
US tariff move on solar imports and its impact on Indian companies – Shah Times
अमेरिका का टैरिफ वार: डोनाल्ड ट्रंप का सोलर दांव
अमेरिका ने भारत, इंडोनेशिया और लाओस से आने वाले सोलर सेल और पैनल पर भारी काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगाने का ऐलान किया है। भारत पर सामान्य दर 125 प्रतिशत से ज्यादा तय की गई है। यह कदम विदेशी सब्सिडी के प्रभाव को संतुलित करने के नाम पर उठाया गया है। फैसले का असर ग्लोबल सप्लाई चेन, एशियाई निर्यातकों और भारतीय कंपनियों पर पड़ सकता है। सवाल यह है कि क्या यह घरेलू उद्योग की हिफाजत है या नई ट्रेड जंग की शुरुआत।
डोनाल्ड ट्रंप की सोलर ट्रेड पर सख्ती, भारतीय कंपनियों पर असर
ट्रंप का टैरिफ कार्ड फिर मेज पर
अमेरिका की सियासत में जब भी दबाव बढ़ता है, ट्रेड पॉलिसी अक्सर सबसे पहले बदलती है। सुप्रीम कोर्ट से झटका मिलने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तेजी से टैरिफ का पत्ता खोला है, वह महज इत्तेफाक नहीं लगता। सोलर सेक्टर पर 125 प्रतिशत से ज्यादा काउंटरवेलिंग ड्यूटी लगाना सिर्फ इकॉनमिक फैसला नहीं, बल्कि एक साफ पॉलिटिकल मैसेज भी है।
ट्रंप का दावा है कि विदेशी सब्सिडी अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचा रही थी। सवाल यह है कि क्या हर सस्ती चीज गलत सब्सिडी का नतीजा होती है। अगर कोई देश बेहतर सप्लाई चेन, कम लेबर कॉस्ट और स्केल की वजह से सस्ता उत्पादन कर रहा है, तो क्या उसे भी पेनलाइज किया जाना चाहिए।
घरेलू उद्योग की हिफाजत या ग्लोबल दबाव
अमेरिकी वाणिज्य विभाग का कहना है कि भारत, इंडोनेशिया और लाओस से आने वाले सोलर प्रोडक्ट्स को ऐसी सरकारी मदद मिल रही थी जिससे वे कम कीमत पर बिक रहे थे। घरेलू निर्माता खुद को पीछे महसूस कर रहे थे।
यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है। कोई भी देश अपने उद्योग को बचाना चाहता है। लेकिन ट्रेड की दुनिया इतनी सीधी नहीं होती। अगर टैरिफ बहुत ज्यादा बढ़ा दिए जाएं, तो कीमतें भी बढ़ती हैं। और जब सोलर पैनल महंगे होंगे, तो अमेरिका में ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन की रफ्तार पर भी असर पड़ सकता है।
एक आम उपभोक्ता के नजरिए से सोचिए। अगर आपके घर की छत पर सोलर लगाने का खर्च अचानक 20 या 30 प्रतिशत बढ़ जाए, तो आप दो बार सोचेंगे। यही दुविधा अब अमेरिकी मार्केट में भी सामने आ सकती है।
भारत के लिए यह कितना बड़ा झटका
भारत पर 125 प्रतिशत से ज्यादा की सामान्य दर तय की गई है। यह आंकड़ा अपने आप में सख्त संदेश देता है। बीते साल अमेरिका ने भारत से सैकड़ों मिलियन डॉलर के सोलर इंपोर्ट किए। सप्लाई चेन का बड़ा हिस्सा एशिया से आता है।
भारतीय कंपनियों के लिए यह फैसला सीधा असर डाल सकता है। जिन कंपनियों ने एक्सपोर्ट मार्केट को ध्यान में रखकर प्लांट लगाए, उनके ऑर्डर स्लो हो सकते हैं। शेयर मार्केट में उतार चढ़ाव दिख सकता है।
लेकिन हमें यह भी पूछना चाहिए कि क्या भारत ने अपनी रणनीति में अमेरिका पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया। क्या डाइवर्सिफिकेशन की कोशिशें पर्याप्त थीं। यूरोप, अफ्रीका और घरेलू मार्केट पर कितना ध्यान दिया गया।
सब्सिडी का सच और सियासी बयान
सब्सिडी शब्द सुनते ही एक तरह की निगेटिव इमेज बन जाती है। लेकिन हर देश किसी न किसी रूप में अपने उद्योग को मदद देता है। अमेरिका खुद भी टैक्स इंसेंटिव और प्रोडक्शन सपोर्ट देता रहा है।
तो फिर असली मुद्दा क्या है। असली मुद्दा यह है कि ग्लोबल सप्लाई चेन में किसका कंट्रोल रहेगा। सोलर टेक्नोलॉजी आने वाले दशकों की पावर पॉलिटिक्स तय कर सकती है। जो देश मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी में आगे होगा, वही मार्केट की शर्तें तय करेगा।
ट्रंप का यह कदम शायद घरेलू वोटर को यह दिखाने के लिए भी है कि वह अमेरिकी फैक्ट्री और जॉब्स के साथ खड़े हैं।
क्या यह नई ट्रेड जंग की शुरुआत
पहले भी एशियाई देशों पर सोलर टैरिफ लगाए गए थे और इंपोर्ट में गिरावट आई थी। अब भारत, इंडोनेशिया और लाओस की बारी है।
अगर ये देश जवाबी कदम उठाते हैं, तो मामला और उलझ सकता है। ट्रेड जंग में अक्सर दोनों पक्षों को नुकसान होता है। इतिहास गवाह है कि ज्यादा टैरिफ लंबी अवधि में महंगाई और अनिश्चितता बढ़ाते हैं।
भारत को भी संतुलन बनाना होगा। एक तरफ वह ग्रीन एनर्जी में लीडर बनना चाहता है, दूसरी तरफ एक्सपोर्ट मार्केट पर निर्भरता है। क्या घरेलू मांग इतनी मजबूत है कि वह बाहरी झटकों को संभाल सके।
भारतीय कंपनियों के सामने विकल्प
पहला विकल्प है लागत घटाना और वैल्यू एडिशन बढ़ाना। अगर टेक्नोलॉजी में बढ़त मिले, तो सिर्फ कीमत पर मुकाबला करने की जरूरत नहीं रहती।
दूसरा रास्ता है नए मार्केट तलाश करना। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में सोलर की बड़ी संभावनाएं हैं। वहां की एनर्जी जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं।
तीसरा पहलू यह है कि भारत अपने यहां सोलर इंस्टॉलेशन को और तेज करे। जब घरेलू डिमांड मजबूत होगी, तो एक्सपोर्ट पर निर्भरता कम होगी।
ग्रीन एजेंडा और ग्राउंड रियलिटी
अमेरिका खुद क्लीन एनर्जी को बढ़ावा देने की बात करता है। ऐसे में सोलर इंपोर्ट पर भारी ड्यूटी लगाना कुछ लोगों को विरोधाभास लग सकता है।
लेकिन पॉलिसी हमेशा आदर्श और हितों के बीच संतुलन ढूंढती है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि मजबूत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के बिना ग्रीन एजेंडा अधूरा है।
यहां सवाल यह नहीं कि कौन सही है और कौन गलत। असली सवाल यह है कि क्या यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ है।
आगे का रास्ता
यह फैसला अभी प्रारंभिक है। अंतिम निर्णय आने बाकी हैं। लेकिन संकेत साफ है कि आने वाले समय में ट्रेड पॉलिसी और सख्त हो सकती है।
भारत को भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय रणनीतिक सोच की जरूरत है। अगर हम हर टैरिफ को सिर्फ सियासी कदम मानकर नजरअंदाज करेंगे, तो असली चुनौती समझ नहीं पाएंगे।
सच यह है कि ग्लोबल ट्रेड अब सिर्फ सस्ती खरीद फरोख्त का खेल नहीं रहा। यह टेक्नोलॉजी, सप्लाई चेन और जियोपॉलिटिक्स का मिश्रण बन चुका है।
एक समझदार कारोबारी की तरह भारत को भी अपने कार्ड सोच समझकर खेलने होंगे। कभी आक्रामक, कभी संयमित। यही असली इम्तिहान है।






