
पसमांदा सवाल, सुप्रीम कोर्ट की दहलीज
ओबीसी दर्जा: हक, कानून और हदें
आरक्षण पर अदालत का रुख और पसमांदा बहस
सुप्रीम कोर्ट ने पसमांदा मुसलमानों को ओबीसी में शामिल करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने साफ कहा कि आरक्षण सूची में किसी समुदाय को जोड़ना न्यायपालिका का नहीं, बल्कि सरकार और संसद का काम है। इस फैसले ने एक बार फिर आरक्षण, सामाजिक न्याय और संवैधानिक सीमाओं पर बहस को तेज कर दिया है। सवाल यह है कि क्या पसमांदा तबके की सामाजिक और आर्थिक हकीकत अलग से पहचान मांगती है, या यह मुद्दा सियासत और कानून के बीच उलझ कर रह जाएगा।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
अदालत की दहलीज और सियासी दायरा
पसमांदा मुसलमानों को ओबीसी में शामिल करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पहली नजर में सीधा लगता है, मगर इसके भीतर कई तहें हैं। अदालत ने कहा कि वह कानून नहीं बना सकती। यह बात संविधान की रूह से मेल खाती है। लेकिन सवाल यह भी है कि जब समाज के किसी हिस्से को लगता है कि उसके साथ इंसाफ नहीं हुआ, तो वह आखिर जाए कहाँ।
अदालत ने यह भी दोहराया कि ओबीसी दर्जा केवल जाति के नाम पर नहीं मिलता, बल्कि सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर तय होता है। यानी मसला सिर्फ पहचान का नहीं, बल्कि ठोस आंकड़ों और सर्वे का है। यह बात दुरुस्त है। मगर क्या हमारे पास पसमांदा तबके के हालात पर उतना मुकम्मल डेटा मौजूद है, जितना होना चाहिए। अगर नहीं, तो कमी कहाँ है।
पसमांदा की परिभाषा और हकीकत
पसमांदा शब्द का मतलब है पीछे छूटे हुए। यह उन तबकों की आवाज है जो अपने ही समुदाय के भीतर हाशिये पर रहे। दस्तकार, बुनकर, कसाई, नाई, धोबी जैसे पेशों से जुड़े लोग, जिनकी रोजी रोटी अक्सर अनिश्चित रही। शहरों में छोटी दुकानों पर काम करने वाला नौजवान हो या गांव में मजदूरी करती औरत, उनकी कहानी अक्सर विकास के बड़े नारों में खो जाती है।
यह मान लेना आसान है कि एक पूरे मजहबी समुदाय को एक जैसा समझ लिया जाए। मगर जमीन पर तस्वीर अलग है। हर घर की हालत एक सी नहीं होती। कुछ परिवार तरक्की कर चुके हैं, तो कुछ अब भी तंगहाली में जी रहे हैं। ऐसे में यह दलील उठती है कि अगर सामाजिक और आर्थिक पैमाने ही असली कसौटी हैं, तो पसमांदा तबके के लिए अलग से अध्ययन क्यों नहीं।
अदालत की सीमा और संविधान की रेखा
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि किसी नई श्रेणी को आरक्षण सूची में डालना सरकार और संसद का काम है। यह बात संवैधानिक ढांचे का हिस्सा है। न्यायपालिका नीतिगत फैसले नहीं ले सकती।
यहां एक अहम सवाल खड़ा होता है। अगर अदालत ही तय नहीं कर सकती कि कौन पिछड़ा है और कौन नहीं, तो क्या कार्यपालिका इस जिम्मेदारी को पूरी गंभीरता से निभा रही है। कई बार ऐसा लगता है कि आरक्षण पर बहस चुनावी मंचों पर ज्यादा गूंजती है, जबकि ठोस सामाजिक सर्वे कम दिखाई देते हैं।
आर्टिकल 32 के तहत दाखिल याचिका में अदालत ने यह भी कहा कि इतने जटिल नीति मामलों पर फैसला नहीं दिया जा सकता। इसका मतलब यह नहीं कि पसमांदा तबके की दिक्कतें झूठी हैं। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि रास्ता अदालत की बजाय नीति निर्माण की तरफ जाता है।
आरक्षण का असली मकसद
आरक्षण का मकसद किसी मजहब को फायदा देना नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को कम करना है। अगर हम इसे केवल पहचान की राजनीति बना दें, तो असली मकसद धुंधला हो जाता है।
मान लीजिए किसी छोटे कस्बे में दो परिवार हैं। एक परिवार पढ़ा लिखा है, कारोबार भी अच्छा है। दूसरा परिवार मजदूरी पर निर्भर है, बच्चों की पढ़ाई बीच में छूट जाती है। दोनों एक ही धार्मिक पहचान रखते हैं, लेकिन उनकी जरूरतें अलग हैं। ऐसे में नीति किसे ध्यान में रखे।
यही वह पेचीदगी है जिसे अदालत ने रेखांकित किया। उसने कहा कि वह यह तय नहीं कर सकती कि किसी समुदाय की कौन सी श्रेणी पिछड़ी है। यह काम विस्तृत सर्वे और आयोगों का है।
सियासत और सामाजिक न्याय
पसमांदा मुद्दा पिछले कुछ वर्षों में सियासी मंचों पर ज्यादा उभरा है। कई दल इसे सामाजिक न्याय का सवाल बताते हैं। कुछ इसे वोट बैंक की राजनीति कहते हैं। सच शायद बीच में कहीं है।
यह भी देखना होगा कि क्या पसमांदा शब्द खुद एक राजनीतिक पहचान बन चुका है। अगर हां, तो क्या इससे असली सामाजिक सुधार तेज होगा या बहस केवल भाषणों तक सीमित रह जाएगी।
सामाजिक न्याय का मतलब केवल आरक्षण नहीं होता। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और बैंकिंग तक पहुंच भी उतनी ही अहम है। अगर किसी तबके के बच्चे अच्छे स्कूल तक नहीं पहुंच पा रहे, तो केवल आरक्षण से तस्वीर पूरी नहीं बदलती।
डेटा की जरूरत और पारदर्शिता
अदालत ने कहा कि आरक्षण सूची में किसी समुदाय को जोड़ने के लिए विस्तृत डेटा चाहिए। यह बात बेहद अहम है। बिना आंकड़ों के नीति बनाना अंधेरे में तीर चलाने जैसा है।
क्या हमारे पास पसमांदा तबकों की शिक्षा दर, आय स्तर, रोजगार स्थिति का ताजा और विश्वसनीय डेटा है। अगर नहीं, तो सरकार को पहल करनी चाहिए। सामाजिक सर्वे, आयोग की रिपोर्ट और सार्वजनिक बहस जरूरी है।
कई बार हम भावनाओं में बहकर मांग उठाते हैं, मगर नीति भावनाओं से नहीं, तथ्यों से चलती है। यही वह जगह है जहां सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी बनती है।
एक असहज सवाल
क्या केवल ओबीसी सूची में शामिल हो जाने से पसमांदा तबके की तकलीफें खत्म हो जाएंगी। या यह शुरुआत होगी। हमें ईमानदारी से यह भी देखना होगा कि जिन समुदायों को पहले से ओबीसी का दर्जा मिला है, क्या उनकी हालत पूरी तरह सुधर चुकी है।
आरक्षण जरूरी हो सकता है, मगर वह जादुई हल नहीं है। अगर स्कूल की गुणवत्ता कमजोर है, अगर स्थानीय रोजगार के अवसर कम हैं, तो सिर्फ कोटा पर्याप्त नहीं होता।
आगे का रास्ता
अब गेंद सरकार और संसद के पाले में है। अगर पसमांदा तबके के लिए अलग से अध्ययन और आयोग बनते हैं, तो बहस ठोस दिशा में जा सकती है।
समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। क्या हम अपने भीतर की असमानताओं को स्वीकार करने को तैयार हैं। या हम हर सवाल को सियासी चश्मे से देखेंगे।
अदालत ने अपनी संवैधानिक सीमा स्पष्ट कर दी है। यह फैसला अंतिम शब्द नहीं, बल्कि बहस की नई शुरुआत है। पसमांदा सवाल अब न्यायालय की फाइल से निकल कर नीति और समाज के दरमियान खड़ा है।
आखिर में बात सीधी है। इंसाफ केवल अदालत में नहीं मिलता, वह नीति, समाज और नीयत तीनों के मेल से बनता है। अगर पसमांदा तबके के हालात वाकई पीछे हैं, तो उन्हें आगे लाने की जिम्मेदारी हम सबकी है। अदालत ने दरवाजा बंद नहीं किया, बस सही दरवाजे की तरफ इशारा किया है।




