
A visual representation of accountability and urban safety concerns after the Noida tragedy. Shah Times
युवराज की मौत और जवाबदेही का सवाल
हादसा या लापरवाही, नोएडा से उठते कड़े सवाल
एसआईटी, कार्रवाई और नागरिक सुरक्षा की कसौटी
नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत के बाद सरकार की त्वरित कार्रवाई, एसआईटी जांच और अधिकारियों पर गिरी गाज ने जवाबदेही की बहस को तेज किया है। यह संपादकीय प्रशासनिक सख्ती, सिस्टम की खामियों और नागरिक सुरक्षा की असल तस्वीर पर रोशनी डालता है।
📍Noida ✍️ Asif Khan
हादसा जो सवाल बन गया
नोएडा के सेक्टर एक सौ पचास में हुई एक मौत महज एक दुर्घटना नहीं रही। युवराज मेहता की कार का कोहरे में एक खुले, पानी से भरे गड्ढे में गिरना उस खामोश लापरवाही का नतीजा है जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। शहरों में रहने वाला हर नागरिक जानता है कि अधूरी सड़कों, बिना संकेत वाले निर्माण स्थलों और आधी रात को खुली खाइयों के बीच रोज आना जाना किस कदर जोखिम भरा है। फर्क बस इतना है कि इस बार नुकसान जान का हुआ और मामला कैमरों तथा फाइलों तक पहुंच गया।
सत्ता का क्विक रेस्पॉन्स
मुख्यमंत्री का संज्ञान लेना, तीन सदस्यीय जांच टीम बनाना और सीईओ को हटाना यह सब दिखाता है कि सरकार इस घटना को हल्के में नहीं ले रही। यह संदेश भी गया कि जिम्मेदारी ऊपर तक तय हो सकती है। लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल उठता है। क्या ऐसी सख्ती हर हादसे के बाद होती है या केवल तब, जब मामला सुर्खियों में आ जाए। जवाब अगर दूसरा है, तो सिस्टम की बीमारी कहीं गहरी है।
एसआईटी से उम्मीदें और सीमाएं
जांच टीम से पांच दिनों में रिपोर्ट मांगना एक मजबूत कदम माना जा सकता है। समयबद्ध जांच अक्सर सच्चाई तक पहुंचने में मदद करती है। लेकिन जल्दी के दबाव में जांच की गहराई प्रभावित न हो, यह भी जरूरी है। अतीत बताता है कि कई बार रिपोर्ट समय पर आ जाती है, पर उस पर अमल धीमा या अधूरा रह जाता है। जनता की नजर अब सिर्फ रिपोर्ट पर नहीं, उसके बाद होने वाली कार्रवाई पर है।
जिम्मेदारी किसकी
इस मामले में बिल्डरों पर एफआईआर दर्ज हुई, जूनियर इंजीनियर निलंबित हुआ और प्रशासनिक स्तर पर फैसले लिए गए। यह जरूरी भी है। मगर सवाल यह है कि क्या जिम्मेदारी हमेशा निचले स्तर तक ही सीमित रहती है। निर्माण की अनुमति, साइट की निगरानी और सुरक्षा मानकों का पालन एक पूरी श्रृंखला का हिस्सा है। अगर कड़ी की हर कड़ी मजबूत होती, तो शायद यह हादसा टल सकता था।
शहरों का विकास और मानव कीमत
नोएडा जैसे शहर विकास की रफ्तार का प्रतीक माने जाते हैं। ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और बड़े प्रोजेक्ट्स यहां आम बात हैं। लेकिन विकास की इस दौड़ में सुरक्षा अक्सर पीछे छूट जाती है। जब निर्माण स्थल बिना घेराबंदी के छोड़ दिए जाते हैं, तो यह मान लिया जाता है कि आम आदमी खुद सावधान रहेगा। यह सोच खतरनाक है। राज्य का पहला कर्तव्य नागरिक की सुरक्षा है, न कि सिर्फ कागजों पर नियम बनाना।
नागरिक का भरोसा और प्रशासन
एक आम नागरिक जब घर से निकलता है, तो वह यह भरोसा करता है कि सड़क, पुल और रास्ते सुरक्षित होंगे। यह भरोसा टूटता है तो गुस्सा स्वाभाविक है। युवराज के परिवार का दर्द केवल उनका निजी दुख नहीं है। यह उस भरोसे के टूटने की कहानी है जो शासन और नागरिक के बीच होना चाहिए। प्रशासन की कार्रवाई अगर पारदर्शी और निष्पक्ष होती दिखे, तो शायद यह भरोसा कुछ हद तक लौट सके।
सवाल केवल एक घटना का नहीं
यह घटना हमें मजबूर करती है कि हम रोज दिखने वाली छोटी लापरवाहियों को भी गंभीरता से देखें। खुले मैनहोल, अधूरी सड़कें, बिना चेतावनी बोर्ड के निर्माण स्थल यह सब छोटी खबरें लगती हैं। मगर इन्हीं से बड़े हादसे जन्म लेते हैं। जब तक हर स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक हर नई कार्रवाई अस्थायी मरहम ही रहेगी।
राजनीतिक संदेश और व्यावहारिक असर
मुख्यमंत्री का बयान कि कानून व्यवस्था और नागरिक सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, राजनीतिक रूप से मजबूत संदेश देता है। लेकिन जनता अब शब्दों से ज्यादा नतीजे देखना चाहती है। अगर इस जांच के बाद दोषियों को सजा मिलती है, सुरक्षा मानक सख्त होते हैं और निगरानी व्यवस्था सुधरती है, तभी यह संदेश विश्वसनीय बनेगा। वरना यह भी एक और बयान बनकर रह जाएगा।
मीडिया और समाज की भूमिका
इस तरह की घटनाओं में मीडिया का काम सिर्फ खबर बताना नहीं है। सवाल पूछना, जांच पर नजर रखना और जनता की आवाज को लगातार सामने रखना भी जरूरी है। समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। जब नागरिक खतरों को देखकर चुप रह जाते हैं, तो लापरवाही को बढ़ावा मिलता है। शिकायत करना, सवाल उठाना और जवाब मांगना लोकतंत्र का हिस्सा है।
फ्यूचर की राह
युवराज मेहता की मौत को अगर एक चेतावनी माना जाए, तो इससे सबक लिया जा सकता है। निर्माण स्थलों पर सख्त नियम, नियमित निरीक्षण और उल्लंघन पर त्वरित दंड यह सब कागज पर नहीं, जमीन पर दिखना चाहिए। तकनीक का इस्तेमाल कर निगरानी बढ़ाई जा सकती है। आम नागरिक को भी यह भरोसा मिलना चाहिए कि उसकी सुरक्षा किसी फाइल में बंद नहीं है।
आखिर में
यह संपादकीय किसी एक व्यक्ति या संस्था के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हम हर हादसे के बाद कुछ दिन शोर मचाकर भूल जाएंगे या फिर सच में सिस्टम को ठीक करने की कोशिश करेंगे। युवराज की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास की चमक के पीछे छुपे अंधेरे को कब तक नजरअंदाज किया जाएगा। जवाब अब सरकार, प्रशासन और समाज तीनों को मिलकर देना होगा।







