
भारत-EU डील क्यों अब निर्णायक हो चुकी है?
गणतंत्र दिवस और भारत-यूरोप संबंधों का नया संकेत
व्यापार से आगे: भारत-EU रिश्तों की असली परीक्षा
गणतंत्र दिवस 2026 पर यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी सिर्फ़ औपचारिकता नहीं थी. यह भारत-यूरोप संबंधों में व्यापार, रणनीति और साझा मूल्यों के उस मोड़ की ओर इशारा है, जहां फैसले टालना अब संभव नहीं.
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
गणतंत्र दिवस का संदेश क्या था
गणतंत्र दिवस के मंच पर जब यूरोप के शीर्ष नेता मौजूद थे, तो यह सिर्फ़ कैमरों के लिए बनी तस्वीर नहीं थी. यह एक संदेश था. एक तरह से दुनिया को बताया गया कि भारत अब किन साझेदारों को गंभीरता से देख रहा है. यहां सवाल उठता है, क्या यह प्रतीकात्मक था या रणनीतिक. सच शायद दोनों के बीच है.
एक आम पाठक के लिए इसे ऐसे समझा जा सकता है. जैसे कोई पुराना दोस्त सालों बाद अचानक आपके सबसे अहम दिन पर आपके घर आ जाए. आप तुरंत समझ जाते हैं कि रिश्ता अब सिर्फ़ औपचारिक नहीं रहा.
व्यापार की मेज़ पर क्यों अटकी रही बातचीत
भारत और यूरोप के बीच बातचीत नई नहीं है. सालों से फाइलें खुलती और बंद होती रहीं. कारण साफ़ थे. भारत अपने घरेलू उद्योग को लेकर सतर्क रहा, यूरोप अपने सख़्त नियमों पर अड़ा रहा.
यहां एक English phrase अक्सर सुनाई देती है, trust deficit. दोनों पक्षों को डर रहा कि ज़्यादा झुकने का मतलब अंदरूनी नुकसान हो सकता है. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. सप्लाई चेन, जियोपॉलिटिक्स और global uncertainty ने सबको मजबूर किया है कि पुराने डर दोबारा देखें.
ऑटोमोबाइल और वाइन पर असली बहस
यूरोप की मांग सीधी है. उनकी लग्ज़री कारें और वाइन भारत में सस्ती हों. भारत का डर भी सीधा है. अगर अचानक ड्यूटी कम हुई, तो घरेलू उद्योग कैसे टिकेगा.
यहां अक्सर भावनात्मक तर्क आते हैं. लेकिन आर्थिक हक़ीक़त यह है कि competition से ही quality सुधरती है. सवाल यह नहीं कि ड्यूटी घटे या नहीं. सवाल यह है कि transition कितना समझदारी से हो.
एक छोटा उदाहरण. अगर कोई शहर अचानक बिना तैयारी के मेट्रो खोल दे, तो ट्रैफिक सुधरने के बजाय बिगड़ सकता है. वही बात यहां लागू होती है.
पेशेवरों की आवाजाही और अधूरा भरोसा
भारत के लिए यह डील सिर्फ़ सामान की नहीं, लोगों की भी है. आईटी प्रोफेशनल, नर्स, शेफ. ये सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि middle class की उम्मीदें हैं.
यूरोप यहां हिचकिचाता है. उसकी घरेलू राजनीति, रोजगार का डर, और इमीग्रेशन को लेकर संवेदनशीलता.
यहां एक uncomfortable सवाल उठता है. क्या यूरोप भारतीय टैलेंट को चाहता है, लेकिन भारतीय नागरिक को नहीं. अगर ऐसा है, तो साझेदारी अधूरी ही रहेगी.
डेटा, डिजिटल और नया युग
आज के दौर में डेटा वही है जो पहले तेल था. यूरोप चाहता है कि उसका डेटा सुरक्षित रहे. भारत चाहता है कि उसका डिजिटल सेक्टर न रुके.
यहां English शब्द data adequacy बहुत चर्चा में है. असल में यह भरोसे का सवाल है. क्या यूरोप भारत के नियमों पर भरोसा करेगा. और क्या भारत अपनी संप्रभुता से समझौता किए बिना लचीलापन दिखा पाएगा.
यह बहस सिर्फ़ टेक्निकल नहीं है. यह आने वाले दशकों की डिजिटल आज़ादी से जुड़ी है.
कार्बन टैक्स और नैतिक दुविधा
CBAM जैसे नियम पर्यावरण के नाम पर लाए गए हैं. इरादा सही हो सकता है, लेकिन असर असमान है.
भारत पूछता है. क्या वही नियम उन देशों पर भी उतनी सख़्ती से लागू होंगे जिन्होंने दशकों तक प्रदूषण फैलाकर विकास किया.
यहां नैतिकता और व्यवहारिकता टकराती हैं. अगर भारत को अचानक अतिरिक्त टैक्स देना पड़ा, तो उसका असर रोज़गार और कीमतों पर पड़ेगा.
आम आदमी की जेब का गणित
नीतियां जब काग़ज़ से निकलती हैं, तो सीधा असर रसोई और नौकरी पर पड़ता है.
अगर डील होती है, तो imported products सस्ते हो सकते हैं. कार, चॉकलेट, electronics. यह सुनने में अच्छा लगता है.
लेकिन दूसरी तरफ़, अगर भारतीय निर्यात बढ़ता है, तो फैक्ट्रियों में काम बढ़ेगा. यह वह हिस्सा है जिसे अक्सर headline में जगह नहीं मिलती, लेकिन असर यहीं सबसे ज़्यादा होता है.
रणनीति, राजनीति और बड़ा चित्र
भारत और यूरोप दोनों खुद को rule based order का समर्थक कहते हैं. लेकिन नियम तभी टिकते हैं, जब वे न्यायपूर्ण लगें.
इस डील का असली टेस्ट यही है. क्या यह सिर्फ़ आंकड़ों का खेल बनेगी, या आपसी सम्मान का मॉडल.
एक smart reader यहां पूछ सकता है. क्या भारत को इतनी जल्दी है. जवाब है, जल्दी नहीं, लेकिन समय सही है.
सवाल जो अनुत्तरित हैं
क्या भारत अपने छोटे उद्योगों को पर्याप्त सुरक्षा दे पाएगा.
क्या यूरोप वाकई लोगों की आवाजाही पर दिल खोल पाएगा.
क्या पर्यावरण नियम विकासशील देशों की हकीकत समझेंगे.
ये सवाल असहज हैं, लेकिन इन्हें टालना और ज़्यादा महंगा पड़ सकता है.
निष्कर्ष नहीं, एक पड़ाव
यह समझौता किसी कहानी का अंत नहीं, एक अध्याय है.
गणतंत्र दिवस पर दिखी गर्मजोशी उम्मीद देती है. लेकिन असली परीक्षा मेज़ पर होगी, जहां शब्दों से ज़्यादा शर्तें बोलेंगी.
भारत के लिए चुनौती साफ़ है. खुलेपन और आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन.
और यूरोप के लिए भी. साझेदारी या सिर्फ़ बाज़ार.
यही वह मोड़ है, जहां इतिहास दिशा बदलता है.
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