
Rising conflict in the Gulf region highlights growing tensions and strategic challenges for global powers – Shah Times
खाड़ी में बढ़ती जंग और अमेरिका की मुश्किल
मिडिल ईस्ट में जारी जंग अब सिर्फ़ दो मुल्कों का टकराव नहीं रह गई है, बल्कि पूरे इलाके की सियासत और अमन को चुनौती देने लगी है। ईरान पर हमले के बाद अमेरिका और उसके अरब सहयोगियों के दरमियान भी दूरी नज़र आने लगी है। खाड़ी देशों का इल्ज़ाम है कि उन्हें पहले भरोसे में नहीं लिया गया और अब वही ईरान के पलटवार का सबसे आसान निशाना बन रहे हैं। सवाल सिर्फ़ जंग का नहीं है, बल्कि भरोसे, कूटनीति और इलाके की स्थिरता का भी है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
जंग का मैदान, सियासत की उलझन
जंग का फैलता दायरा
मिडिल ईस्ट की सियासत हमेशा से नाज़ुक रही है, मगर मौजूदा हालात कुछ ज़्यादा ही पेचीदा दिखाई दे रहे हैं। ईरान के खिलाफ़ शुरू हुई यह जंग अब सिर्फ़ दो ताक़तों की भिड़ंत नहीं रही। यह एक ऐसा मंजर बन चुका है जिसमें पूरी खाड़ी की सियासत, अमन और मआशियात दांव पर लगी है।
अमेरिका ने जिस तेज़ी से ईरान पर हमला शुरू किया, उससे दुनिया को यह पैग़ाम गया कि अमेरिका अब भी अपनी फौजी ताक़त पर भरोसा रखता है। मगर हक़ीक़त थोड़ी अलग नज़र आने लगी है। जंग शुरू करना शायद आसान था, मगर उसे संभालना उतना ही मुश्किल साबित हो रहा है।
अगर आप आम ज़िंदगी का एक छोटा सा उदाहरण लें, तो यह कुछ ऐसा है जैसे कोई शख़्स ग़ुस्से में आकर बहस शुरू कर दे, मगर कुछ देर बाद उसे एहसास हो कि मामला अब उसके हाथ से निकल चुका है। ठीक वैसी ही सूरत इस वक़्त इस जंग की दिखाई दे रही है।
खाड़ी देशों की खामोश नाराज़गी
खाड़ी मुल्कों की नाराज़गी इस वक़्त खुलकर सामने नहीं आ रही, मगर उनकी बेचैनी साफ़ महसूस की जा सकती है। उनका कहना है कि हमले से पहले उन्हें भरोसे में नहीं लिया गया।
यह सिर्फ़ एक औपचारिक शिकायत नहीं है। दरअसल यह उस भरोसे के टूटने की कहानी है जो दशकों से अमेरिका और इन मुल्कों के दरमियान मौजूद रहा है।
इन देशों की दलील यह है कि अगर उन्हें पहले से खबर होती तो वे अपने शहरों, बंदरगाहों और फौजी ठिकानों को बेहतर तरीके से महफूज़ बना सकते थे।
यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या वॉशिंगटन ने अपने सहयोगियों की हिफाज़त को उतनी अहमियत दी जितनी दी जानी चाहिए थी।
जंग की असली कीमत
जंग का मैदान चाहे कहीं भी हो, उसकी असली कीमत हमेशा आम लोगों को चुकानी पड़ती है।
मिसाइलें और ड्रोन सिर्फ़ सैन्य ठिकानों को ही निशाना नहीं बनाते, बल्कि उनके साए में पूरा इलाक़ा दहशत में जीने लगता है। तेल के कुएं, बंदरगाह, व्यापारिक रास्ते और शहरों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी सब प्रभावित होती है।
खाड़ी मुल्कों के लिए यह खतरा और भी बड़ा है क्योंकि वे ईरान की मिसाइल रेंज में आते हैं। इसका मतलब यह है कि हर नया हमला उनके लिए एक नया खतरा बन सकता है।
अगर तेल की सप्लाई प्रभावित होती है तो उसका असर सिर्फ़ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहता। दुनिया भर की मआशियात पर उसका असर पड़ता है।
क्या यह रणनीतिक गलती थी
यहां एक अहम सवाल उठता है। क्या अमेरिका ने इस जंग का फैसला बहुत जल्दबाज़ी में किया
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस टकराव के पीछे सियासी दबाव भी हो सकता है। कभी कभी लीडरशिप को यह दिखाना पड़ता है कि वह मज़बूत है। मगर ताक़त दिखाने और लंबी जंग में फंस जाने के बीच एक बारीक फ़र्क़ होता है।
अगर हम पिछली सदी के तजुर्बे देखें तो यह साफ़ दिखाई देता है कि कई बड़ी ताक़तें जंग में उतरीं तो थीं पूरे आत्मविश्वास के साथ, मगर निकलना उनके लिए मुश्किल हो गया।
इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब जंग की शुरुआत करने वाले मुल्क को बाद में एहसास हुआ कि उसने हालात को कम करके आंका था।
ईरान की जवाबी रणनीति
ईरान ने भी इस जंग में अपनी रणनीति साफ़ कर दी है। सीधे बड़े युद्ध की बजाय उसने ड्रोन और मिसाइलों के जरिए जवाब देना शुरू किया है।
यह एक ऐसी रणनीति है जो कम लागत में ज्यादा असर डाल सकती है।
छोटे ड्रोन और मिसाइलें किसी भी बड़े सैन्य ठिकाने के लिए सिरदर्द बन सकती हैं। यही वजह है कि कई बार आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भी उन्हें पूरी तरह रोक नहीं पाते।
इस तरह के हमलों का मकसद सिर्फ़ नुकसान पहुंचाना नहीं होता बल्कि विरोधी को लगातार दबाव में रखना भी होता है।
सियासत और सच्चाई
अमेरिकी नेतृत्व की तरफ़ से जंग को लेकर बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि ईरान की फौजी ताक़त को काफी नुकसान पहुंचा है।
मगर जंग की सच्चाई अक्सर बयान से अलग होती है।
इतिहास गवाह है कि किसी भी जंग में दोनों पक्ष अपनी जीत का दावा करते हैं। मगर असली तस्वीर कई बार सालों बाद साफ़ होती है।
यह भी याद रखना चाहिए कि किसी भी मुल्क की ताक़त सिर्फ़ उसकी फौज नहीं होती बल्कि उसका समाज, उसकी अर्थव्यवस्था और उसकी सियासी स्थिरता भी होती है।
क्या कूटनीति का रास्ता बंद हो गया
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब भी बातचीत की कोई गुंजाइश बची है।
जंग का रास्ता जितना तेज़ होता है, अमन का रास्ता उतना ही लंबा और मुश्किल होता है।
मगर इतिहास यह भी बताता है कि आख़िरकार हर जंग का अंत बातचीत की मेज़ पर ही होता है।
अगर इस टकराव को जल्द नहीं रोका गया तो इसका असर सिर्फ़ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सियासत सब प्रभावित हो सकते हैं।
आगे का रास्ता
इस पूरे हालात में सबसे बड़ी जरूरत यह है कि सभी पक्ष थोड़ी ठंडे दिमाग से सोचें।
ताक़त का इस्तेमाल कभी कभी ज़रूरी हो सकता है, मगर स्थायी हल हमेशा कूटनीति से ही निकलता है।
खाड़ी के मुल्क, अमेरिका और ईरान अगर वाक़ई अपने इलाके की स्थिरता चाहते हैं तो उन्हें जंग के शोर से बाहर निकलकर बातचीत की राह तलाश करनी होगी।
क्योंकि जंग का सबसे बड़ा सबक यही होता है कि आख़िर में जीत किसी की नहीं होती, और हार पूरी इंसानियत की होती है।






