
उत्तराखंड मदरसा बोर्ड: तालीम में तब्दीली और मेनस्ट्रीम क़दम
मदरसों में एनसीईआरटी और संस्कृत: बोर्ड चेयरमैन मुफ़्ती शमून क़ासमी की बात
उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन मुफ़्ती शमून क़ासमी ने मुज़फ़्फ़रनगर दौरे में तालीम, मदरसा आधुनिकीकरण और समाजी हमआहंगी पर अपने विचार रखे। उन्होंने रजिस्ट्रेशन, एनसीईआरटी सिलेबस, संस्कृत की पढ़ाई और क़ानूनी पहलुओं पर जानकारी दी।
📍 Muzaffarnagar ✍️ Israr Khan
उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन मुफ़्ती शमून क़ासमी ने बताया कि उत्तराखंड में रजिस्टर्ड मदरसों में एनसीईआरटी सिलेबस लागू है और तालीम को मेनस्ट्रीम से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने क़ानूनी ढांचे, अल्पसंख्यक समूहों की भागीदारी और समाजी सौहार्द पर ज़ोर दिया।
दौरे का मक़सद और बातचीत का दायरा
उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन मुफ़्ती शमून क़ासमी मुज़फ़्फ़रनगर के दौरे पर रहे, जहां उन्होंने तालीम से जुड़े कई अहम मुद्दों पर बातचीत की। इस दौरान मदरसा तालीम में सुधार, सिलेबस का अपडेट, क़ानूनी प्रक्रिया, और समाजी हमआहंगी जैसे विषय सामने आए। बातचीत का फ़ोकस बच्चों की पढ़ाई, मेनस्ट्रीम एजुकेशन से जुड़ाव और क़ानूनी रूप से मान्य संस्थानों के संचालन पर रहा।
उत्तराखंड में मदरसा आधुनिकीकरण
मुफ़्ती शमून क़ासमी ने जानकारी दी कि उत्तराखंड में कुल 452 मदरसे रजिस्टर्ड हैं। उनके अनुसार, 2023 में ज़िम्मेदारी संभालने के बाद रजिस्टर्ड मदरसों में एनसीईआरटी सिलेबस को अपनाया गया है। इस क़दम का उद्देश्य छात्रों को स्टैंडर्ड एजुकेशन फ्रेमवर्क से जोड़ना है, ताकि वे आगे की पढ़ाई और करियर के लिए तैयार हो सकें।
उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया ट्रांसपेरेंट रजिस्ट्रेशन और रेगुलर मॉनिटरिंग के साथ लागू की गई है, ताकि तालीम की क्वालिटी बनी रहे।
नया क़ानून और अल्पसंख्यक समूह
बातचीत में एक नए एक्ट का ज़िक्र करते हुए मुफ़्ती क़ासमी ने बताया कि उत्तराखंड सरकार ने मदरसा बोर्ड की मान्यता को सिर्फ़ एक समुदाय तक सीमित न रखकर अन्य अल्पसंख्यक समूहों तक बढ़ाया है। इसके तहत सिख, क्रिश्चियन, बुद्धिस्ट, पारसी और जैन समुदाय के शैक्षणिक संस्थान भी बोर्ड के तहत रजिस्ट्रेशन और अकादमिक गाइडलाइंस का लाभ ले सकते हैं।
उनके अनुसार, इस पहल का मक़सद सभी बच्चों को मेनस्ट्रीम एजुकेशन से जोड़ना और एक समान अकादमिक ढांचा उपलब्ध कराना है।
मदरसों में संस्कृत की पढ़ाई
मुफ़्ती शमून क़ासमी ने मदरसों में संस्कृत पढ़ाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि संस्कृत और अरबी के बीच अकादमिक समानताएं हैं और दोनों भाषाएं क्लासिकल नॉलेज की समझ में मदद करती हैं। उनके अनुसार, संस्कृत पढ़ने से छात्रों को वैदिक साहित्य की जानकारी मिलती है, जिससे विभिन्न धार्मिक ग्रंथों के बीच मौजूद कॉमन एलिमेंट्स को समझने में सहायता होती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सुझाव अकादमिक अप्रोच के तहत है, ताकि छात्रों का नॉलेज बेस व्यापक हो।
मुस्लिम तालीम से जुड़े चैलेंज
बातचीत के दौरान मुफ़्ती क़ासमी ने मुस्लिम समाज में तालीम के ऐतिहासिक स्तर पर कमज़ोर रहने के कारणों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि बीते दशकों में तालीमी इंफ़्रास्ट्रक्चर पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पुराने दौर में ज़मींदारों और समुदाय के प्रभावशाली लोगों द्वारा स्कूल और कॉलेज स्थापित नहीं किए गए, जिससे तालीम का विस्तार सीमित रहा।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि मौजूदा समय में माता-पिता को बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता देनी चाहिए।
मदरसे और मज़ार: क़ानूनी स्थिति
मुफ़्ती शमून क़ासमी ने उत्तराखंड में मदरसों और मज़ारों से जुड़े क़ानूनी मुद्दों पर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि सरकार की कार्रवाई सिर्फ़ उन संरचनाओं के ख़िलाफ़ होती है जो बिना दस्तावेज़ या अवैध ज़मीन पर बनी होती हैं।
उनके अनुसार, वैध रूप से रजिस्टर्ड और क़ानूनी दस्तावेज़ों वाले संस्थानों को किसी तरह की समस्या नहीं है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि कार्रवाई का आधार क़ानून है, न कि किसी समुदाय को टार्गेट करना।
समाजी हमआहंगी और अवेयरनेस
बातचीत में समाजी सौहार्द का मुद्दा भी प्रमुख रहा। मुफ़्ती क़ासमी ने कहा कि तालीम के साथ-साथ अच्छा अख़लाक़ और ज़िम्मेदार नागरिक बनना भी ज़रूरी है। उन्होंने माता-पिता से अपील की कि बच्चों को पढ़ाई पर फ़ोकस रखने और किसी भी तरह की ग़लत जानकारी से दूर रखने में मदद करें।
उन्होंने कहा कि अवेयरनेस और एजुकेशन से समाज में शांति और आपसी समझ को बढ़ावा मिलता है।
सरकारी योजनाएं और लाभ
मुफ़्ती शमून क़ासमी ने केंद्र सरकार की विभिन्न स्कीम्स का ज़िक्र करते हुए कहा कि योजनाएं सभी नागरिकों के लिए हैं और उनका लाभ बिना भेदभाव के मिलता है। उन्होंने कहा कि एजुकेशन, स्कॉलरशिप और स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम्स का उद्देश्य युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना है।
उन्होंने अभिभावकों से कहा कि उपलब्ध योजनाओं की जानकारी लेकर बच्चों को आगे बढ़ने के मौके दें।
मुज़फ़्फ़रनगर में संवाद
मुज़फ़्फ़रनगर दौरे के दौरान मुफ़्ती क़ासमी ने स्थानीय लोगों, तालीमी कार्यकर्ताओं और मदरसा प्रबंधन से भी मुलाक़ात की। इस दौरान तालीम की क्वालिटी, सिलेबस इंटीग्रेशन और प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल-जवाब हुए।
उन्होंने कहा कि बोर्ड का प्रयास है कि मदरसों में पढ़ने वाले छात्र मेनस्ट्रीम एजुकेशन के साथ तालमेल बिठा सकें।
एजुकेशन और कैरेक्टर बिल्डिंग
बातचीत के अंत में मुफ़्ती शमून क़ासमी ने एजुकेशन के साथ कैरेक्टर बिल्डिंग की अहमियत पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि तालीम का मक़सद सिर्फ़ डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि समाज के लिए ज़िम्मेदार इंसान तैयार करना है।
उनके अनुसार, अच्छी तालीम और अच्छा व्यवहार किसी भी समुदाय की तरक़्क़ी का आधार होता है।




