
दलित न्याय की राजनीति और चंद्रशेखर आजाद
मेरठ के कपसाड़ गांव में दलित महिला की हत्या और बेटी के अपहरण ने सिर्फ कानून व्यवस्था ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति को भी हिला दिया है। नगीना सांसद चंद्रशेखर आज़ाद का पुलिस नाकेबंदी तोड़कर गांव पहुंचना इस पूरे संकट का सबसे तीखा प्रतीक बन गया है।
कपसाड़ कांड ने राज्य में दलित सुरक्षा, पुलिस की भूमिका और राजनीतिक नैतिकता पर नए सवाल खड़े किए हैं। चंद्रशेखर आज़ाद की एंट्री ने पीड़ित परिवार को आवाज दी, लेकिन साथ ही राजनीति के कई पुराने घाव भी फिर से हरे हो गए।
कपसाड़ की चुप्पी और टूटती हुई रेखाएं
कपसाड़ गांव आज एक अजीब सी ख़ामोशी में डूबा है। खेतों में गन्ने की महक है, लेकिन हवा में डर और ग़ुस्सा घुला हुआ है। एक दलित मां की मौत और उसकी बेटी का ग़ायब हो जाना सिर्फ एक अपराध नहीं रहा, यह समाज की उस दरार को दिखा रहा है जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। गांव का हर आदमी जानता है कि यह कहानी किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि उस ढांचे की है जहां ताक़त और जात अक्सर इंसाफ़ से भारी पड़ जाते हैं। एक बुज़ुर्ग ने धीरे से कहा कि पहले भी झगड़े हुए थे, पर इस बार बात जान पर आ गई।
पुलिस की नाकेबंदी और सवालों की दीवार
जब पुलिस ने दिल्ली से मेरठ तक चार स्तर की नाकेबंदी बनाई, तो यह दावा किया गया कि यह सब क़ानून व्यवस्था के लिए है। मगर सवाल यह है कि क्या इतनी ताक़त अपराधियों को पकड़ने में दिखी। आठ टीमें बनीं, नाके लगे, पर लड़की अभी भी घर नहीं लौटी। आम आदमी के लिए यह दृश्य थोड़ा अजीब है। जैसे किसी घर में आग लगी हो और दमकल दरवाज़े पर खड़ी बहस कर रही हो कि पहले कौन अंदर जाएगा। पुलिस का काम शांति बनाए रखना है, लेकिन शांति तब आती है जब पीड़ित को इंसाफ़ मिलता है, न कि जब नेताओं को रास्ते में रोका जाता है।
चंद्रशेखर का दौड़ता हुआ प्रतीक
नगीना के सांसद चंद्रशेखर आज़ाद का गाड़ी छोड़कर दौड़ना और फिर बाइक से गांव पहुंचना एक मार्मिक दृश्य बन गया। समर्थकों के लिए यह साहस की मिसाल है, आलोचकों के लिए यह एक सियासी स्टंट। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है। वह एक ऐसे नेता हैं जो सड़क पर उतरने से डरते नहीं, पर यह भी सच है कि हर ऐसी तस्वीर उनके राजनीतिक ब्रांड को और तेज़ बनाती है। जैसे कोई खिलाड़ी मैदान में गिरकर भी कैमरे की तरफ़ मुस्कुरा दे, वैसे ही राजनीति में भी हर कदम कई अर्थ रखता है।
पीड़ित परिवार और असली मुद्दा
इस सारी भागदौड़ में कहीं हम उस मां और बेटी को भूल न जाएं जिनके लिए यह सब हो रहा है। परिवार को न तो बड़ी रैलियों की ज़रूरत है और न ही लंबे भाषणों की। उन्हें चाहिए कि लड़की सुरक्षित लौट आए और दोषियों को सज़ा मिले। गांव की एक औरत ने कहा कि जब तक बेटी नहीं मिलती, तब तक हर नेता की बात खोखली लगती है। यह बात सख़्त है, पर सच है। इंसाफ़ की घड़ी में संवेदना सबसे बड़ा हथियार होती है, और वही सबसे कम दिख रही है।
जात, सत्ता और एक पुरानी कहानी
उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार की कहानियां नई नहीं हैं। हर कुछ महीनों में कोई न कोई मामला सुर्ख़ियों में आता है, फिर धीरे धीरे ख़ामोश हो जाता है। सवाल यह है कि क्यों हर बार वही पैटर्न दोहराया जाता है। क्या यह सिर्फ़ क़ानून की नाकामी है या समाज की भी। जब एक अलग जात का युवक बेख़ौफ़ होकर हमला करता है, तो उसके पीछे सिर्फ़ अपराध नहीं, बल्कि एक मानसिकता भी होती है। वह मानसिकता जो कहती है कि कुछ लोगों की जान कम क़ीमती है।
राजनीति की दोहरी ज़ुबान
चंद्रशेखर आजाद ने बुलडोज़र की बात उठाई, जो इन दिनों सत्ता की एक पहचान बन चुका है। जब अपराधी ताक़तवर होते हैं, तो मशीनें तेज़ चलती हैं, और जब मामला कमज़ोरों का होता है, तो फ़ाइलें धीमी हो जाती हैं। यह दोहरा मापदंड लोगों को ग़ुस्सा दिलाता है। विपक्ष इसे भुनाता है, सरकार इसे नकारती है, और बीच में पीड़ित फंस जाता है। राजनीति का यह खेल नया नहीं, पर हर बार इसकी क़ीमत कोई आम परिवार चुकाता है।
क्या चंद्रशेखर आजाद ही आख़िरी उम्मीद हैं
कुछ लोग मानते हैं कि वह दलितों की आवाज़ हैं, कुछ कहते हैं कि वह विवादों में घिरे नेता हैं। दोनों बातें एक साथ सही हो सकती हैं। उन्होंने कई बार सड़क पर उतरकर मुद्दे उठाए हैं, पर उनके अपने मामलों ने भी उनकी छवि को धुंधला किया है। यह वही दुविधा है जैसे किसी डॉक्टर पर आरोप हों, लेकिन उसी डॉक्टर के पास आपके बच्चे की जान बचाने की काबिलियत भी हो। आप क्या करेंगे, यही सवाल दलित राजनीति के सामने भी है।
मीडिया, कैमरा और सच्चाई
टीवी पर दौड़ते चंद्रशेखर आजाद की तस्वीरें बार बार चलीं, पर खेत में गिरी उस महिला की कहानी उतनी जगह नहीं पाई। यह हमारी प्राथमिकताओं को दिखाता है। कैमरा वहां जाता है जहां ड्रामा है, पर सच्चाई अक्सर ख़ामोशी में पड़ी रहती है। अगर हम सच में बदलाव चाहते हैं, तो हमें उन आवाज़ों को सुनना होगा जो माइक्रोफोन तक नहीं पहुंच पातीं।
आगे का रास्ता
कपसाड़ का मामला अदालत में जाएगा, जांच चलेगी, बयान होंगे। पर असली इम्तिहान सरकार और समाज दोनों का है। क्या लड़की सुरक्षित लौटेगी, क्या दोषियों को सज़ा मिलेगी, और क्या अगली बार किसी और गांव में वही कहानी नहीं दोहराई जाएगी। चंद्रशेखर आजाद की राजनीति भी इसी पर आंकी जाएगी। अगर वह सिर्फ़ कैमरे तक सीमित रहे, तो लोग थक जाएंगे। अगर वह सिस्टम पर लगातार दबाव बनाए रखें, तो शायद कुछ बदले।
एक साधारण उम्मीद
अंत में बात बहुत साधारण है। एक मां अपनी बेटी को सुरक्षित देखना चाहती थी, और वह ज़िंदा नहीं रही। एक बेटी कहीं डर में छिपी होगी। इस देश की राजनीति, पुलिस और समाज का फ़र्ज़ है कि वह उसे घर वापस लाए। बाक़ी सब बहसें बाद में होती रहेंगी।






