
एआई मंच पर विरोध, लोकतंत्र की नई दहलीज़
यूथ राजनीति और अंतरराष्ट्रीय छवि की टकराहट
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान यूथ कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा अर्धनग्न विरोध प्रदर्शन ने सियासी हलकों में तेज बहस छेड़ दी है। अदालत ने चार आरोपियों की जमानत नामंजूर कर पांच दिन की पुलिस रिमांड दी है। पुलिस ने इसे संभावित बड़ी साजिश बताया है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक विरोध की अभिव्यक्ति कह रहा है। सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ऐसे प्रदर्शन की सीमाएँ क्या हैं और लोकतंत्र में असहमति का तरीका कैसा होना चाहिए।
📍 New Delhi ✍️ Asif Khan
अंतरराष्ट्रीय मंच और घरेलू असहमति
नई दिल्ली के भारत मंडपम में जब एआई इम्पैक्ट समिट का आग़ाज़ हुआ तो मक़सद साफ़ था। टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और फ्यूचर इकॉनमी पर दुनिया के सामने भारत की तस्वीर पेश करना। लेकिन इसी मंच पर अचानक कुछ नौजवानों का अर्धनग्न होकर नारे लगाना पूरी चर्चा को दूसरी दिशा में ले गया। सवाल यह नहीं कि असहमति क्यों जताई गई। सवाल यह है कि असहमति का अंदाज़ क्या होना चाहिए।
लोकतंत्र में इख़्तिलाफ़ कोई जुर्म नहीं। बल्कि healthy democracy की निशानी है। मगर जब मंच international हो, मेहमान देश विदेश से आए हों, तब हर कदम का असर सिर्फ़ घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहता। यह वैसा ही है जैसे किसी शादी में घर का झगड़ा सबके सामने शुरू हो जाए। मुद्दा सही हो सकता है, पर तरीका सबको असहज कर देता है।
अदालत का रुख और पुलिस की दलील
पटियाला हाउस कोर्ट ने चार कार्यकर्ताओं को पांच दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा है। अदालत का काम राजनीतिक नीयत पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि कानून के आधार पर फैसला करना है। पुलिस ने दलील दी कि डिजिटल सबूतों की जांच और आपसी पूछताछ ज़रूरी है। साथ ही फंडिंग के स्रोत पर भी सवाल उठाए गए।
यहां एक अहम बिंदु उभरता है। अगर प्रदर्शन spontaneous था तो फिर इतनी तैयारी क्यों। अगर तैयारी थी तो उसकी प्रकृति क्या थी। लोकतंत्र में protest एक right है, लेकिन conspiracy एक अलग कानूनी मसला है। पुलिस का दावा कि यह विदेश में हुए एक आंदोलन से प्रेरित था, गंभीर है। मगर अदालत में हर दावा सबूत मांगता है। आरोप और प्रमाण के बीच की दूरी ही न्याय की असली कसौटी होती है।
राजनीति की तकरार
घटना के बाद सियासत गरमा गई। सत्तारूढ़ दल ने इसे राष्ट्र की छवि पर धब्बा बताया। विपक्ष ने कहा कि सरकार आलोचना से घबराती है। बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने भी इस आचरण को अशोभनीय कहा और देश की गरिमा का हवाला दिया।
यहां हमें थोड़ा ठहरकर सोचना चाहिए। क्या हर विरोध राष्ट्र विरोध होता है। या हर राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया लोकतांत्रिक चिंता होती है। अक्सर political discourse में दोनों पक्ष अपनी सुविधा के मुताबिक़ शब्द चुन लेते हैं। मगर हकीकत इससे कहीं ज्यादा पेचीदा होती है।
एआई, ट्रेड डील और युवा गुस्सा
प्रदर्शन का केंद्र भारत अमेरिका ट्रेड डील और प्रधानमंत्री पर लगाए गए आरोप थे। एआई समिट जैसे मंच पर इस मुद्दे को उठाना एक symbolic choice था। संदेश यह था कि टेक्नोलॉजी और व्यापार के बड़े फैसले पारदर्शिता के साथ हों। युवा वर्ग अक्सर सीधा सवाल पूछता है। उन्हें diplomatic language कम भाती है।
लेकिन क्या इस तरह का प्रदर्शन संदेश को मजबूत करता है या कमज़ोर। आम नागरिक जब टीवी पर यह दृश्य देखता है तो उसका ध्यान मुद्दे से ज्यादा दृश्य पर टिक जाता है। content पीछे छूट जाता है, spectacle आगे आ जाता है। यह विरोध की पुरानी दुविधा है। जोर से बोलो तो सुना जाता है, पर कभी कभी बात का मर्म खो जाता है।
गरिमा बनाम अभिव्यक्ति
कुछ लोग कह रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय समिट के दौरान ऐसा प्रदर्शन देश की image को नुकसान पहुंचाता है। दूसरी ओर यह भी तर्क है कि असहमति दबा दी जाए तो लोकतंत्र hollow हो जाता है। दोनों बातों में अंशतः सच है।
अगर कोई छात्र विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी के खिलाफ नारे लगाता है तो वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। मगर अगर वही छात्र किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान मंच तोड़ दे, तो सवाल उठेंगे। फर्क सिर्फ़ स्थान और समय का नहीं, बल्कि प्रभाव का भी है।
सोशल मीडिया और नई राजनीति
आज की राजनीति सिर्फ़ सड़कों पर नहीं, screens पर भी लड़ी जाती है। एक छोटा सा वीडियो minutes में viral हो जाता है। शायद प्रदर्शनकारियों को भी मालूम था कि यह दृश्य कैमरों में कैद होगा। सोशल मीडिया की age में symbolism बहुत ताकतवर हथियार है।
मगर यही हथियार उल्टा भी पड़ सकता है। जब narrative polarized हो जाए तो हर पक्ष अपने अपने followers को ही संबोधित करने लगता है। संवाद की जगह शोर ले लेता है। ऐसे में सच बीच में कहीं दब जाता है।
युवा राजनीति की दिशा
युवा राजनीति हमेशा उग्र रही है। इतिहास गवाह है कि बड़े बदलावों की शुरुआत अक्सर युवाओं से हुई। मगर हर उग्रता constructive नहीं होती। सवाल यह है कि क्या आज की युवा राजनीति policy debate की तरफ बढ़ रही है या केवल visual protest तक सीमित हो रही है।
अगर ट्रेड डील पर ठोस सवाल हैं तो उन्हें data और facts के साथ रखा जाना चाहिए। संसद, प्रेस कॉन्फ्रेंस, जन संवाद सब रास्ते खुले हैं। अर्धनग्न प्रदर्शन attention तो खींच लेता है, पर क्या वह विश्वास भी जीतता है। यह आत्ममंथन दोनों पक्षों को करना होगा।
लोकतंत्र की असली परीक्षा
यह प्रकरण हमें एक असहज सच दिखाता है। लोकतंत्र में freedom और responsibility साथ साथ चलते हैं। सरकार को आलोचना सहने की क्षमता दिखानी होगी। विपक्ष को विरोध की मर्यादा समझनी होगी। अदालत को सबूत के आधार पर निष्पक्ष रहना होगा। और नागरिक समाज को भावनाओं से ऊपर उठकर तर्क देखना होगा।
आख़िरकार सवाल सिर्फ़ चार कार्यकर्ताओं की रिमांड का नहीं है। सवाल यह है कि हम किस तरह की राजनीतिक संस्कृति गढ़ रहे हैं। क्या हम असहमति को संवाद में बदल सकते हैं। या हर बहस को राष्ट्र बनाम विरोधी के फ्रेम में फंसा देंगे।
अगर लोकतंत्र एक घर है तो उसमें दरवाजे भी चाहिए और दीवारें भी। दरवाजे ताकि आवाज़ें अंदर आएं। दीवारें ताकि घर की बुनियाद सुरक्षित रहे। संतुलन ही असली चुनौती है। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सबक भी।







