
Prime Minister Narendra Modi welcomes Russian President Vladimir Putin in New Delhi during the India-Russia summit | Shah Times
भारत-रूस रिश्तों की नई दिशा,रक्षा, ऊर्जा और दोस्ती के नए मायने
📍नई दिल्ली ✍️ Asif Khan
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात केवल औपचारिक कूटनीति नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति में भारत-रूस रिश्तों की नई कसौटी है। रक्षा सौदे, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और रणनीतिक संतुलन इस दौरे के मुख्य केंद्र हैं।
दिल्ली में पुतिन और बदलती वैश्विक सियासत
चार साल बाद जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद एयरपोर्ट जाकर उनका स्वागत किया, तो यह सिर्फ एक प्रोटोकॉल भर नहीं था। यह एक सियासी इशारा था। ऐसा इशारा जो दुनिया को यह बताता है कि तमाम भू-राजनीतिक दबावों के बावजूद भारत अपने रणनीतिक रिश्तों को अपनी शर्तों पर निभाना जानता है। दोनों नेताओं का एक ही गाड़ी में बैठकर प्रधानमंत्री आवास तक आना, साथ बैठकर निजी डिनर करना, और फिर बंद कमरे में होने वाली बातचीत, यह सब केवल कैमरों के लिए नहीं था, बल्कि संदेशों की भाषा थी।
आज की दुनिया में रिश्ते भावनाओं से नहीं, हितों से चलते हैं। भारत और रूस का रिश्ता भी अब इसी कसौटी पर खड़ा है। फर्क सिर्फ यह है कि इस रिश्ते में यादें भी हैं और ज़रूरतें भी। एक तरफ रूस पश्चिमी प्रतिबंधों से जूझ रहा है, दूसरी तरफ भारत अपनी सुरक्षा, ऊर्जा और आर्थिक विकास के लिए हर विकल्प खुला रखना चाहता है। यही वजह है कि यह मुलाकात जितनी गर्मजोशी से भरी दिख रही है, उतनी ही व्यावहारिक भी है।
अगर आम आदमी की नज़र से देखें, तो सवाल सीधा है, हमें इससे क्या मिलेगा। जवाब भी सीधा नहीं है। रक्षा के क्षेत्र में संभावित सौदे, जैसे एसयू-सत्तावन फाइटर जेट और एस-पांच सौ एयर डिफेंस सिस्टम, भारत की सैन्य ताकत को नई ऊंचाई दे सकते हैं। लेकिन इसके साथ ही अमेरिका और यूरोप से आने वाला दबाव भी बढ़ सकता है। यह वही नैतिक दुविधा है, जिसमें भारत अक्सर खड़ा दिखता है। दोस्ती निभाएं या वैश्विक संतुलन साधें।
यह बात भी समझनी होगी कि भारत अब वह देश नहीं रहा, जो सिर्फ एक तरफ झुककर फैसले करता था। आज दिल्ली वाशिंगटन से भी बात करती है, मास्को से भी, और साथ ही पेरिस, टोक्यो और तेल अवीव से भी। यही बहुपक्षीय नीति आज भारत की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है। पुतिन का भारत आना इसी नीति की एक कड़ी है।
रक्षा सौदों की बात करें तो तस्वीर बहुत आकर्षक लगती है। पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट, लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें, और ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम जो हाइपरसोनिक हथियारों को भी रोक सकता है। यह सब सुनने में किसी विज्ञान-कथा जैसा लगता है, लेकिन आधुनिक युद्ध की यही सच्चाई है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हथियारों की यह दौड़ वास्तव में सुरक्षा की गारंटी दे सकती है। इतिहास बताता है कि हथियार युद्ध की आशंका बढ़ाते हैं, शांति की गारंटी नहीं।
यहां एक आम नागरिक का उदाहरण याद आता है। मान लीजिए किसी मोहल्ले में दो लोग लगातार लाठी और डंडे जमा करने लगें, तो तीसरा व्यक्ति भी खुद को असुरक्षित महसूस करेगा। फिर वह भी हथियार जुटाने लगेगा। यही हाल देशों का भी है। जब चीन अपनी ताकत बढ़ाता है, पाकिस्तान नए सिस्टम खरीदता है, तो भारत भी खुद को पीछे नहीं छोड़ सकता। यह एक अंतहीन चक्र है।
लेकिन भारत-रूस संबंध सिर्फ रक्षा तक सीमित नहीं हैं। ऊर्जा का क्षेत्र शायद इससे भी ज़्यादा अहम है। सस्ता कच्चा तेल, गैस की आपूर्ति, और आर्कटिक क्षेत्र में संभावित निवेश, यह सब भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद ज़रूरी है। आज जब आम आदमी महंगाई से जूझ रहा है, पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें हर घर का बजट बिगाड़ रही हैं, तब ऊर्जा समझौते सिर्फ विदेशी नीति नहीं, घरेलू राहत का भी मामला बन जाते हैं।
भुगतान प्रणाली का सवाल भी उतना ही संवेदनशील है। डॉलर पर निर्भरता कम करना भारत और रूस दोनों के हित में है। रुपया-रूबल व्यापार, वैकल्पिक डिजिटल सिस्टम, या किसी तीसरे देश के बैंक का इस्तेमाल, यह सब तकनीकी बातें लग सकती हैं, लेकिन इनके असर हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी पर पड़ते हैं। जब भुगतान में रुकावट आती है, तो व्यापार रुकता है, और जब व्यापार रुकता है, तो रोज़गार पर असर पड़ता है।
एक और बड़ा पहलू है प्रवासी कामगारों का। रूस में युद्ध के बाद कई क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी है। अगर भारतीय इंजीनियर, मेडिकल स्टाफ और तकनीकी कर्मचारी वहां जाते हैं, तो यह रेमिटेंस के रूप में देश को आर्थिक फायदा भी देगा। मगर इसके साथ जोखिम भी जुड़े हैं। सुरक्षा, भाषा की बाधा, सामाजिक माहौल, और राजनीतिक अस्थिरता, यह सब आसान सवाल नहीं हैं। सरकार के लिए चुनौती यही होगी कि वह अवसर और सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाए।
अब ज़रा वैश्विक राजनीति के बड़े कैनवस पर नजर डालें। अमेरिका लंबे समय से भारत को अपने रणनीतिक पाले में पूरी तरह देखना चाहता है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को संतुलित करने के लिए भारत एक अहम मोहरा है। ऐसे में भारत का रूस के साथ इतने बड़े रक्षा सौदों पर आगे बढ़ना वाशिंगटन को असहज जरूर करेगा। सीएएटीएसए जैसे कानूनों का डर भी यहीं से पैदा होता है। सवाल यह नहीं है कि अमेरिका नाराज़ होगा या नहीं, सवाल यह है कि भारत उस नाराज़गी की कितनी परवाह करता है।
प्रधानमंत्री मोदी की नीति अब तक यही रही है कि भारत किसी एक खेमे का हिस्सा नहीं बनेगा। यह नीति सुनने में ऊंचे आदर्श जैसी लगती है, लेकिन इसे निभाना आसान नहीं होता। एक तरफ पुरानी दोस्ती है, दूसरी तरफ नई साझेदारी। एक तरफ सस्ता तेल है, दूसरी तरफ तकनीक और निवेश का बड़ा बाज़ार। ऐसे में हर फैसला कई परतों में बंटा होता है।
कुछ लोग पूछते हैं कि रूस आखिर भारत को इतनी तकनीक क्यों देना चाहता है। इसका जवाब भी सीधा है। रूस को आज नए बाज़ार चाहिए, नए भरोसेमंद साझेदार चाहिए, और आर्थिक प्रतिबंधों के बीच उसे ऐसे दोस्तों की जरूरत है जो खुलकर उसका हाथ थाम सकें। भारत इस मामले में सबसे भरोसेमंद विकल्पों में से एक है। यहां न तो नीति हर साल बदलती है, न ही नेतृत्व हर कुछ महीनों में।
लेकिन भारत के सामने भी सरल रास्ता नहीं है। अगर भारत पूरी तरह रूस पर निर्भर होता है, तो पश्चिमी दुनिया के साथ उसके रिश्तों में तनाव आ सकता है। अगर भारत रूस से दूरी बनाता है, तो दशकों पुरानी रक्षा साझेदारी कमजोर पड़ सकती है। यही वह दोराहा है जहां आज भारत खड़ा है।
यह मुलाकात सिर्फ समझौतों की फेहरिस्त नहीं है। यह भरोसे की परीक्षा भी है। जब मोदी रूसी भाषा में लिखी गीता भेंट करते हैं, तो वह सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं होता, वह सांस्कृतिक पुल होता है। उसी तरह जब पुतिन भारतीय परंपराओं का सम्मान करते हैं, तो वह भी एक संकेत होता है कि यह रिश्ता सिर्फ फाइलों और दस्तखतों तक सीमित नहीं है।
फिर भी, हमें रोमांटिक होने से पहले यथार्थवादी होना होगा। रूस आज भी यूक्रेन युद्ध में फंसा है, उसकी अर्थव्यवस्था दबाव में है, और उसकी वैश्विक साख को चुनौती मिली हुई है। ऐसे में भारत अगर हर दांव रूस के साथ लगाए, तो यह जोखिम भरा भी हो सकता है। दूसरी तरफ, भारत अगर बहुत ज्यादा सतर्कता दिखाए, तो भरोसा कमज़ोर पड़ सकता है। यही संतुलन की सबसे कठिन परीक्षा है।
रक्षा उद्योग के लिए यह दौरा उम्मीदों से भरा है। भारत की सार्वजनिक कंपनियां पहले से ही सपनों की उड़ान में हैं। लेकिन शेयर बाज़ार की चमक और ज़मीनी सच्चाई में अक्सर फर्क होता है। सौदे होते हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन डिलीवरी में समय लगता है। कई बार तकनीकी अड़चनें आती हैं, कभी भुगतान में देरी होती है, तो कभी राजनीतिक समीकरण बदल जाते हैं। इसलिए बहुत ज़्यादा उम्मीदें बांधना भी समझदारी नहीं होगी।
एक आम पाठक के लिए सवाल यह भी है कि क्या इतने बड़े रक्षा सौदे स्कूल, अस्पताल और रोज़गार से ज़्यादा ज़रूरी हैं। यह सवाल जायज़ है। सरकार का तर्क होगा कि बिना सुरक्षा के विकास भी सुरक्षित नहीं होता। आलोचक कहेंगे कि हथियारों की भूख कभी खत्म नहीं होती। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है।
भारत-रूस व्यापार को एक सौ अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य भी बड़ा और आकर्षक है। लेकिन लक्ष्य तभी मायने रखता है जब उसके पीछे ठोस ज़मीन हो। लॉजिस्टिक्स, भुगतान, बीमा, और राजनीतिक स्थिरता, यह सब ऐसे कारक हैं जो कागज़ी लक्ष्य को हकीकत बना भी सकते हैं और सपना भी रहने दे सकते हैं।
आज की वैश्विक राजनीति भावनाओं से नहीं, गणनाओं से चलती है। पुतिन और मोदी की मुस्कानें कैमरों को भले अच्छी तस्वीरें देती हों, लेकिन असली तस्वीर बैठकों के बंद कमरों में बनती है। वहां शब्द तौले जाते हैं, शर्तें लिखी जाती हैं, और भविष्य की दिशा तय होती है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात है भारत का आत्मविश्वास। एक समय था जब भारत किसी बड़े देश के सामने खड़ा होने से पहले कई बार सोचता था। आज भारत खुले मंच पर अपनी बात रखता है, अपने हितों की बात करता है, और ज़रूरत पड़े तो ना भी कहता है। यही बदलाव इस मुलाकात की सबसे बड़ी उपलब्धि भी माना जा सकता है।अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि मोदी-पुतिन मुलाकात केवल दो नेताओं की दोस्ती का दृश्य नहीं है। यह बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका की एक झलक है। यह दिखाता है कि भारत अब सिर्फ प्रतिक्रियाशील नहीं, बल्कि पहल करने वाला देश बन चुका है। यह राह आसान नहीं है, लेकिन यही राह आने वाले दशक की दिशा तय करेगी।





