
तेल, ताक़त और तिजारत: भारत की मुश्किल कूटनीति
रूस का तेल, अमेरिका का दबाव और भारत का फ़ैसला
रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका की 30 दिन की छूट ने भारत की विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा पर नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ़ वाशिंगटन का दबाव और वैश्विक राजनीति है, दूसरी तरफ़ 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा ज़रूरतें। सवाल यह है कि क्या किसी देश की ऊर्जा नीति पर बाहरी ताक़तों का असर होना चाहिए। यह संपादकीय इसी पेचीदा सियासत, आर्थिक हक़ीक़त और भारत के रणनीतिक संतुलन की पड़ताल करता है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
ऊर्जा सुरक्षा बनाम वैश्विक राजनीति: भारत की असली परीक्षा
ऊर्जा की सियासत और ‘इजाज़त’ का सवाल
कभी-कभी किसी एक बयान से पूरी सियासत का असल चेहरा सामने आ जाता है। हाल ही में अमेरिका की तरफ़ से यह कहा गया कि भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की छूट दी जा रही है। यही वह लम्हा था जिसने दिल्ली की सियासी फ़िज़ा में हलचल पैदा कर दी।
असल सवाल यह नहीं है कि छूट कितने दिनों की है। असल सवाल यह है कि क्या भारत जैसे मुल्क को अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए किसी और से इजाज़त लेनी चाहिए।
सरकार का कहना है कि भारत जहां सस्ता और भरोसेमंद तेल मिलेगा, वहीं से खरीदेगा। यह बात सुनने में बिल्कुल सीधी और तार्किक लगती है। आखिर जब घर का बजट चलता है तो हर इंसान यही सोचता है कि कम कीमत में अच्छी चीज़ मिल जाए। लेकिन अंतरराष्ट्रीय सियासत घर के बजट से कहीं ज़्यादा जटिल होती है।
यहीं से असली बहस शुरू होती है।
वैश्विक राजनीति का दबाव
रूस-यूक्रेन जंग के बाद से दुनिया की ऊर्जा सियासत पूरी तरह बदल चुकी है। पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह की पाबंदियां लगाईं। लेकिन भारत ने उस समय भी रूस से तेल खरीदना जारी रखा।
इस फ़ैसले के पीछे एक साफ़ आर्थिक वजह थी। रूस उस समय काफ़ी कम कीमत पर तेल दे रहा था। भारतीय रिफ़ाइनरियों के लिए यह एक बड़ा मौक़ा था।
सोचिए, अगर बाज़ार में दो दुकानों पर एक ही चीज़ मिल रही हो और एक दुकान आधी कीमत पर दे रही हो, तो ग्राहक कहां जाएगा। यही तर्क भारत ने अपनाया।
लेकिन अमेरिका और यूरोप का तर्क अलग है। उनका कहना है कि रूस से तेल खरीदना दरअसल उस देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करना है जो जंग लड़ रहा है।
यानी यहां नैतिकता और अर्थशास्त्र आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।
विपक्ष का हमला और राजनीति
भारत में विपक्ष ने इस मुद्दे को तुरंत सियासी रंग दे दिया। कई नेताओं ने सवाल उठाया कि अगर अमेरिका छूट दे रहा है तो क्या इसका मतलब यह है कि भारत अपनी विदेश नीति में पूरी तरह आज़ाद नहीं है।
यह आलोचना सुनने में काफ़ी तीखी लगती है। लेकिन यह भी सच है कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में कोई भी देश पूरी तरह अकेला नहीं चलता।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार, रक्षा और टेक्नोलॉजी जैसे कई अहम रिश्ते हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच दबाव और समझौते का सिलसिला चलता रहता है।
दूसरी तरफ़ सरकार का तर्क है कि भारत ने कभी किसी की इजाज़त का इंतज़ार नहीं किया। रूस से तेल की खरीद पहले भी जारी थी और आगे भी रहेगी।
सच शायद इन दोनों दावों के बीच कहीं मौजूद है।
होर्मुज़ की तंग गली
इस पूरी कहानी का सबसे अहम पहलू है ऊर्जा सुरक्षा।
दुनिया का एक बेहद अहम समुद्री रास्ता है होर्मुज़ का जलडमरूमध्य। वैश्विक तेल सप्लाई का लगभग बीस फ़ीसदी हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
भारत के लिए यह रास्ता और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की बड़ी तेल सप्लाई इसी से आती है। अगर यहां तनाव बढ़ता है या रास्ता बंद होता है तो उसका असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
यानी असली चिंता सिर्फ रूस या अमेरिका नहीं है। असली चिंता सप्लाई चेन की है।
अगर तेल की कीमत अचानक दस डॉलर प्रति बैरल बढ़ जाए तो महंगाई भी बढ़ सकती है। इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
और यहां एक दिलचस्प बात समझने वाली है। जब पेट्रोल का दाम बढ़ता है तो सिर्फ गाड़ियों का खर्च नहीं बढ़ता। सब्ज़ी से लेकर ट्रांसपोर्ट तक हर चीज़ महंगी होने लगती है।
ऊर्जा सुरक्षा की असली परीक्षा
सरकार का दावा है कि भारत के पास पर्याप्त भंडार मौजूद है। रणनीतिक स्टोरेज और रिफ़ाइनरियों में इतना तेल है कि कई हफ्तों तक घरेलू मांग पूरी की जा सकती है।
यह सुनकर कुछ राहत मिलती है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ स्टोरेज ही समाधान है।
ऊर्जा सुरक्षा का असली मतलब यह है कि सप्लाई के कई रास्ते हों। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इसी दिशा में काम किया है। अब तेल करीब चालीस देशों से खरीदा जा रहा है।
यह एक अहम रणनीतिक बदलाव है।
तिजारत और कूटनीति का संतुलन
भारत की विदेश नीति अक्सर संतुलन की नीति कही जाती है। एक तरफ़ अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी है, दूसरी तरफ़ रूस के साथ पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध।
यह संतुलन आसान नहीं होता।
कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे कोई रस्सी पर चल रहा हो। एक तरफ़ झुक गए तो गिरने का खतरा, दूसरी तरफ़ झुक गए तो भी वही खतरा।
लेकिन यही संतुलन भारत की कूटनीतिक ताक़त भी है।
असली सवाल
यहां एक और दिलचस्प सवाल उठता है।
क्या भारत को सिर्फ सस्ता तेल देखना चाहिए या दीर्घकालिक रणनीति भी बनानी चाहिए।
कई विशेषज्ञ कहते हैं कि भविष्य का रास्ता ऊर्जा विविधीकरण में है। यानी तेल और गैस के साथ-साथ सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और दूसरे स्रोतों को भी बढ़ाना होगा।
अगर ऐसा होता है तो तेल की वैश्विक सियासत का असर धीरे-धीरे कम हो सकता है।
आम नागरिक की नजर से
जब दिल्ली या वाशिंगटन में नीति बनती है तो उसका असर अंत में आम आदमी तक पहुंचता है।
अगर तेल महंगा होगा तो बस का किराया बढ़ेगा। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा तो फल और सब्ज़ी की कीमत भी बढ़ेगी।
इसलिए ऊर्जा नीति सिर्फ विदेश नीति का मसला नहीं है। यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी का सवाल है।
रूस से तेल खरीदने को लेकर उठी यह बहस हमें एक बड़ी हक़ीक़त की याद दिलाती है। आज की दुनिया में अर्थव्यवस्था, राजनीति और ऊर्जा एक दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखते हुए वैश्विक दबावों का सामना कैसे करे।
कभी-कभी कूटनीति में सबसे बड़ी कला यही होती है कि आप बिना शोर किए अपना रास्ता निकाल लें।
और शायद भारत इसी कोशिश में लगा हुआ है।





