
नीयत, कोशिश और अदालत की जिम्मेदारी
क्रिमिनल कानून में इरादा बनाम तैयारी
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जिसमें कहा गया था कि ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खोलना रेप की कोशिश नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे कृत्य स्पष्ट रूप से रेप की कोशिश की श्रेणी में आते हैं। यह फैसला सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि आपराधिक न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता और कानूनी समझ की परीक्षा भी है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
न्याय की बारीक रेखा
कानून अक्सर शब्दों में लिखा जाता है, लेकिन उसका असर इंसानी जिंदगियों पर पड़ता है। जब अदालत यह तय करती है कि कौन सा कृत्य रेप की कोशिश है और कौन सा सिर्फ तैयारी, तो वह सिर्फ धाराओं की व्याख्या नहीं कर रही होती, बल्कि समाज को एक पैग़ाम दे रही होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए साफ कहा कि पायजामे का नाड़ा खोलना, ब्रेस्ट पकड़ना और बच्ची को पुलिया के नीचे घसीटने की कोशिश करना महज़ तैयारी नहीं, बल्कि रेप की कोशिश के दायरे में आता है। यह टिप्पणी केवल कानूनी सुधार नहीं है, बल्कि एक एहतियाती संदेश भी है कि यौन अपराधों को शब्दों की बाज़ीगरी में हल्का नहीं किया जा सकता।
लेकिन यहाँ एक सवाल उठता है। क्या हर शारीरिक छेड़छाड़ को सीधे रेप की कोशिश मान लेना चाहिए? या फिर अदालत को हर मामले में नीयत, हालात और सबूतों की गहराई से जांच करनी चाहिए?
नीयत बनाम तैयारी
क्रिमिनल लॉ में “इरादा” एक अहम तत्व है। अदालत ने कहा कि आरोपियों का इरादा स्पष्ट था। जब कोई व्यक्ति नाबालिग के कपड़े खोलने की कोशिश करता है और उसे एकांत में ले जाने का प्रयास करता है, तो यह महज़ मज़ाक या छेड़छाड़ नहीं रह जाता।
यहाँ फर्क समझना जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ अभद्र टिप्पणी करे, तो वह एक अपराध है। लेकिन जब वह शारीरिक नियंत्रण पाने की कोशिश करे, कपड़े खोलने लगे, और पीड़िता को अलग स्थान पर ले जाए, तो यह एक बढ़ा हुआ कदम है। कानून इस बढ़ते कदम को ही “अटेम्प्ट” की श्रेणी में रखता है।
फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ट्रायल अभी बाकी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ किया कि यह केवल प्रथम दृष्टया राय है। अंतिम दोष सिद्धि ट्रायल कोर्ट में सबूतों के आधार पर होगी।
संवेदनशीलता की जरूरत
चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में कानूनी तर्क के साथ सहानुभूति भी जरूरी है। यह वाक्य बहुत साधारण लगता है, लेकिन इसके मायने गहरे हैं।
जब पीड़िता एक 14 साल की बच्ची हो, तो अदालत की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। समाज में अक्सर ऐसे मामलों को “छोटी घटना” कहकर टाल दिया जाता है। लेकिन बच्ची के मन पर जो असर पड़ता है, वह उम्र भर का हो सकता है।
एक साधारण उदाहरण लें। अगर किसी के घर की खिड़की तोड़ने की कोशिश हो, तो हम उसे चोरी की तैयारी कहेंगे। लेकिन अगर कोई व्यक्ति घर में घुसकर अलमारी खोलने लगे, तो यह कोशिश है। उसी तरह, किसी बच्ची के कपड़े खोलना और उसे एकांत में खींचना, अपराध के इरादे को मजबूत संकेत देता है।
हाई कोर्ट की दलील और आलोचना
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि यह रेप नहीं, बल्कि कपड़े उतारने के इरादे से हमला है। यह व्याख्या तकनीकी रूप से संभव हो सकती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह व्याख्या सामाजिक हकीकत से मेल खाती है?
कानून की किताबें अक्सर सूखी भाषा में लिखी होती हैं, लेकिन अदालत का काम केवल शब्द पढ़ना नहीं, बल्कि उनकी आत्मा समझना भी है। सुप्रीम कोर्ट ने यही किया। उसने कहा कि क्रिमिनल ज्यूरिस्प्रूडेंस के तय सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल हुआ।
यह टिप्पणी सख्त है। लेकिन शायद जरूरी भी। क्योंकि अगर ऐसे मामलों को हल्के अपराध की तरह देखा जाए, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन सकती है।
पॉक्सो एक्ट की भावना
पॉक्सो कानून बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बना है। इसका उद्देश्य यह है कि नाबालिगों के साथ किसी भी प्रकार की यौन हरकत को गंभीरता से लिया जाए।
अगर अदालत यह मान ले कि कपड़े खोलने की कोशिश रेप का प्रयास नहीं है, तो यह कानून की मंशा को कमजोर करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने मूल समन आदेश बहाल कर यह स्पष्ट कर दिया कि बच्चों के मामलों में सख्त दृष्टिकोण अपनाना होगा।
लेकिन यहाँ एक और पहलू भी है। सख्ती जरूरी है, मगर न्याय संतुलित भी होना चाहिए। झूठे मामलों की संभावना को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका अवलोकन केवल प्रथम दृष्टया है।
समाज के लिए संदेश
यह फैसला सिर्फ दो आरोपियों के बारे में नहीं है। यह समाज को यह बताता है कि बच्चियों की गरिमा पर आंच आएगी तो अदालत चुप नहीं रहेगी।
फिर भी हमें यह मान लेना गलत होगा कि हर समस्या अदालत हल कर देगी। परिवार, स्कूल और समाज को भी बच्चों को सुरक्षा और जागरूकता देनी होगी।
कभी-कभी हम सोचते हैं कि कानून बहुत सख्त हो गया है। लेकिन जब हम किसी बच्ची के नजरिये से सोचते हैं, तो सख्ती कम लगती है।
न्याय की दिशा
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है। इसने यह स्पष्ट किया कि इरादा और कृत्य के बीच की दूरी बहुत कम हो सकती है। जब अपराध की ओर निर्णायक कदम उठाया जाता है, तो कानून उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता।
फिर भी अंतिम फैसला ट्रायल में होगा। यही न्याय की खूबसूरती है कि हर पक्ष को सुना जाता है।
यह मामला हमें याद दिलाता है कि कानून केवल धाराओं का खेल नहीं है। यह भरोसे का तंत्र है। और जब बात बच्चों की सुरक्षा की हो, तो उस भरोसे को मजबूत रखना ही अदालत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।







