
Russia issues a strong reaction amid rising Iran conflict tensions – Shah Times
मॉस्को का संदेश: ताकत या तकरार की राजनीति?
तेहरान संकट पर रूस की खुली चेतावनी
अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद रूस की कड़ी प्रतिक्रिया ने अंतरराष्ट्रीय सियासत को और पेचीदा बना दिया है। मॉस्को के शीर्ष नेतृत्व ने वॉशिंगटन पर तंज कसते हुए इसे खतरनाक कदम बताया है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ बयानबाज़ी है या बदलते वैश्विक समीकरणों का इशारा? यह संपादकीय रूस के दृष्टिकोण, उसकी रणनीति, और संभावित भू-राजनीतिक असर का संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
📍 Moscow ✍️ Asif Khan
बढ़ते तनाव में रूस की रणनीतिक चाल
बदलते दौर में रूस की आवाज
तेहरान में धमाकों की खबरें आईं तो दुनिया की निगाहें सिर्फ वॉशिंगटन और तेल अवीव पर नहीं टिकीं, बल्कि मॉस्को पर भी जा ठहरीं। रूस ने जिस तल्ख लहजे में प्रतिक्रिया दी, वह सिर्फ एक बयान नहीं था, बल्कि एक सियासी पैगाम भी था। सवाल यह है कि यह पैगाम किसके लिए था? अमेरिका के लिए, अपने घरेलू दर्शकों के लिए, या उन मुल्कों के लिए जो पश्चिमी ताकतों से असहज महसूस करते हैं?
रूस का कहना है कि सैन्य रास्ता हमेशा हल नहीं होता। यह बात सुनने में सुकून देती है। लेकिन क्या रूस खुद हर बार सिर्फ डिप्लोमैटिक रास्ता अपनाता है? यह वह जगह है जहां हमें थोड़ी ईमानदारी से सोचना होगा।
ताकत की राजनीति या सिद्धांत की बहस
रूसी नेतृत्व ने अमेरिकी राष्ट्रपति पर तीखा हमला बोला। बयान में यह इशारा था कि जो खुद को शांति का हामी बताते हैं, वही युद्ध का रास्ता चुन लेते हैं। यह तंज सियासी तौर पर असरदार है। आम आदमी जब खबर देखता है तो उसे भी यही लगता है कि बड़े देश अक्सर दोहरी नीति अपनाते हैं।
लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि रूस की अपनी विदेश नीति कितनी आदर्शवादी है और कितनी रणनीतिक। अंतरराष्ट्रीय रिश्ते महज नैतिकता पर नहीं चलते। यहां नेशनल इंटरेस्ट सबसे बड़ा सच होता है। रूस का ईरान के साथ रिश्ता सिर्फ हमदर्दी का नहीं, बल्कि स्ट्रैटेजिक साझेदारी का भी है।
ईरान, ऊर्जा और शक्ति संतुलन
मध्य पूर्व की सियासत में ईरान एक अहम किरदार है। रूस के लिए ईरान सिर्फ एक दोस्त नहीं, बल्कि ऊर्जा बाजार, हथियार सहयोग और क्षेत्रीय संतुलन का हिस्सा है। अगर ईरान कमजोर होता है, तो इसका असर रूस की पोजीशन पर भी पड़ सकता है।
सोचिए, अगर वैश्विक ऊर्जा बाजार में अचानक अस्थिरता बढ़ती है तो उसका फायदा किसे होगा और नुकसान किसे? रूस जैसे ऊर्जा निर्यातक देश के लिए यह दोधारी तलवार है। कीमतें बढ़ें तो राजस्व बढ़ सकता है, लेकिन लंबे संघर्ष से बाजार अस्थिर भी हो सकता है।
बयान से आगे की रणनीति
रूस की प्रतिक्रिया को सिर्फ गुस्से के बयान के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। मॉस्को अक्सर शब्दों का इस्तेमाल एक स्ट्रैटेजिक टूल की तरह करता है। तीखा बयान देना एक तरह से डिप्लोमैटिक पोजिशनिंग है। इससे वह यह संदेश देता है कि वह पश्चिमी कार्रवाई का खुला समर्थन नहीं करेगा।
लेकिन क्या रूस सीधे टकराव की राह पर जाएगा? यह कम संभावना वाला विकल्प लगता है। रूस जानता है कि सीधा सैन्य मुकाबला वैश्विक स्तर पर बड़े संकट को जन्म दे सकता है। इसलिए संभव है कि वह कूटनीतिक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाए, बयानबाज़ी तेज करे, और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अमेरिका को घेरने की कोशिश करे।
वैश्विक दक्षिण की राजनीति
रूस पिछले कुछ वर्षों में खुद को पश्चिमी दबाव के खिलाफ एक विकल्प के रूप में पेश करता रहा है। कई एशियाई, अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश पश्चिमी दखलंदाजी से थक चुके हैं। ऐसे में रूस की कड़ी प्रतिक्रिया उन्हें यह संदेश देती है कि वह एक अलग आवाज है।
लेकिन यहां भी एक सवाल है। क्या यह सचमुच वैकल्पिक नैतिक नेतृत्व है, या महज भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा? दुनिया अब द्विध्रुवीय नहीं रही, बल्कि बहुध्रुवीय हो रही है। ऐसे में हर ताकत अपनी जगह मजबूत करना चाहती है।
अमेरिका के तर्क और रूस की आपत्ति
अमेरिका का तर्क यह है कि सुरक्षा खतरे को रोकना जरूरी था। अगर किसी देश का परमाणु कार्यक्रम या मिसाइल क्षमता चिंता पैदा करे, तो क्या कार्रवाई जायज हो सकती है? यह बहस आसान नहीं है।
रूस का कहना है कि सैन्य हमला क्षेत्र को अस्थिर करेगा। यह भी सच है कि हर बम गिरने के साथ भरोसे की एक ईंट भी गिरती है। लेकिन क्या सिर्फ बातचीत से हर संकट सुलझ जाता है? इतिहास इसका सीधा जवाब नहीं देता।
घरेलू राजनीति का असर
हमें यह भी समझना होगा कि रूस की प्रतिक्रिया का एक घरेलू पहलू भी है। सख्त बयान देना आंतरिक समर्थन को मजबूत कर सकता है। जब कोई देश बाहरी खतरे की बात करता है, तो अक्सर जनता एकजुट हो जाती है।
यह सिर्फ रूस की बात नहीं, हर बड़े देश की राजनीति में यह पैटर्न दिखता है। इसलिए हमें हर बयान को सिर्फ अंतरराष्ट्रीय चश्मे से नहीं, घरेलू नजर से भी देखना चाहिए।
क्या यह टकराव सीमित रहेगा
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह संघर्ष सीमित रहेगा या व्यापक रूप लेगा। रूस की कड़ी भाषा से तनाव बढ़ सकता है, लेकिन यह एक तरह का संतुलन भी बना सकता है। कभी-कभी सख्त शब्द ही बड़े कदमों को रोकने का काम करते हैं।
जैसे मोहल्ले में दो लोग झगड़ रहे हों और तीसरा व्यक्ति ऊंची आवाज में कहे कि बस करो, वरना बात बिगड़ जाएगी। उसकी आवाज झगड़ा बढ़ा भी सकती है और रोक भी सकती है। रूस की भूमिका कुछ वैसी ही लगती है।
कूटनीति की आखिरी उम्मीद
दुनिया की अर्थव्यवस्था पहले ही कई चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे में नया सैन्य टकराव वैश्विक बाजारों, ऊर्जा कीमतों और आम लोगों की जिंदगी पर असर डालेगा। रूस अगर सचमुच स्थिरता चाहता है तो उसे बयान से आगे बढ़कर संवाद की ठोस पहल करनी होगी।
सवाल यह नहीं कि कौन सही है और कौन गलत। असली सवाल यह है कि कौन हालात को बेहतर बना सकता है। रूस के पास अवसर है कि वह खुद को सिर्फ आलोचक नहीं, बल्कि समाधान का हिस्सा साबित करे।
सियासत से आगे का सच
रूस की प्रतिक्रिया को एकतरफा नजर से देखना आसान है। कोई इसे साहस कहेगा, कोई इसे रणनीतिक चाल। हकीकत शायद इन दोनों के बीच है।
अंतरराष्ट्रीय सियासत शतरंज की तरह है। हर चाल का मकसद सिर्फ अगला कदम नहीं, बल्कि पूरी बिसात पर असर डालना होता है। रूस ने अपनी चाल चल दी है। अब देखना यह है कि यह चाल तनाव कम करती है या खेल को और जटिल बना देती है।
दुनिया के आम लोग बस इतना चाहते हैं कि हालात काबू में रहें। क्योंकि अंत में कीमत वही चुकाते हैं जिनका फैसलों में कोई सीधा हाथ नहीं होता।





