
Diplomatic tension after Oman talks between Iran and the US, editorial visual by Shah Times
कूटनीति और दबाव के बीच ईरान–अमेरिका की नई परीक्षा
वार्ता,धमकी और टैरिफ़: पश्चिम एशिया का असहज संतुलन
ओमान में हुई बातचीत ने उम्मीद जगाई, लेकिन उसके तुरंत बाद आई चेतावनियों और आदेशों ने भरोसे को फिर हिला दिया। सवाल यह है कि यह वार्ता समाधान की ओर बढ़ेगी या टकराव की ओर।
ईरान और अमेरिका के दरमियान मस्कट में हुई बातचीत को दोनों पक्षों ने सकारात्मक बताया, लेकिन अगले ही दिन ईरान की सख़्त चेतावनी और अमेरिका के आर्थिक दबाव ने माहौल बदल दिया। यह संपादकीय इन बयानों, रणनीतियों और संभावित नतीजों का संतुलित विश्लेषण करता है।
📍Muscat ✍️ Asif Khan
मस्कट की मेज़ और उसके साए
ओमान की राजधानी में हुई बातचीत एक शांत कमरे में हुई थी, लेकिन उसके बाहर शोर बहुत था। बयान, चेतावनी और अंदाज़े। यही कूटनीति का सच है। एक तरफ़ वार्ता की मेज़, दूसरी तरफ़ ताक़त का प्रदर्शन। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ़ कहा कि हमला हुआ तो जवाब मिलेगा। यह बात नई नहीं है, लेकिन समय ने इसे अहम बना दिया। बातचीत के ठीक बाद यह कहना, एक संदेश है। संदेश सिर्फ़ वाशिंगटन के लिए नहीं, पूरे इलाक़े के लिए।
चेतावनी की ज़बान और उसका मतलब
अराघची की बातों में सख़्ती है, लेकिन साथ में एक सीमा भी। उन्होंने कहा कि अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया जाएगा, उन देशों को नहीं जहाँ ये ठिकाने हैं। यह फर्क़ मामूली नहीं है। यह बताता है कि ईरान टकराव चाहता नहीं, पर डराना चाहता है। जैसे कोई पड़ोसी कहे, मैं दरवाज़ा खटखटाऊँगा, दीवार नहीं तोड़ूँगा। यह भाषा दबाव की है, युद्ध की घोषणा नहीं।
अमेरिका का जवाब: अल्फाज से आगे
अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश ने बातचीत की हवा बदल दी। जिन देशों ने ईरान से व्यापार जारी रखा है, उन पर टैरिफ़ का संकेत। दर तय नहीं, लेकिन उदाहरण रख दिया गया। यह भी एक रणनीति है। अनिश्चितता पैदा करना। बाज़ार, सरकारें और कंपनियाँ सोचने लगती हैं। क्या जोखिम लें, क्या पीछे हटें। यह आर्थिक स्ट्रेटेजी सैन्य कदम से पहले आती है।
परमाणु कार्यक्रम पर अड़ियल रुख
ईरान बार-बार कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है। वह यूरेनियम संवर्धन के अधिकार को मान्यता चाहता है। अमेरिका कहता है, संवर्धन बंद करो। यहाँ टकराव की जड़ है। एक पक्ष इसे संप्रभु अधिकार मानता है, दूसरा संभावित ख़तरा। बीच में भरोसा नहीं है। भरोसा वही चीज़ है जो काग़ज़ पर नहीं, अनुभव से बनता है। और पिछले सालों का अनुभव दोनों को सशंकित रखता है।
मिसाइल और क्षेत्रीय सवाल
अराघची ने साफ़ किया कि मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय समूहों पर बात नहीं होगी। ईरान के नज़रिए से यह सुरक्षा का सवाल है। वह मानता है कि इन मुद्दों पर झुकाव उसे कमजोर करेगा। अमेरिका और उसके सहयोगी इसे अलग तरह से देखते हैं। उन्हें लगता है कि यही कार्यक्रम अस्थिरता बढ़ाते हैं। दोनों की सोच की दिशा अलग है। यहाँ समझौता आसान नहीं।
पिछला अनुभव और वर्तमान डर
पिछले साल जून में हुए हमलों की याद ताज़ा है। अमेरिकी और इज़राइली कार्रवाई, फिर कतर में जवाब। यह सिलसिला दिखाता है कि चेतावनी खाली नहीं होती। जब अराघची कहते हैं कि फिर हमला हुआ तो जवाब होगा, तो यह सिर्फ़ शब्द नहीं। इतिहास इसका वजन बढ़ाता है। इसी वजह से इलाक़े के देश बेचैन हैं। कोई भी अगला कदम उन्हें खींच सकता है।
ट्रंप की शैली और संदेश
एयर फ़ोर्स वन में दिए गए बयान ट्रंप की परिचित शैली दिखाते हैं। विशाल नौसेना, समय की कोई जल्दी नहीं, गंभीर नतीजे। यह बयान घरेलू राजनीति के लिए भी हैं और अंतरराष्ट्रीय मंच के लिए भी। एक तरह से यह कहना कि विकल्प खुले हैं। यह स्ट्रेटेजिक एम्बिग्युइटी है। साफ़ नहीं बताते, लेकिन डर बनाए रखते हैं।
मध्यस्थ ओमान की भूमिका
ओमान के विदेश मंत्री ने बातचीत को उपयोगी बताया। यह छोटा वाक्य बड़ा काम करता है। मध्यस्थ का काम चमत्कार करना नहीं, रास्ता खोलना है। मस्कट ने वही किया। दोनों पक्ष सलाह के लिए लौटे। यह प्रक्रिया का हिस्सा है। जल्दी नतीजे की उम्मीद करना शायद जल्दबाज़ी होगी।
व्यापार, टैरिफ़ और दबाव की अर्थव्यवस्था
ईरान का व्यापार नेटवर्क बड़ा है। चीन, इराक़, अमीरात, तुर्की, भारत। ऊर्जा इसका केंद्र है। तेल, गैस, ईंधन। साथ में खाद्य और सोना। अमेरिका का टैरिफ़ आदेश इस नेटवर्क को निशाना बनाता है। सीधे ईरान को नहीं, उसके साझेदारों को। यह परोक्ष दबाव है। सवाल यह है कि क्या यह काम करेगा। कुछ देश झुकेंगे, कुछ रास्ते निकालेंगे। इतिहास बताता है कि प्रतिबंध पूर्ण समाधान नहीं होते।
भारत और क्षेत्रीय संतुलन
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति जटिल है। ऊर्जा ज़रूरतें, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक संबंध। हर कदम सोच-समझकर। यही हालत कई देशों की है। इसलिए अमेरिकी आदेश का असर केवल आर्थिक नहीं, राजनीतिक भी होगा।
मानवाधिकार और अंदरूनी हालात
ईरान के भीतर हालिया विरोध और उस पर कार्रवाई की खबरें भी पृष्ठभूमि में हैं। इंटरनेट प्रतिबंध, अस्पष्ट आँकड़े। यह पहलू अक्सर कूटनीतिक बातचीत से अलग रखा जाता है, लेकिन असर डालता है। बाहरी दबाव और अंदरूनी तनाव मिलकर फैसलों को कठोर बना सकते हैं।
क्या समाधान की गुंजाइश है
एक साधारण उदाहरण लें। दो लोग झगड़े में हैं, लेकिन दोनों जानते हैं कि लड़ाई महंगी पड़ेगी। वे बात करते हैं, पर साथ में ताक़त दिखाते हैं। यही हाल यहाँ है। वार्ता चल रही है, पर दबाव भी। समाधान तभी निकलेगा जब दोनों कुछ छोड़ने को तैयार हों। अभी संकेत मिश्रित हैं।
नतीजे की जगह सवाल
क्या मस्कट की बातचीत अगले दौर में ठोस रूप ले पाएगी। क्या टैरिफ़ का डर देशों को ईरान से दूर करेगा। क्या चेतावनियाँ सीमा में रहेंगी। इन सवालों के जवाब तय नहीं हैं। इतना साफ़ है कि शब्द और कदम दोनों का वजन बढ़ गया है। गलती की गुंजाइश कम है। यही इस समय की सबसे बड़ी सच्चाई है।





