
1 अप्रैल से लागू होंगे आरबीआई के सख्त क्रेडिट नियम
शेयर बाजार से जुड़े कर्ज नियमों में व्यापक संशोधन
रिजर्व बैंक ने कमर्शियल बैंकों के लिए नए क्रेडिट निर्देश जारी किए हैं.
नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे और ब्रोकर्स की फंडिंग पूरी तरह सुरक्षित आधार पर होगी.
आरबीआई के नए निर्देशों के तहत बैंकों द्वारा स्टॉक ब्रोकर्स और इंटरमीडियरीज को दिए जाने वाले कर्ज के नियम सख्त किए गए हैं. पूरी तरह सुरक्षित फंडिंग, ज्यादा कोलेटरल और प्रॉप ट्रेडिंग पर रोक इसके प्रमुख बिंदु हैं.
📍नई दिल्ली ✍️ Asif Khan
ब्रोकर्स की फंडिंग पर आरबीआई की नई गाइडलाइंस
रिजर्व बैंक ने कमर्शियल बैंक क्रेडिट फैसिलिटीज अमेंडमेंट डायरेक्शंस 2026 जारी किए हैं. यह निर्देश बैंकिंग सिस्टम को कैपिटल मार्केट की अस्थिरता से बचाने के उद्देश्य से लाए गए हैं. नए नियम 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होंगे. इनका दायरा स्टॉक ब्रोकर्स, क्लियरिंग मेंबर्स और अन्य मार्केट इंटरमीडियरीज तक फैला है.
नए निर्देशों के अनुसार, अब बैंकों को किसी भी तरह की फंडिंग केवल पूरी तरह सुरक्षित आधार पर ही देनी होगी. आंशिक गारंटी या केवल प्रमोटर गारंटी के भरोसे फंडिंग की अनुमति नहीं होगी.
पूरी तरह सुरक्षित फंडिंग की अनिवार्यता
अब बैंक किसी भी ब्रोकरेज या इंटरमीडियरी को तभी कर्ज दे सकेंगे, जब उसके पीछे ठोस और पर्याप्त सिक्योरिटी होगी. पहले के नियमों में कुछ मामलों में आंशिक गारंटी या व्यक्तिगत आश्वासन स्वीकार्य था, लेकिन नए ढांचे में ऐसा संभव नहीं रहेगा.
इस बदलाव से बैंकिंग सिस्टम में जोखिम कम करने का लक्ष्य रखा गया है. बैंकों को अब हर एक्सपोजर को कैपिटल मार्केट एक्सपोजर के रूप में वर्गीकृत करना होगा.
बैंक गारंटी पर कोलेटरल शर्त
यदि कोई बैंक किसी एक्सचेंज या क्लियरिंग हाउस के लिए गारंटी जारी करता है, तो कम से कम 50 प्रतिशत कोलेटरल रखना अनिवार्य होगा. इस कोलेटरल का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा नकद रूप में होना जरूरी है.
इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अचानक बाजार में उतार चढ़ाव की स्थिति में भी बैंकों के पास पर्याप्त तरल सुरक्षा मौजूद रहे.
इक्विटी कोलेटरल पर 40 प्रतिशत हेयरकट
नए नियमों के तहत यदि ब्रोकर्स इक्विटी शेयरों को कोलेटरल के रूप में गिरवी रखते हैं, तो उनकी वैल्यू पर 40 प्रतिशत का हेयरकट लगाया जाएगा.
इसका अर्थ यह है कि यदि 100 रुपये मूल्य के शेयर गिरवी रखे जाते हैं, तो बैंक उन्हें केवल 60 रुपये की वैल्यू के बराबर ही मानेंगे. इससे ब्रोकर्स को पहले की तुलना में ज्यादा वैल्यू का कोलेटरल देना पड़ेगा.
प्रॉप ट्रेडिंग पर सख्ती
नए निर्देशों में सबसे अहम बदलाव प्रॉप ट्रेडिंग से जुड़ा है. बैंकों को अब ब्रोकर्स की अपनी ट्रेडिंग गतिविधियों के लिए फंडिंग देने की अनुमति नहीं होगी.
प्रॉप ट्रेडिंग में ब्रोकर्स अपने खुद के फंड से ट्रेड करते हैं और यह गतिविधि वायदा और विकल्प सेगमेंट के बड़े हिस्से को कवर करती है. नए नियमों के बाद इस तरह की ट्रेडिंग के लिए बैंक गारंटी के इस्तेमाल पर रोक लग जाएगी.
हालांकि, मार्केट मेकिंग और कुछ सीमित डेट सिक्योरिटी वेयरहाउसिंग के मामलों में फंडिंग की छूट जारी रहेगी.
क्लाइंट ट्रेड्स पर असर नहीं
आरबीआई के निर्देशों में यह स्पष्ट किया गया है कि क्लाइंट ट्रेड्स के लिए जारी बैंक गारंटी पर इन नए नियमों का कोई असर नहीं पड़ेगा.
ग्राहकों की ओर से किए जाने वाले ट्रेड पहले की तरह ही संचालित होंगे. बदलाव मुख्य रूप से ब्रोकर्स की अपनी फंडिंग और लीवरेज व्यवस्था से जुड़ा है.
एफ एंड ओ और इंट्राडे वॉल्यूम पर प्रभाव
मार्केट से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, प्रॉप ट्रेडिंग पर रोक और नकद कोलेटरल की अनिवार्यता से इंट्राडे ट्रेडिंग लिमिट्स पर दबाव आ सकता है.
डेरिवेटिव्स सेगमेंट में जहां बड़ी मात्रा में ट्रेडिंग होती है, वहां वॉल्यूम में कुछ कमी देखी जा सकती है. यह बदलाव खास तौर पर उन ब्रोकर्स को प्रभावित करेगा जो बैंक गारंटी के सहारे ज्यादा वॉल्यूम जेनरेट करते थे.
शेयर बाजार से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में गिरावट
नए नियमों की घोषणा के बाद कैपिटल मार्केट से जुड़ी कई कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई. कुछ शेयरों में 2 प्रतिशत से लेकर 10 प्रतिशत तक की कमी देखी गई.
बाजार सहभागियों का कहना है कि यह गिरावट नियमों के प्रभाव को लेकर बनी शुरुआती धारणा का नतीजा है.
कोलेटरल मॉनिटरिंग और मार्जिन कॉल
नए ढांचे में कोलेटरल की वैल्यू की लगातार निगरानी अनिवार्य कर दी गई है. यदि कोलेटरल की वैल्यू तय स्तर से नीचे जाती है, तो तुरंत मार्जिन कॉल जारी की जाएगी.
इससे जोखिम प्रबंधन मजबूत होगा, लेकिन ब्रोकर्स को ज्यादा अनुशासन के साथ काम करना पड़ेगा.
बैंकों की लेंडिंग क्षमता पर असर
सभी फंडिंग को कैपिटल मार्केट एक्सपोजर मानने के कारण बैंकों की कुल तय सीमा लागू होगी. इससे बैंकों की लेंडिंग क्षमता पर असर पड़ सकता है और वे नए कर्ज देने में ज्यादा सतर्कता बरत सकते हैं.
छोटे और बड़े ब्रोकर्स पर प्रभाव
नियमों के चलते छोटे ब्रोकर्स पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि उन्हें ज्यादा कैपिटल ब्लॉक करना होगा. वहीं मजबूत बैलेंस शीट वाली बड़ी कंपनियां इन शर्तों को बेहतर तरीके से पूरा कर सकती हैं.
इससे उद्योग में समेकन की प्रक्रिया तेज होने की संभावना जताई जा रही है.
आम निवेशकों के लिए क्या बदलेगा
आम निवेशकों के लिए सिस्टम ज्यादा सुरक्षित और अनुशासित होगा. हालांकि, ब्रोकर्स की बढ़ती लागत का असर ब्रोकरेज चार्ज, मार्जिन जरूरत और ट्रेडिंग शर्तों पर दिख सकता है.
निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे अपने ब्रोकर्स से नई शर्तों के बारे में स्पष्ट जानकारी लें.
नियामक उद्देश्य
आरबीआई का कहना है कि इन बदलावों का मकसद बैंकिंग सिस्टम में जोखिम कम करना और कैपिटल मार्केट से जुड़े एक्सपोजर को बेहतर तरीके से नियंत्रित करना है.
नए नियमों के साथ बैंकिंग और ब्रोकिंग सिस्टम में ज्यादा पारदर्शिता और स्थिरता लाने का प्रयास किया गया है.






