
सरहदों की सियासत और अंदरूनी उबाल का दिन
आज की सुर्खियों में सरहदी कार्रवाई से लेकर सियासी फेरबदल, अदालत की तीखी टिप्पणी, सुरक्षा खतरों और सड़क हादसों तक कई परतें खुलती दिखीं। एक तरफ पड़ोसी मुल्क ने एयरस्ट्राइक का दावा किया, तो दूसरी तरफ नागरिकों की मौत पर विवाद उठा। बांग्लादेश में नई सियासी दस्तक के साथ सेना में बदलाव हुआ। मेक्सिको में ड्रग माफिया के खिलाफ कार्रवाई ने हिंसा को जन्म दिया। देश के भीतर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, रक्षा तैयारियों पर सवा
ल, और विभिन्न राज्यों में अपराध व हादसों की खबरें हमारे तंत्र की मजबूती और कमजोरियों दोनों को सामने रखती हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सुरक्षा, न्याय और शासन केवल बयान से नहीं, संतुलन और जवाबदेही से मजबूत होते हैं।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
हवाई हमले, सियासी फेरबदल और अदालत की सख्ती
सरहद की आग और सच्चाई की तलाश
पड़ोसी मुल्क की तरफ से अफगानिस्तान में एयरस्ट्राइक कर अस्सी लड़ाकों को मारने का दावा किया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि यह कदम आत्मघाती हमलों का बदला था। मगर अफगान प्रशासन का कहना है कि सोलह नागरिक मारे गए। यही वह मोड़ है जहाँ जज़्बात और हक़ीक़त आमने सामने खड़े हो जाते हैं। सवाल सीधा है, क्या सरहद पार कार्रवाई से मसला हल होता है या नई दरारें पैदा होती हैं।
कई बार हुकूमतें सिक्योरिटी के नाम पर सख्त कदम उठाती हैं, और अवाम तालियाँ भी बजाती है। लेकिन जब आम लोग इसकी कीमत चुकाते हैं, तो कहानी बदल जाती है। काउंटर टेररिज्म की दलील अपनी जगह, मगर सिविलियन कैजुअल्टी का इल्जाम बहुत भारी होता है। एक आम घर की मिसाल लें, अगर किसी शरारती को पकड़ने के लिए पूरा मोहल्ला हिला दिया जाए, तो भरोसा टूटता है। सरहद पर भी यही उसूल लागू होता है।
यह भी देखना होगा कि क्या ऐसे हमले लंबे अरसे की स्ट्रैटेजी का हिस्सा हैं या महज तात्कालिक प्रतिक्रिया। अगर यह केवल बदले की कार्रवाई है, तो उसका अंजाम अक्सर बदले की नई कड़ी बन जाता है। अगर यह किसी ठोस इंटेलिजेंस और कोऑर्डिनेशन पर आधारित है, तो फिर पारदर्शिता जरूरी है। वरना सियासत और प्रोपेगैंडा के बीच सच दब जाता है।
बांग्लादेश में सत्ता और फौज का समीकरण
तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनते ही सेना में फेरबदल हुआ। भारत में रक्षा सलाहकार को वापस बुलाकर प्रमोशन देना और चीफ ऑफ जनरल स्टाफ को बदलना केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि सियासी पैगाम भी है। दक्षिण एशिया में फौज और सियासत का रिश्ता हमेशा नाजुक रहा है।
यह बदलाव क्या संस्थागत मजबूती का संकेत है या सत्ता के केंद्रीकरण की कोशिश। यह सवाल उठना लाज़िमी है। जब भी नई हुकूमत आती है, वह अपने भरोसे के अफसर चाहती है। मगर प्रोफेशनलिज्म और पॉलिटिकल लॉयल्टी के बीच महीन रेखा होती है। अगर वह रेखा धुंधली हो जाए, तो सिस्टम कमजोर होता है।
भारत के लिए भी यह एक संकेत है कि पड़ोसी की आंतरिक हलचल पर नजर रखनी होगी। रिश्ते केवल बयान से नहीं, बल्कि रक्षा और कूटनीति की समझदारी से चलते हैं।
मेक्सिको में माफिया पर वार और सड़कों पर हिंसा
मेक्सिको में सेना ने सबसे बड़े ड्रग माफिया को मार गिराया। बताया गया कि बाहरी दबाव के बाद यह एक्शन हुआ। लेकिन उसके बाद देशभर में हिंसा भड़क उठी। समर्थकों ने एयरपोर्ट और मॉल तक में आग लगा दी।
यह दृश्य बताता है कि अपराध के खिलाफ कार्रवाई केवल ऑपरेशन से खत्म नहीं होती। जब किसी गिरोह का नेटवर्क समाज में गहराई तक पैठ बना ले, तो उसका असर दूर तक जाता है। एक तरफ राज्य की ताकत, दूसरी तरफ संगठित अपराध की जड़ें। अगर सामाजिक ढांचा कमजोर हो, तो हिंसा की चिंगारी जल्दी फैलती है।
हमारे लिए सबक साफ है। कानून व्यवस्था केवल सख्ती से नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार और अवसरों से भी जुड़ी है। वरना एक गिरोह जाता है, दूसरा खड़ा हो जाता है।
हादसे, लापरवाही और सिस्टम की जिम्मेदारी
नेपाल में बस नदी में गिरी, अठारह लोगों की मौत हुई। कोहरे में हाईवे हादसा, ट्रेनिंग के दौरान तेजस विमान का ब्रेक फेल होना, देश के अलग अलग हिस्सों में सड़क दुर्घटनाएँ। यह सब महज इत्तेफाक नहीं हो सकते।
सवाल उठता है कि क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था केवल कागजों में मजबूत है। तेजस के सभी विमानों को ग्राउंड करना एहतियाती कदम है, मगर यह भी बताता है कि जांच जरूरी है। एविएशन में एक छोटी चूक भी बड़ी कीमत ले सकती है।
सड़क हादसों में अक्सर कंट्रोल खोने की बात कही जाती है। लेकिन कंट्रोल केवल ड्राइवर का नहीं, सिस्टम का भी होता है। सड़क की हालत, ट्रैफिक नियमों का पालन, आपात सेवा की तत्परता, सब मिलकर सुरक्षा बनाते हैं।
अदालत की सख्ती और लोकतंत्र की मर्यादा
सुप्रीम कोर्ट में बदतमीजी पर सख्त टिप्पणी और एक याचिका को पर्याप्त आधार न होने पर खारिज करना यह दिखाता है कि अदालत अपनी गरिमा पर समझौता नहीं करती। लोकतंत्र में अदालत अंतिम सहारा होती है।
लेकिन यह भी सच है कि अदालतों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। हर सियासी विवाद अदालत तक पहुँच रहा है। क्या हमें अपनी संस्थाओं को इतना मजबूत नहीं बनाना चाहिए कि हर मसले का हल न्यायपालिका पर न छोड़ा जाए।
अदालत का संदेश साफ है कि तथ्यों के बिना आरोप नहीं चलेंगे। यह केवल एक केस का फैसला नहीं, बल्कि एक सिद्धांत की याद दिलाना है।
आतंकी नेटवर्क और लंबा ऑपरेशन
किश्तवाड़ में 326 दिन तक चला ऑपरेशन और सात आतंकियों का मारा जाना सुरक्षा एजेंसियों की धैर्यपूर्ण रणनीति को दिखाता है। जैश कमांडर का शामिल होना बताता है कि नेटवर्क अभी भी सक्रिय हैं।
यहाँ भावनाओं से ज्यादा धैर्य की जरूरत है। आतंक के खिलाफ लड़ाई लंबी होती है। एक दिन की सफलता से पूरी जीत घोषित करना जल्दबाजी होगी।
आंतरिक सुरक्षा और धमकियाँ
दिल्ली विधानसभा को धमकी, स्कूल को थ्रेट, यह सब हमारे शहरी ढांचे की संवेदनशीलता को दिखाता है। ई मेल से आई धमकी चाहे फर्जी निकले या असली, प्रशासन को हर बार पूरी तैयारी करनी पड़ती है।
सवाल यह है कि क्या हम केवल प्रतिक्रिया दे रहे हैं या रोकथाम की ठोस नीति बना रहे हैं। साइबर मॉनिटरिंग, इंटेलिजेंस और जन जागरूकता, सबको साथ चलना होगा।
अर्थव्यवस्था और रोजगार का वादा
उत्तर प्रदेश में निवेश समझौते और बीस हजार रोजगार का दावा उम्मीद जगाते हैं। मगर आंकड़े तभी मायने रखते हैं जब जमीन पर नौकरियां दिखें। तीन दिन में पच्चीस सीईओ से मुलाकात अच्छी खबर है, पर असली इम्तिहान तब होगा जब युवाओं को ऑफर लेटर मिलेंगे।
हम अक्सर एमओयू पर खुश हो जाते हैं। लेकिन हर समझौता हकीकत नहीं बनता। जरूरत है ट्रैकिंग, पारदर्शिता और समय सीमा की।
अपराध और समाज का आईना
प्रयागराज, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर, बागपत। अलग अलग जगहों से हत्या, दहेज, इनाम घोषित अपराधियों की खबरें आईं। यह केवल पुलिस फाइल नहीं, समाज का आईना है।
दहेज के लिए हत्या का आरोप सुनते ही दिल बैठ जाता है। इक्कीसवीं सदी में भी अगर यह जारी है, तो हमें खुद से सवाल करना चाहिए। कानून सख्त है, पर सोच बदलने में वक्त लगता है।
संतुलन ही असली परीक्षा
आज की तमाम खबरें एक धागे में बंधी लगती हैं। सरहद की कार्रवाई हो या अदालत की सख्ती, फौज का फेरबदल हो या रोजगार का वादा, हर जगह संतुलन की जरूरत है। सिक्योरिटी और सिविल राइट्स, सियासत और प्रोफेशनलिज्म, सख्ती और जवाबदेही।
हमारा काम केवल ताली बजाना या आलोचना करना नहीं, बल्कि सवाल पूछना भी है। क्योंकि जब सवाल जिंदा रहते हैं, तब लोकतंत्र भी जिंदा रहता है। और शायद यही आज की सबसे बड़ी सीख है।






