
Indian Rupee movement against US Dollar explained in SBI Research report – Shah Times
एसबीआई रिसर्च: रुपये पर दबाव, 2026 में संभावित रिकवरी
भारतीय रुपया: गिरावट के कारण और आगे का रोडमैप
📍 Mumbai ✍️Asif Khan
एसबीआई रिसर्च ने रुपये की मौजूदा गिरावट पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है।
रिपोर्ट में दबाव के कारण, आरबीआई के हस्तक्षेप और 2026 तक संभावित रिकवरी का जिक्र किया गया है।
एसबीआई रिसर्च की नई रिपोर्ट
भारतीय रुपये की लगातार कमजोरी के बीच एसबीआई रिसर्च ने अपनी ताजा रिपोर्ट “इन रूपी वी ट्रस्ट” जारी की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि रुपया इस समय डीवैल्यूएशन के तीसरे चरण में है। इस चरण की खासियत यह है कि इसमें रुपया और अमेरिकी डॉलर दोनों में एक साथ कमजोरी देखी जा रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा गिरावट केवल किसी एक वजह से नहीं, बल्कि घरेलू और वैश्विक दोनों कारकों के संयुक्त असर का नतीजा है। इसमें व्यापक आर्थिक दबाव, वैश्विक अनिश्चितता, जियो-पॉलिटिकल तनाव और ट्रेड डिसरप्शन जैसे पहलुओं को प्रमुख कारण बताया गया है।
रुपये पर दबाव के कारण
एसबीआई रिसर्च का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे बाहरी झटकों ने रुपये की स्थिरता को प्रभावित किया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले कुछ वर्षों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में आई कमी ने रुपये को ज्यादा संवेदनशील बना दिया है।
आंकड़ों के अनुसार, 2007 से 2014 के बीच औसतन हर साल 162.8 बिलियन डॉलर का नेट पोर्टफोलियो निवेश आया करता था, जिससे करेंसी को सपोर्ट मिलता था। वहीं 2015 से 2025 के बीच यह औसत घटकर 87.7 बिलियन डॉलर रह गया। इससे वैश्विक उतार-चढ़ाव के समय रुपये की सहनशीलता कम हुई है।
2025 में एफपीआई की भूमिका
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अकेले 2025 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की ओर से 10 बिलियन डॉलर से ज्यादा की निकासी देखी गई। इस वजह से रुपये पर लगातार दबाव बना रहा। एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, यह ट्रेंड रुपये की चाल को प्रभावित करने वाले अहम फैक्टर्स में शामिल है।
टैरिफ और जियो-पॉलिटिकल तनाव
एसबीआई रिसर्च ने जियो-पॉलिटिकल तनाव और टैरिफ से जुड़े फैसलों को भी रुपये की गिरावट का कारण बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, टैरिफ ऐलान के बाद से रुपये में करीब 5.7 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव और ट्रेड से जुड़ी अनिश्चितताओं ने डॉलर को मजबूत किया, जिसका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी पर पड़ा।
आरबीआई के हस्तक्षेप से राहत
रुपये की तेज गिरावट के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने बाजार में मजबूत हस्तक्षेप किया। मंगलवार को रुपया 91 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया था। हालांकि अगले दिन इसमें तेज सुधार देखने को मिला।
बुधवार को रुपया 90.3475 प्रति डॉलर पर कारोबार करता दिखा, जो पिछले बंद भाव 91.0275 से एक प्रतिशत से ज्यादा की मजबूती दर्शाता है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, यह सुधार आरबीआई के हस्तक्षेप और सरकारी बैंकों की ओर से डॉलर की लगातार बिक्री के कारण संभव हो पाया।
सरकारी बैंकों की भूमिका
रिपोर्ट में बताया गया है कि शुरुआती कारोबार में सरकारी बैंकों द्वारा डॉलर की बिक्री से घरेलू मुद्रा को सहारा मिला। माना जा रहा है कि यह कदम केंद्रीय बैंक के निर्देशों के अनुरूप उठाया गया। इस हस्तक्षेप से बाजार की अस्थिरता कम हुई और सेंटिमेंट को स्थिर करने में मदद मिली।
रुपये में 1.03 प्रतिशत की एकदिनी बढ़त दर्ज की गई, जो 23 मई 2025 के बाद सबसे मजबूत उछाल मानी जा रही है।
फॉरवर्ड मार्केट में डॉलर की मांग
एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में फॉरवर्ड मार्केट में डॉलर की बढ़ती मांग पर भी रोशनी डाली गई है। जुलाई 2025 से अनिश्चितता के माहौल में इम्पोर्टर्स और एक्सपोर्टर्स द्वारा हेजिंग बढ़ाई गई, जिससे अतिरिक्त मांग में तेजी आई।
ट्रेडर मार्केट में कुल अतिरिक्त मांग 145 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई। इसी कारण आरबीआई को हस्तक्षेप करना पड़ा, ताकि बाजार में संतुलन बनाए रखा जा सके।
आगे क्या संकेत मिलते हैं
रिपोर्ट के मुताबिक, मार्कोव रेजीम-स्विचिंग मॉडल के आधार पर अनुमान है कि रुपया करीब छह महीने तक दबाव में रह सकता है। इसके बाद इसमें सुधार की संभावना जताई गई है।
एसबीआई रिसर्च का कहना है कि ऐतिहासिक रुझान बताते हैं कि जब भी रुपया इस तरह के दबाव से बाहर निकलता है, तो उसमें उल्लेखनीय रिकवरी देखी जाती है।
2026 के लिए अनुमान
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि जियो-पॉलिटिकल जोखिमों में कमी आती है और कैपिटल फ्लो में स्थिरता बनी रहती है, तो 2026 में रुपये में करीब 6.5 प्रतिशत की बढ़त संभव है। इस स्थिति में रुपया दोबारा 87 रुपये प्रति डॉलर के स्तर की ओर बढ़ सकता है।
एसबीआई रिसर्च के अनुसार, मौजूदा गिरावट के बावजूद मध्यम अवधि में रुपये को लेकर आउटलुक पॉजिटिव बना हुआ है।






