन के लिए भी यह आसान फैसला नहीं। एक तरफ सहयोग का दबाव है, दूसरी तरफ घरेलू स्थिरता और क्षेत्रीय प्रतिक्रिया का डर।
ऑपरेशन मिडनाइट हैमर की छाया
पिछले सैन्य अभियान का जिक्र बार बार इसलिए होता है क्योंकि वह एक मिसाल बन चुका है। तेजी, गोपनीयता और सटीकता, इन सबका प्रदर्शन किया गया। लेकिन हर मिसाल दो तरफा होती है। एक तरफ यह ताकत दिखाती है, दूसरी तरफ अविश्वास को गहरा करती है। ईरान के भीतर इसे सबूत के तौर पर पेश किया गया कि बाहरी दबाव के आगे झुकना खतरनाक है।
बातचीत की टेबल और उसकी शर्तें
ट्रंप प्रशासन बार बार कहता है कि दरवाजा खुला है। लेकिन यह दरवाजा किन शर्तों पर खुलता है, यह अहम है। बिना परमाणु हथियार के समझौते की बात सुनने में ठीक लगती है, मगर ईरान इसे अपनी संप्रभुता से जोड़कर देखता है। किसी दोस्त के साथ भी अगर बातचीत इस अंदाज में हो कि पहले हथियार नीचे रखो, फिर बात होगी, तो भरोसा कमजोर पड़ता है।
आंतरिक ईरान और बाहरी नजर
ईरान के भीतर विरोध प्रदर्शन, आर्थिक दबाव और सत्ता के खिलाफ आवाजें एक जटिल तस्वीर बनाती हैं। बाहर से देखने पर यह एक मौका लगता है, लेकिन अंदर से यह संवेदनशील क्षण है। बाहरी दखल का आभास इन आंदोलनों को कमजोर भी कर सकता है। इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है कि आंतरिक असंतोष, बाहरी दबाव के कारण राष्ट्रवादी रंग ले लेता है।
अमेरिका की रणनीतिक दुविधा
वॉशिंगटन एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर रास्ते में जोखिम है। हमला करता है तो क्षेत्रीय युद्ध का खतरा, इंतजार करता है तो दबाव कमजोर पड़ने का डर। खाड़ी देशों की दूरी ने यह साफ कर दिया है कि पुरानी गठबंधनों की भाषा अब उतनी प्रभावी नहीं रही। दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है और हर खिलाड़ी अपनी शर्तें रख रहा है।
शक्ति, नैतिकता और जिम्मेदारी
सुपरपावर होने का मतलब सिर्फ ताकत दिखाना नहीं, बल्कि परिणामों की जिम्मेदारी लेना भी है। मध्य पूर्व पहले ही संघर्षों से थका हुआ है। आम लोग स्थिरता चाहते हैं, रोजमर्रा की जिंदगी में सुकून चाहते हैं। हर नई धमकी, हर सैन्य तैयारी इस सुकून को और दूर करती है। यहां नैतिक सवाल उठता है कि क्या दबाव का यह रास्ता सच में शांति लाएगा।
वैकल्पिक रास्ते और कठिन सवाल
एक विकल्प यह है कि दबाव के साथ साथ भरोसे के छोटे कदम उठाए जाएं। मानवीय राहत, सीमित प्रतिबंधों में ढील, क्षेत्रीय संवाद जैसे उपाय। ये तुरंत नतीजा नहीं देंगे, लेकिन जमीन तैयार कर सकते हैं। सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि क्षेत्र कब हारे बिना बचेगा।
नतीजे की जगह एक खुला अंत
ट्रंप की चेतावनी, खाड़ी देशों का इनकार और जॉर्डन की संभावित भूमिका, यह सब मिलकर एक अनिश्चित कहानी बनाते हैं। यह कहानी अभी लिखी जा रही है। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि मध्य पूर्व एक और टकराव की ओर जाएगा या मुश्किल लेकिन जरूरी बातचीत की तरफ। इतिहास गवाह है कि ताकत से रास्ता बन सकता है, लेकिन टिकाऊ पुल अक्सर संवाद से ही बनते हैं।




