
Iran showcases Khorramshahr-4 ballistic missile from underground missile city. Shah Times
खोर्रमशहर-4 और नई रणनीतिक चेतावनी, मिसाइल सिटी से संदेश क्या है❓
खोर्रमशहर-4 केवल एक हथियार नहीं, बल्कि एक संदेश है। यह क्षेत्रीय संतुलन, अमेरिका-ईरान वार्ता और इजरायल की सुरक्षा सोच को एक साथ चुनौती देता है। सवाल यह है कि यह डिटरेंस को मजबूत करेगा या टकराव को तेज। ईरान ने खोर्रमशहर-4 बैलिस्टिक मिसाइल और नई अंडरग्राउंड मिसाइल सिटी दिखाकर साफ संकेत दिया है कि उसकी रणनीति बदल रही है। यह संपादकीय उसी बदलाव के मायने, जोखिम और संभावित जवाबों की पड़ताल करता है।
📍 Tehran ✍️ Asif Khan
बदलता इशारा, बदलती ज़बान
ईरान ने जब खोर्रमशहर-4 को भूमिगत मिसाइल सिटी के साथ दुनिया के सामने रखा, तो यह सिर्फ तकनीकी प्रदर्शन नहीं था। यह एक राजनीतिक बयान था, एक तरह की खुली बातचीत, जिसमें शब्दों की जगह धातु और ईंधन बोल रहे थे। तेहरान लंबे समय से कहता आया है कि उसकी सैन्य तैयारी बचाव के लिए है, मगर इस बार स्वर में आत्मविश्वास के साथ चुनौती भी झलकती है। जैसे कोई शतरंज का खिलाड़ी अचानक प्यादे की जगह रानी आगे बढ़ा दे।
डिटरेंस से आगे की सोच
अब तक ईरान की नीति को रक्षात्मक कहा जाता रहा। यानी हमला हो तो जवाब। लेकिन खोर्रमशहर-4 के साथ “एक्टिव डिटरेंस” की बात सामने आई है। इसका मतलब है कि सिर्फ डराने के लिए नहीं, बल्कि पहले से दबाव बनाने की क्षमता। 2000 किलोमीटर की रेंज और भारी वॉरहेड इस सोच को जमीन देता है। यह वही बिंदु है जहां पड़ोसी देशों और वैश्विक ताकतों की चिंता बढ़ती है।
मिसाइल सिटी का मनोविज्ञान
भूमिगत मिसाइल सिटी का अनावरण अपने आप में एक संदेश है। दुश्मन के हवाई हमलों से सुरक्षित ढांचे दिखाकर ईरान यह बताना चाहता है कि उसकी क्षमता नष्ट करना आसान नहीं। यह मनोवैज्ञानिक खेल है। जैसे कहना हो कि अगर तुम देख भी रहे हो, तो भी छू नहीं पाओगे। इतिहास बताता है कि ऐसी संरचनाएं सिर्फ सुरक्षा नहीं देतीं, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ाती हैं।
तकनीक से आगे सियासत
हाइपरसोनिक गति और मैन्यूवर क्षमता तकनीकी शब्द लग सकते हैं, लेकिन इनके पीछे राजनीति छुपी है। इजरायल की आयरन डोम जैसी प्रणालियों को चुनौती देना सीधा संदेश है। सवाल यह नहीं कि मिसाइल कितनी तेज है, सवाल यह है कि इसे दिखाने का समय क्यों चुना गया। ऐसे समय में जब ओमान में वार्ता तय है और क्षेत्र पहले से तनाव में है।
इजरायल की सुरक्षा सोच
इजरायल के लिए यह खबर नई नहीं, मगर डराने वाली जरूर है। 2000 किलोमीटर की रेंज उसके पूरे भूभाग को कवर करती है। यहां यह मान लेना आसान होगा कि इजरायल तुरंत सैन्य जवाब की तैयारी करेगा। लेकिन इतिहास बताता है कि इजरायल अक्सर पहले कूटनीति और दबाव के रास्ते आजमाता है। फिर भी, सुरक्षा प्रतिष्ठान में बेचैनी स्वाभाविक है।
अमेरिका की दुविधा
अमेरिका की स्थिति सबसे जटिल है। एक तरफ वार्ता, दूसरी तरफ अपने नागरिकों को ईरान छोड़ने की सलाह। यह दोहरी भाषा नहीं, बल्कि असमंजस का संकेत है। वॉशिंगटन यह समझता है कि सीधा टकराव महंगा होगा, मगर कमजोरी का संदेश भी नहीं देना चाहता। यही वजह है कि सैन्य तैनाती और कूटनीति साथ-साथ चल रही हैं।
वार्ता की मेज पर मिसाइल की परछाईं
ओमान में होने वाली बातचीत के ऊपर खोर्रमशहर-4 की परछाईं साफ दिखती है। यह मिसाइल वार्ता की शर्तों को बदल देती है। ईरान अब कमजोर पक्ष की तरह नहीं बैठेगा। यह बात अमेरिकी वार्ताकार भी जानते हैं। सवाल यह है कि क्या यह ताकत वार्ता को मजबूत करेगी या उसे और कठिन बनाएगी।
क्षेत्रीय संतुलन की दरार
सऊदी अरब, यूएई और अन्य क्षेत्रीय देश चुप नहीं हैं। वे अपने डिफेंस सिस्टम मजबूत कर रहे हैं। हथियारों की यह दौड़ नई नहीं, मगर हर नई मिसाइल इसे एक कदम आगे ले जाती है। आम नागरिक के लिए यह सब दूर की बातें लग सकती हैं, लेकिन इसका असर तेल की कीमतों से लेकर रोजमर्रा की सुरक्षा तक पड़ता है।
नैरेटिव की लड़ाई
ईरान कहता है कि उसका कार्यक्रम रक्षात्मक है। अमेरिका और इजरायल इसे उकसावा मानते हैं। सच शायद बीच में कहीं है। हर देश अपनी सुरक्षा के नाम पर कदम उठाता है, लेकिन जब कदम पड़ोसी के आंगन तक पहुंच जाएं, तो सवाल उठते हैं। यही नैरेटिव की लड़ाई है, जिसमें सच, डर और रणनीति आपस में घुल जाते हैं।
इतिहास की परछाईं
1979 की घटनाओं के बाद से अमेरिका-ईरान रिश्ते कभी सामान्य नहीं हुए। हर नई पीढ़ी उसी अविश्वास को विरासत में पाती है। खोर्रमशहर-4 उसी इतिहास की अगली कड़ी है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब तकनीक ज्यादा उन्नत है और गलत फैसले की कीमत भी ज्यादा।
आम इंसान कहां खड़ा है
जब अमेरिकी दूतावास अपने नागरिकों से तुरंत निकलने को कहता है, तो यह सिर्फ कूटनीतिक कदम नहीं रहता। यह डर को जमीन पर उतार देता है। सड़कों का बंद होना, उड़ानों का रद्द होना, यह सब बताता है कि बड़े फैसलों का बोझ हमेशा आम लोगों पर पड़ता है।
क्या युद्ध तय है
यह मान लेना आसान होगा कि युद्ध तय है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ भी तय नहीं होता। कई बार ताकत का प्रदर्शन टकराव रोकने के लिए भी किया जाता है। सवाल यह है कि क्या सभी पक्ष इतना संयम दिखा पाएंगे।
विकल्प और चेतावनी
एक विकल्प यह है कि मिसाइल और चेतावनी वार्ता को गंभीर बनाएं। दूसरा यह कि गलत आकलन हालात बिगाड़ दे। यहां मीडिया, कूटनीति और सार्वजनिक बयानबाजी की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। हर शब्द, हर तस्वीर मायने रखती है।
नतीजे से पहले सवाल
खोर्रमशहर-4 ईरान की ताकत का प्रतीक है, लेकिन यह उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं। सुरक्षा संतुलन से आती है, सिर्फ हथियारों से नहीं। पश्चिम एशिया एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है जहां एक कदम आगे या पीछे पूरे क्षेत्र की दिशा बदल सकता है। असली परीक्षा अब नेताओं की समझ और संयम की है।




