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तनाव प्रबंधन: सेहत और सुकून की राह
बढ़ता स्ट्रेस और हेल्थ पर असर
रोज़मर्रा की जिंदगी में तनाव एक आम अनुभव है, लेकिन उसका असर शरीर और ज़ेहन दोनों पर पड़ता है। सही तरीके से संभाला जाए तो यही दबाव ताक़त बन सकता है।तनाव जीवन का हिस्सा है, मगर लगातार दबाव से सेहत प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, कारण पहचानना, संतुलन बनाना और सही प्रबंधन अपनाना ज़रूरी है।
📍 नई दिल्ली ✍️ डॉ संजय अग्रवाल
मानसिक दबाव से निपटने के तरीके
तनाव क्या है और क्यों बढ़ रहा है
तनाव उस प्रतिक्रिया को कहा जाता है जो शरीर और मन किसी दबाव, चुनौती या बदलाव के सामने देते हैं। आधुनिक जीवन में तेज़ रफ़्तार लाइफ़स्टाइल, वर्क प्रेशर, फैमिली रिस्पॉन्सिबिलिटी और फाइनेंशियल चिंताएँ लोगों के लिए लगातार स्ट्रेस का कारण बन रही हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि सीमित मात्रा में तनाव व्यक्ति को सतर्क और सक्रिय रखता है। लेकिन जब यह दबाव लगातार बना रहे और उसे संभालने के उपाय न हों, तब यह शारीरिक और मानसिक सेहत पर असर डाल सकता है।
दीर्घकालिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति और पेचीदा हो जाती है। गठिया, अस्थमा, हृदय रोग या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित व्यक्तियों को इलाज, दवाइयों के साइड इफेक्ट, मेडिकल खर्च और भविष्य की अनिश्चितता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
शारीरिक प्रभाव: शरीर की प्रतिक्रिया
जब व्यक्ति तनाव में होता है, तो शरीर कई रासायनिक परिवर्तन से गुजरता है। हार्मोनल बदलाव के कारण हृदय गति तेज़ हो जाती है, रक्तचाप बढ़ सकता है, सांसों की दर तेज़ हो जाती है और मांसपेशियों में खिंचाव आता है।
यह प्रतिक्रिया शरीर को “फाइट या फ्लाइट” स्थिति के लिए तैयार करती है। किसी प्रस्तुति से पहले घबराहट, अचानक हादसे में प्रतिक्रिया या किसी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में त्वरित निर्णय इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
यदि स्थिति सामान्य हो जाए तो शरीर धीरे-धीरे संतुलन में लौट आता है। लेकिन लगातार स्ट्रेस रहने पर यह संतुलन बिगड़ सकता है। लंबे समय तक बना दबाव थकान, सिरदर्द, पाचन समस्या और नींद की गड़बड़ी का कारण बन सकता है।
मानसिक प्रभाव: ज़ेहन पर असर
तनाव का असर केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता। मानसिक स्तर पर व्यक्ति गुस्सा, बेचैनी, घबराहट, मायूसी या चिड़चिड़ापन महसूस कर सकता है।
कुछ मामलों में हल्का दबाव प्रदर्शन को बेहतर बनाता है। परीक्षा, खेल प्रतियोगिता या मंच पर बोलते समय थोड़ी घबराहट फोकस बढ़ा सकती है। लेकिन अत्यधिक दबाव से व्यक्ति निर्णय लेने में गलती कर सकता है या काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता।
विशेषज्ञ इसे वायलिन की तार से तुलना करते हैं। यदि तार बहुत ढीली हो तो आवाज़ नहीं निकलेगी, और अगर बहुत कस दी जाए तो टूट सकती है। संतुलन ही समाधान है।
अलग-अलग लोगों की अलग प्रतिक्रिया
हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग होती है। कोई व्यस्त रहकर राहत पाता है, तो कोई शांति में सुकून ढूंढता है। एक परिस्थिति जो किसी के लिए सामान्य हो, दूसरे के लिए दबावपूर्ण हो सकती है।
इसलिए तनाव को समझना और अपनी सीमाओं को पहचानना अहम है।
तनाव के सामान्य लक्षण
तनाव की पहचान उसके लक्षणों से की जा सकती है। इनमें शामिल हैं:
अत्यधिक थकान
मांसपेशियों में जकड़न
अपच या पेट दर्द
अनिद्रा
हाथों में पसीना या ठंडापन
भूख में बदलाव
सिरदर्द या पीठ दर्द
ध्यान में कमी
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है, क्योंकि कुछ लक्षण अन्य बीमारियों से भी जुड़े हो सकते हैं।
तनाव प्रबंधन: तीन मुख्य चरण
तनाव को संभालने के लिए विशेषज्ञ तीन मुख्य बिंदु बताते हैं:
कारण पहचानना
जो न बदला जा सके उसे स्वीकार करना
हानिकारक प्रभावों को कम करना
कारण पहचानें
विशेषज्ञ “स्ट्रेस डायरी” रखने की सलाह देते हैं। इसमें दिनभर की घटनाओं और उनसे जुड़े भावनात्मक तथा शारीरिक अनुभव लिखे जा सकते हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कौन-सी परिस्थितियाँ अधिक दबाव पैदा करती हैं।
सीमाएँ तय करें
जब जिम्मेदारियाँ अधिक हों तो ‘ना’ कहना भी एक कौशल है। हर काम को स्वीकार करना जरूरी नहीं। समय और ऊर्जा की सीमा को समझना मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
विचार साझा करें
दोस्तों, परिवार या सहकर्मियों से बातचीत करना राहत दे सकता है। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से अपनी बात साझा करना भावनात्मक बोझ कम करता है।
सकारात्मक गतिविधियाँ अपनाएँ
विशेषज्ञ “सेफ्टी वाल्व” गतिविधियों की सलाह देते हैं, जैसे संगीत सुनना, टहलना, तैराकी, बागवानी या किसी शौक में समय देना। ये गतिविधियाँ तनाव को कम करने में सहायक हो सकती हैं।
अवसाद के संकेतों पर ध्यान
दीर्घकालिक बीमारी या अचानक जीवन में बदलाव के बाद उदासी सामान्य हो सकती है। लेकिन यदि दो सप्ताह से अधिक समय तक गहरी निराशा, नींद में कमी, भूख में बदलाव, बेचैनी या असामान्य थकान बनी रहे तो चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
पेशेवर काउंसलिंग या थेरेपी कई मामलों में सहायक साबित होती है। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि रोना या भावनाएँ व्यक्त करना कमजोरी नहीं है, बल्कि तनाव कम करने का स्वाभाविक तरीका है।
संतुलन ही समाधान
तनाव को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं, लेकिन उसे संतुलित रखना संभव है। सही प्रबंधन, नियमित दिनचर्या, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और सामाजिक संपर्क मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बना सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि तनाव प्रबंधन एक कौशल है, जिसे अभ्यास से सीखा जा सकता है। सही जानकारी और समय पर सहायता से व्यक्ति दबाव को अपनी ताकत में बदल सकता है।

डॉ. संजय अग्रवाल
वैज्ञानिक सलाहकार,
एल्कोमेक्स जीबीएन फार्मा ग्रुप, यू.एस.ए.




