
श्रीनगर नौगाम धमाका और जैश मॉड्यूल की गहराई
पुलिस स्टेशन ब्लास्ट और आतंक नेटवर्क की नई कड़ी
📍श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर🗓️15 नवम्बर 2025✍️Asif Khan
नौगाम पुलिस स्टेशन में हुआ घातक धमाका नौ पुलिसकर्मियों की शहादत, दर्जनों घायल सिर्फ एक हादसा नहीं बल्कि उस बड़े जाल की निशानदेही भी है जो पिछले महीनों से हरियाणा, कश्मीर और दिल्ली में सामने आ रहा है। यह विश्लेषण पूरी कड़ी को जोड़ते हुए बताता है कि असल खतरा कहाँ गहराता दिख रहा है।
नौगाम पुलिस स्टेशन में हुआ धमाका सिर्फ एक ख़बर नहीं था—यह पूरे सुरक्षा ढांचे को झकझोरने वाली वह चीख थी जो घाटी की खामोशी को दूर तक चीर गई।
नौ पुलिसकर्मियों की शहादत, दर्जनों घायल, और मलबे में दबे कई सवाल। यह घटना अपने भीतर बहुत कुछ छुपाए बैठी है—तकनीकी त्रुटि से लेकर संगठित नेटवर्क तक, accidental ignition से लेकर संभव hybrid-play तक।
धमाके की पहली तस्वीर: हादसा या हलचल की निशानी?
जिस वक्त फोरेंसिक टीम और पुलिस अमोनियम नाइट्रेट का सैंपल ले रही थी, अचानक एक तेज़ चिंगारी ने पूरे compound को आग और धुएँ की दीवार में बदल दिया। CCTV फुटेज में दिखता है कि blast एक बिंदु से शुरू होकर पूरे स्टेशन में फैल गया।
कुछ अधिकारियों का दावा है कि यह पूरी तरह accidental था—handling error, sealing error या static discharge।
“जहाँ धुआँ होता है, वहाँ आग भी होती है—और इस आग की तह में कई स्तर हैं।”
कई विशेषज्ञ इस angle को कमजोर मानते हैं। उनका कहना है कि explosion की तीव्रता सिर्फ mishandling से नहीं आती।
English में एक सीधी बात है:
“The scale of the blast raises more questions than answers.”
अगर primary ignition सामान्य होती, तो secondary detonation इतनी विशाल नहीं होती। इससे यह इशारा मिलता है कि material hyper-sensitive या unstable state में रहा होगा—या शायद उसे जानबूझकर उस स्थिति में छोड़ा गया होगा।
फरीदाबाद–कश्मीर–दिल्ली: तीन शहर, एक नेटवर्क?
यह coincidence नहीं हो सकता कि:
फ़रीदाबाद से 360 किलो ammonium nitrate बरामद हुआ
फिर उसी शहर से 2900 किलो का दूसरा भंडार मिला
लिंक मिला जैश-ए-मोहम्मद मॉड्यूल से
दिल्ली में Red Fort blast हुआ
और कश्मीर में उन्हीं डॉक्टरों और पेशेवरों के पोस्टर लगे जो radical chain का हिस्सा बताए गए
“ये सारे धागे आपस में बंधे हुए नज़र आते हैं, जैसे किसी बड़े नक़्शे की बारीक लकीरें।”
नौगाम blast उसी लकीर पर खींची गई एक गाढ़ी, भयानक रेखा है।
इस पूरे नेटवर्क में सबसे ध्यान देने वाली बात है educated radicalisation।
Doctर, इंजीनियर, यूनिवर्सिटी लिंक—यह कोई ordinary militant pattern नहीं है।
ये लोग करते हैं scientific-grade planning, encrypted communication, और low-visibility movements।
यही वजह है कि Faridabad से आया material नौगाम स्टेशन में routine check से ज़्यादा एक larger blueprint का हिस्सा लगता है।
पढ़े-लिखे आतंकी: नया चेहरा, नई रणनीति
कभी valley में militancy rugged fighters से जुड़ी होती थी। अब माहौल बदल रहा है।
अब वो लोग शामिल हैं जो research papers भी पढ़ते हैं और IED manuals भी।
जिनकी आँखों में modernity है और दिमाग़ में radical ideology।
जिन्हें AI tools, chemical interactions और surveillance blind-spots की समझ है।
“This is not traditional insurgency; this is technocratic terrorism.”
अदील अहमद राठेर इसका practical नमूना है—
पोस्टर, online propaganda, IED capability और symbolic threats।
एक तरफ educated image, दूसरी तरफ underground plotting।
यही dual identity agencies को confuse करती है।
“जब दहशत की राह इमानदार पेशों से निकलती है, तो समाज का हर हिस्सा खतरे में आ जाता है।”
क्या blast सुरक्षा ढांचे की थकावट का संकेत है?
Security grid पर pressure पिछले दो महीनों में बेतहाशा बढ़ा है—
दिल्ली blast
Faridabad recoveries
दक्षिण कश्मीर में small-scale attempts
border sector में movements
और valley में narrative warfare
ऐसे हालात में अक्सर एक चीज़ उभरती है: fatigue.
Fatigue से vigilance घटती है और procedural rigor ढीला पड़ता है।
कभी-कभी accident भी उसी ecosystem में होते हैं जहाँ risk पहले से high होता है।
इसलिए यह कहना कि blast सिर्फ mishandling था, एक अधूरी तस्वीर पेश करता है।
क्योंकि mishandling भी उसी वातावरण में जन्म लेती है जहाँ systems stretched हों।
IED वाली जब्त कार: असली मोड़
नौगाम थाना परिसर में एक जब्त कार खड़ी थी जिसे allegedly IED से जोड़ने की प्रक्रिया का angle सामने आया।
कुछ अधिकारी इसे पूरी तरह rumor बताते हैं।
कुछ अंतर-एजेंसी सोर्स कहते हैं कुछ components देखे गए थे।
“If the car angle is true, the blast becomes more than an accident.”
क्योंकि तब यह possibility खुलती है कि primary ignition planned या unplanned दोनों तरह का हो सकता है, मगर उसका fallout far bigger था।
यह angle investigation का सबसे critical हिस्सा है।
घाटी का सामाजिक मनोविज्ञान: डर, संदेह और खाली जगहें
Blast के बाद valley में एक ही सवाल चला:
“अगर पुलिस स्टेशन safe नहीं, तो कौन safe है?”
इसी perception को extremist groups exploit करते हैं।
“दहशत का सबसे बड़ा हथियार डर नहीं, बल्कि बेयक़ीनी होती है।”
अगर administration narrative पर control खोता है, तो मॉड्यूल ताकत पाता है।
Shah Times की जिम्मेदारी यहाँ है—noise और narrative के बीच फर्क करना।
Counterpoint: क्या हम ज़रूरत से ज़्यादा पढ़ रहे हैं?
कुछ लोग कहते हैं:
— material पहले से police custody में था
— external intrusion zero
— forensic mishandling documented है
इसलिए इसे terror plotting से जोड़ना over-analysis है।
लेकिन इस argument में दो gaps हैं:
अगर यह mishandling थी, तो protocol इतना weak क्यों था?
क्या ये coincidence है कि Faridabad chain और दिल्ली blast के बीच यह हुआ?
“Accidents reveal systemic weaknesses, and weaknesses fuel future attacks.”
इसलिए यह सिर्फ accident नहीं माना जा सकता।
Strategic implications: आगे क्या बदलना होगा
यह blast हमें बताता है कि:
• material storage policy outdated है
• inter-state mapping ढीला है
• educated radicalisation मुख्य खतरा है
• terror logistics अब multi-city हो चुके हैं
• Kashmir और Haryana के बीच अनदेखा corridor काम कर रहा है
• hybrid modules पहले probing attacks करते हैं, फिर बड़े operations
“ये कोई तात्कालिक हलचल नहीं, बल्कि एक लंबी लड़ाई का शुरुआती सफ़ा है।”
सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के सामने असल चुनौती
यहाँ दो parallel fights हैं:
ठोस नेटवर्क
फैलता हुआ narrative
पहला fight bullets और intelligence से जीता जाता है।
दूसरा fight facts और clarity से।
Shah Times का editorial stance साफ़ है:
घाटी को दहशत से ज़्यादा ambiguity डरा रही है।
जब तक agencies यह नहीं बताएंगी कि असली गलती कहाँ हुई, distrust बढ़ेगा।
नौगाम blast हमें क्या सिखाता है?
— खतरा बहुस्तरीय है
— educated radicalisation असली दानव है
— policing को technology की समझ चाहिए
— material handling protocol को overhaul चाहिए
— terror networks अब multi-state chemical supply chains चला रहे हैं
— और सबसे महत्वपूर्ण, systems fatigue सबसे बड़ी vulnerability है
आख़िरी बात:
“दुश्मन हमेशा बाहर नहीं होता, कभी वो हमारी कमज़ोरियों में छुपा होता है।”
घाटी ने पहले भी कठिन दिनों को झेला है और आगे भी झेल लेगी।
लेकिन अगर हम इस blast को सिर्फ हादसा कहकर छोड़ देंगे, तो एक बड़ी गलती कर बैठेंगे।
This is a wake-up call.
Ignore it, and the next blast won’t wait.
जम्मू-कश्मीर के नौगाम थाने में हुए विस्फोट ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया, जहां कम से कम नौ लोगों की जान चली गई। जम्मू-कश्मीर के डीजीपी नलिन प्रभात ने प्रेस ब्रीफिंग में साफ किया कि यह एक दुर्घटना थी और घटना को लेकर किसी तरह की अटकलों की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार, जब्त किए गए विस्फोटक की सैंपलिंग के दौरान यह धमाका हुआ, जिसमें जांच टीम का नेतृत्व कर रहे एसआई इसरार सहित कई कर्मचारियों की मौत हो गई।
डीजीपी ने बताया कि बरामद सामग्री पुलिस स्टेशन के खुले क्षेत्र में रखी गई थी और एसएफएल टीम पिछले दो दिनों से इसकी सावधानीपूर्वक सैंपलिंग कर रही थी। कुछ नमूने फॉरेंसिक लैब को भेजे भी गए थे। इसके बावजूद करीब 11 बजकर 20 मिनट पर अचानक हुए विस्फोट ने मौके पर मौजूद टीम को संभलने का मौका ही नहीं दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस हादसे पर किसी अन्य एंगल से अनुमान लगाना बेमानी है।
हादसे में जान गंवाने वालों में एसआई के अलावा एसएफएल टीम के तीन सदस्य, दो फोटोग्राफर, दो राजस्व अधिकारी और एक टेलर शामिल हैं। इसके अलावा 27 पुलिसकर्मी, दो रेवेन्यू अधिकारी और तीन नागरिक घायल हुए हैं। विस्फोट की तीव्रता के कारण पुलिस स्टेशन और आसपास की कई इमारतों को भी नुकसान पहुंचा है। इसकी तकनीकी जांच जारी है।
गौरतलब है कि फरीदाबाद पुलिस और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने एक संयुक्त अभियान में आठ लोगों को गिरफ्तार किया था और डॉ. मुजम्मिल के ठिकाने से 300 किलो से अधिक विस्फोटक बरामद किया गया था, जिसमें अमोनियम नाइट्रेट भी शामिल था। इसी बरामदगी से जुड़ी जांच के लिए टीम नौगाम में थी। डॉ. उमर, जो इसी समूह के साथ जुड़ा हुआ था और पहले हुई घटना में मारा गया था, उसकी पहचान डीएनए रिपोर्ट से पुख्ता हुई है।






