
Jamiat Ulema-e-Hind reacts to RSS leader’s statement in New Delhi. Shah Times
तौहीद और राष्ट्र पर बयान: जमीयत का आरएसएस को जवाब
📍नई दिल्ली, 🗓️ 23 दिसंबर 2025 ✍️ Asif Khan
आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के बयान पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने आपत्ति दर्ज की है। संगठन ने तौहीद, वतन और नागरिकता के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट किया।
नई दिल्ली में आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के एक सार्वजनिक बयान के बाद देश की सियासी और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज़ हो गई। बयान में मुसलमानों को सूर्य, नदी और वृक्ष जैसी प्राकृतिक वस्तुओं के प्रति पूजा भाव अपनाने का सुझाव दिया गया था। इसी संदर्भ में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अपनी प्रतिक्रिया जारी की।
जमीयत की आधिकारिक प्रतिक्रिया
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने इस बयान पर असहमति जताते हुए कहा कि मुसलमान एक अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं करते। उन्होंने कहा कि तौहीद और रिसालत इस्लाम की बुनियादी उसूल हैं और इनमें किसी भी तरह का बदलाव इस्लामी पहचान से बाहर है।
तौहीद और आस्था का मुद्दा
मौलाना मदनी ने कहा कि भारत में मुसलमान सदियों से रहते आए हैं और उनका अक़ीदा किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रकृति से मोहब्बत करना और उसकी हिफ़ाज़त करना अलग बात है, जबकि उसकी पूजा करना अलग। जमीयत के अनुसार यह फर्क समझना हर ज़िम्मेदार शख़्स के लिए ज़रूरी है।
वतन और पूजा का अंतर
जमीयत ने अपने बयान में कहा कि भारतीय मुसलमान वतन से मोहब्बत करते हैं, लेकिन वतन को पूज्य नहीं मानते। संगठन के अनुसार “प्रिय” और “पूज्य” के बीच का अंतर संवैधानिक और सामाजिक दृष्टि से अहम है। जमीयत ने कहा कि देश की मिट्टी, नदियों और पर्यावरण की रक्षा नागरिक कर्तव्य है, लेकिन आस्था का प्रश्न निजी विश्वास से जुड़ा है।
संवाद की कोशिशों का ज़िक्र
मौलाना मदनी ने यह भी बताया कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अतीत में संवाद के रास्ते अपनाए हैं। उन्होंने कहा कि पहले भी संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों से बातचीत हुई है और आज भी जमीयत dialogue के लिए तैयार है। संगठन का कहना है कि बातचीत से गलतफहमियां दूर हो सकती हैं।
उग्र बयान पर आपत्ति
जमीयत ने कहा कि हाल के वर्षों में कुछ बयानों की भाषा अधिक तीखी और उकसावे वाली रही है। संगठन के अनुसार किसी भी समुदाय पर उसकी पूजा पद्धति थोपना स्वीकार्य नहीं है। यह बात सामाजिक harmony और constitutional values के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।
राष्ट्र की अवधारणा पर रुख
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अपने बयान में कहा कि भारत में राष्ट्र की अवधारणा वतन पर आधारित है। संगठन ने दोहराया कि इस देश में रहने वाले सभी नागरिक, चाहे उनका धर्म या विचारधारा कुछ भी हो, समान रूप से राष्ट्र का हिस्सा हैं। जमीयत के अनुसार राष्ट्र को किसी एक community या cultural सोच से जोड़ना संविधान की भावना के खिलाफ है।
अंबेडकर का संदर्भ
मौलाना मदनी ने डॉ. भीमराव अंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि भारत में अनेक संस्कृतियां मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने भी माना था कि भारत केवल एक संस्कृति वाला देश नहीं है। ऐसे में राष्ट्रवाद का आधार किसी एक संस्कृति को नहीं बनाया जा सकता।
राष्ट्रीय एकता पर ज़ोर
जमीयत ने कहा कि देश के विकास और progress के लिए national unity और communal harmony को मजबूत करना ज़रूरी है। संगठन के अनुसार इसके लिए आपसी सम्मान, गंभीर संवाद और संविधान में दिए गए अधिकारों की रक्षा अहम है।
मौजूदा हालात में संदेश
अपने बयान के अंत में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कहा कि भारत की विविधता उसकी ताकत है। संगठन ने सभी पक्षों से संयम बरतने और जिम्मेदार भाषा के इस्तेमाल की अपील की, ताकि सामाजिक सौहार्द बना रहे।




