
On the orders of Allahabad High Court, Jaunpur Superintendent of Police took action to suspend 4 officers
जौनपुर पुलिस रिश्वत प्रकरण में हाईकोर्ट की सख्ती: इंस्पेक्टर, दो सिपाही और लेखपाल सस्पेंड, एफआईआर दर्ज
जौनपुर के बड़ागांव में भूमि विवाद पर याचिका वापस लेने की धमकी देने और रिश्वत मांगने के आरोप में पुलिस और लेखपाल सस्पेंड, हाईकोर्ट सख्त।
जौनपुर,(Shah Times) । उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में एक जमीन विवाद ने गंभीर प्रशासनिक और न्यायिक मोड़ ले लिया है। हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिका वापस लेने की धमकी और रिश्वतखोरी के आरोपों के चलते जिले के पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और पुलिस अधीक्षक डॉ. कौस्तुभ कुमार ने कड़ी कार्रवाई करते हुए इंस्पेक्टर, दो सिपाही और एक लेखपाल को निलंबित कर दिया है।
🔎 मामले की शुरुआत: ग्राम समाज की भूमि विवाद
जौनपुर जिले के मुंगराबादशाहपुर थाना क्षेत्र स्थित बड़ागांव निवासी गौरीशंकर सरोज ने ग्राम समाज की भूमि पर अवैध कब्जे को लेकर 30 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। इस याचिका के जवाब में संबंधित थाने को कोर्ट से नोटिस भी प्राप्त हुआ था।
लेकिन इसके बाद जो घटनाएं घटीं, उन्होंने राज्य की पुलिस व्यवस्था की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए।
🚨 धमकी, रिश्वत और अवैध हिरासत
वादी गौरीशंकर सरोज का आरोप है कि 17 मई को इंस्पेक्टर दिलीप कुमार सिंह, सिपाही पंकज मौर्य, सिपाही नीतीश गौड़, और क्षेत्रीय लेखपाल विजय शंकर उनके घर पहुंचे। इन अधिकारियों ने उन्हें हाईकोर्ट में दाखिल याचिका वापस लेने के लिए दबाव डाला।
जब वादी ने मना किया, तो उनके पोते रजनीश सरोज को पुलिस वैन में उठाकर ले जाया गया। कुछ ही दूरी पर 2000 रुपये की रिश्वत लेकर उसे छोड़ दिया गया। यह पूरी घटना न केवल न्याय की अवमानना थी, बल्कि कानून के रक्षक ही कानून तोड़ते दिखे।
⚖️ हाईकोर्ट की सख्ती: न्यायपालिका की साख पर सवाल
गौरीशंकर ने इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी हाईकोर्ट को दी। कोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए SP जौनपुर को जांच का आदेश दिया। इससे पहले की गई ASP ग्रामीण की जांच में सभी आरोपी निर्दोष पाए गए थे, लेकिन हाईकोर्ट की नाराजगी के बाद SP डॉ. कौस्तुभ कुमार ने खुद जांच की और सच्चाई उजागर हुई।
आज का शाह टाइम्स ई-पेपर डाउनलोड करें और पढ़ें
🔨 निलंबन और एफआईआर: कार्रवाई में आई तेजी
8 जुलाई को दोनों कांस्टेबलों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया।
9 जुलाई को थाना प्रभारी दिलीप कुमार सिंह को लापरवाही और कार्यशैली में चूक के लिए सस्पेंड कर दिया गया।
गौरीशंकर सरोज की तहरीर पर पंकज मौर्य, नीतीश गौड़, लेखपाल विजय शंकर और शिव गोविंद पर FIR दर्ज की गई।
FIR की जांच क्षेत्राधिकारी मछलीशहर को सौंपी गई और इसकी कॉपी हाईकोर्ट को भी भेजी गई।
❗ अधिवक्ता पर दबाव, परिजनों को धमकी
हाईकोर्ट ने एसपी जौनपुर को 9 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया था। इसके पहले, 8 जुलाई की रात में इंस्पेक्टर दिलीप कुमार सिंह अधिवक्ता से मुलाकात कर दबाव बनाने उनके घर पहुंच गए। अधिवक्ता के न मिलने पर उनके परिजनों को धमकाया गया।
इस घटना की जानकारी शपथपत्र के रूप में कोर्ट में प्रस्तुत की गई।
⚠️ ASP ग्रामीण को चेतावनी
एसपी ने पाया कि प्रारंभिक जांच में ASP ग्रामीण द्वारा लापरवाही की गई थी। उन्हें कड़ी चेतावनी जारी की गई है कि भविष्य में ऐसी गलती दोहराई न जाए।
🧾 न्यायिक आदेशों की अवहेलना की बड़ी कीमत
इस घटना ने पुलिस और प्रशासनिक अमले को एक स्पष्ट संदेश दे दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालना किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और 15 जुलाई को विस्तृत रिपोर्ट और शपथपत्र के साथ होम सेक्रेटरी और एसपी को पेश होने का आदेश दिया है।
🧠 कानून का राज या अधिकारियों की मनमानी?
इस पूरी घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं:
- क्या वाकई प्राथमिक जांच निष्पक्ष होती है, या सिर्फ खानापूर्ति?
- अगर हाईकोर्ट सख्ती न दिखाता, तो क्या यह मामला कभी उजागर होता?
- क्या केवल निलंबन और एफआईआर पर्याप्त हैं या कठोर सज़ा भी जरूरी है?
पुलिस की जवाबदेही और पारदर्शिता में सुधार अब समय की मांग है। यह केवल एक प्रशासनिक मामला नहीं, बल्कि न्याय और नागरिक अधिकारों का उल्लंघन है।




