
Supreme Court hearing on SIR and BLO workload controversy – Shah Times
बूथ से अदालत तक, काम का दबाव और जवाबदेही
सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर के दौरान बीएलओ पर अत्यधिक दबाव, कथित मौतों और नोटिसों को लेकर चिंता जताई है. अदालत ने राज्यों को अतिरिक्त स्टाफ लगाने और केस टू केस राहत देने के निर्देश दिए. यह मामला सिर्फ प्रक्रिया का नहीं, बल्कि इंसानी गरिमा और प्रशासनिक संतुलन का भी बन गया है.
📍नई दिल्ली✍️Asif Khan
लोकतंत्र की ड्यूटी और इंसानी कीमत,विशेष पुनरीक्षण के बीच थकते कंधे
देश में चुनावी प्रक्रिया हमेशा से मेहनत और भरोसे पर टिकी रही है. बूथ लेवल अधिकारी वही कड़ी हैं जो लोकतंत्र को जमीन से जोड़ती है. वही शिक्षक, वही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, वही स्थानीय कर्मचारी जो सुबह बच्चों को पढ़ाते हैं और शाम को मतदाता सूची का सत्यापन करते हैं. पर जब यही जिम्मेदारी बोझ बन जाए, और बोझ इतना बढ़ जाए कि इंसान की सांसें थकने लगें, तब सवाल सिर्फ प्रशासन का नहीं रहता, इंसाफ़ का हो जाता है.
इन दिनों विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)को लेकर जो तस्वीर उभरी है, वह सिर्फ कागज़ी फॉर्म और डिजिटाइजेशन के आंकड़ों की कहानी नहीं है. यह उन चेहरों की कहानी है जो रात तीन बजे तक मोबाइल की कमजोर रोशनी में दस्तावेज अपलोड करते हैं, जिनके घरों में इंटरनेट नहीं, वाई फाई नहीं, और फिर भी उनसे उम्मीद की जाती है कि वे समय पर लक्ष्य पूरा करें. यह उस शिक्षक की कहानी है जिसे अपनी शादी के लिए छुट्टी नहीं मिली और जिसकी ज़िंदगी टूटते दबाव के नीचे दब गई. यह कहानी कई परिवारों की है जिनके घरों में अब खामोशी है.
सुप्रीम कोर्ट में जो सवाल उठे, वे सिर्फ कानूनी बहस नहीं थे. जब मुख्य न्यायाधीश यह पूछते हैं कि क्या रोज दस फॉर्म भरना भी बोझ है, तो यह सवाल एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था की टकराहट को दिखाता है. दफ्तर के कमरे में बैठे आंकड़ों के पीछे जो मेहनत छिपी होती है, वह हर बार कागज़ों में नहीं दिखती. सीढ़ियां चढ़ना आसान कह देना अलग बात है, पर दिन भर की ड्यूटी, फिर देर रात तक डिजिटल काम, यह सब मिलकर जिस थकान को जन्म देता है, वह आंकड़ों में नहीं आती.
एक तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि अधिकांश फॉर्म डिजिटाइज हो चुके हैं और काम तेजी से बढ़ रहा है. दूसरी तरफ वकील यह कह रहे हैं कि असलियत में बोझ कहीं ज़्यादा है, और नोटिसों का डर अलग से है. जेल भेजने की धमकी, एफआईआर दर्ज होने का भय, समय की सख्त डेडलाइन, यह सब मिलकर काम को सेवा से सज़ा में बदल देता है. सवाल यह नहीं है कि लक्ष्य पूरे हों या न हों, सवाल यह है कि क्या लक्ष्य इंसान से बड़ा हो जाएगा.
लोकतंत्र में प्रक्रिया की अहमियत होती है, पर प्रक्रिया से बड़ा इंसान होना चाहिए. अगर किसी राज्य में हजारों कर्मचारियों की जगह दो तीन गुना स्टाफ लगाया जा सकता है, जैसा कि अदालत ने कहा, तो यह सिर्फ एक तकनीकी निर्देश नहीं है. यह इस बात की याद दिलाता है कि सरकारें मशीन नहीं चलातीं, इंसान चलाते हैं. और इंसान की अपनी सीमा होती है, अपना दर्द होता है.
यह बहस एक और बड़े सवाल की ओर ले जाती है. जब चुनाव अभी दो साल दूर हैं, तब इतनी जल्दबाजी क्यों. क्या यह समय की सही योजना का अभाव है या राजनीतिक दबाव का असर. कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रशासनिक तंत्र पर भरोसे की जगह डर का इस्तेमाल किया जा रहा हो. नोटिस की भाषा, कार्रवाई का अंदाज, और मीडिया में फैलती खबरें, यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जिसमें कर्मचारी अपने कर्तव्य से ज़्यादा अपनी सुरक्षा के बारे में सोचने लगते हैं.
यह भी समझना जरूरी है कि बीएलओ कोई अलग वर्ग नहीं है. वे उसी समाज से आते हैं जिसमें हम सब रहते हैं. उनका बच्चा भी स्कूल जाता है, उनका घर भी उसी मोहल्ले में है जहां हम रहते हैं. जब उन्हें रात भर बाहर रहना पड़ता है, या जब उनके दरवाज़े पर पुलिस का नोटिस आता है, तो डर सिर्फ उन्हें नहीं लगता, उनके पूरे परिवार को लगता है. लोकतंत्र की कीमत अगर कुछ घरों की शांति से चुकाई जा रही है, तो यह एक खतरनाक संकेत है.
कुछ लोग कहेंगे कि सरकारी नौकरी में यह सब तो होता ही है. दबाव रहता है, लक्ष्य रहता है, काम करना पड़ता है. यह बात अपनी जगह सही है, पर यह भी सच है कि हर दबाव जायज़ नहीं होता. सेवा और शोषण के बीच एक महीन रेखा होती है, जो कई बार दिखती नहीं, पर महसूस जरूर होती है. जब लोग बीमार होने पर भी ड्यूटी करने को मजबूर हों, जब गर्भवती कर्मचारी भी राहत न पा सकें, तब यह रेखा लांघी जा चुकी होती है.
सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि केस टू केस आधार पर छूट दी जा सकती है, एक उम्मीद की किरण जरूर है. पर इसका असली असर तभी होगा जब ज़मीन पर अफसर इस निर्देश को इंसानित के साथ लागू करेंगे. कागज़ पर लिखे आदेश और ज़मीनी हकीकत के बीच अक्सर बड़ा फासला रहता है. सवाल यह है कि क्या यह फासला इस बार कम होगा.
एक और पहलू है मुआवजे का. अदालत ने कहा कि इसके लिए अलग से आवेदन किया जाए. यह कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, पर नैतिक सवाल यह है कि क्या किसी की जान जाने के बाद परिवार को राहत के लिए दर दर भटकना चाहिए. जिस काम को समाज और देश के लिए जरूरी बताया गया, उसी काम में अगर किसी की जान गई, तो उसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा. यह सवाल किसी एक संस्था का नहीं, पूरे तंत्र का है.
यह मामला सिर्फ एक राज्य का नहीं है. अलग अलग राज्यों से आती खबरें दिखाती हैं कि दबाव का यह पैटर्न कहीं न कहीं दोहराया जा रहा है. कहीं नोटिस, कहीं एफआईआर, कहीं समय की सख्ती. चुनावी सुधार जरूरी हैं, वोटर लिस्ट की शुद्धता जरूरी है, लेकिन सुधार का रास्ता डर से होकर गुज़रे, यह जरूरी नहीं.
लोकतंत्र की असली ताकत उसकी प्रक्रिया में नहीं, उसके लोगों में होती है. अगर लोग ही टूटने लगें, थकने लगें, डरने लगें, तो प्रक्रिया कितनी भी मजबूत क्यों न हो, खोखली हो जाती है. यह वही बात है जैसे किसी इमारत की नींव खोखली हो, ऊपर कितना भी सुंदर रंग रोगन कर लिया जाए, वह टिक नहीं पाती.
कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं कि आज तकनीक का दौर है, सब कुछ डिजिटल हो रहा है, तो काम आसान होना चाहिए. लेकिन तकनीक तभी आसान बनाती है जब उसके साथ संसाधन भी हों. कमजोर नेटवर्क, पुराने मोबाइल, बिजली की कटौती, यह सब मिलकर डिजिटल काम को और मुश्किल बना देते हैं. एक शहर में बैठा अफसर जब कहता है कि सब कुछ ऑनलाइन है, तो वह उस गांव की तस्वीर शायद नहीं देख पाता जहां एक फाइल अपलोड करने में आधा घंटा लग जाता है.
यह भी सच है कि देश में चुनाव आयोग की साख एक मजबूत संस्था के रूप में रही है. उस साख का इस्तेमाल अगर कर्मचारियों के हित में किया जाए, तो यह विवाद बहुत हद तक थम सकता है. पर अगर वही साख दबाव बनाने का हथियार बन जाए, तो भरोसा कमजोर पड़ता है. संस्थाएं लोगों के भरोसे से चलती हैं, डर से नहीं.
इस पूरे विवाद में राजनीतिक दलों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. याचिकाएं दाखिल करना, आरोप लगाना, आंकड़े पेश करना, यह सब लोकतंत्र का हिस्सा है. पर क्या इन दलों ने कभी उन बीएलओ के घर जाकर पूछा कि हाल क्या है. क्या किसी ने उन बच्चों से बात की जिनके पिता या मां इस दबाव के नीचे टूट गए. अगर राजनीति सिर्फ अदालत की बहस तक सीमित रह जाए, और ज़मीन की तकलीफ अनसुनी रह जाए, तो यह भी एक तरह की नाकामी है.
आम आदमी की नजर से देखें तो यह मामला बहुत सीधा है. कोई भी यह नहीं चाहता कि उसका वोट गलत दर्ज हो, या उसका नाम सूची से हट जाए. वह यह भी चाहता है कि प्रक्रिया सही ढंग से हो. पर वही आम आदमी यह भी चाहता है कि जो व्यक्ति उसके वोट की जिम्मेदारी उठा रहा है, वह सुरक्षित रहे, सम्मान के साथ काम करे, और डर के साए में न जिए. इन्हीं दो उम्मीदों के बीच संतुलन बनाना लोकतंत्र की असली परीक्षा है.
यह संतुलन तभी बन सकता है जब प्रशासन अपनी भाषा और रवैया बदले. नोटिस की जगह संवाद, धमकी की जगह सहयोग, और लक्ष्य की जगह योजना को प्राथमिकता दे. अगर एक कर्मचारी दिन भर स्कूल में पढ़ाता है और रात भर डेटा अपलोड करता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आलसी है, इसका मतलब यह है कि व्यवस्था ने उसके हिस्से का काम किसी और को नहीं दिया.
कुछ लोग पूछ सकते हैं कि फिर समाधान क्या है. समाधान कोई जादुई शब्द नहीं है. समाधान छोटे छोटे कदमों में है. अतिरिक्त स्टाफ की तैनाती, समय सीमा में यथार्थवादी बदलाव, तकनीकी मदद, और सबसे जरूरी सम्मान. जब किसी कर्मचारी को यह महसूस होता है कि उसकी मेहनत देखी जा रही है, और उसकी मजबूरी समझी जा रही है, तो वही कर्मचारी असंभव को भी संभव बना देता है.
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इस मायने में अहम है कि उसने यह बहस सिर्फ कानूनी दायरे में नहीं रहने दी. उसने इंसानी पहलू को केंद्र में रखा. पर अदालत का काम रास्ता दिखाना है, चलना सरकारों और संस्थाओं को होता है. अगर यह मामला सिर्फ फाइलों में घूमता रहेगा, और ज़मीन पर कुछ नहीं बदलेगा, तो यह एक और खोया हुआ मौका होगा.
आज जब हम विकास, डिजिटल इंडिया, और विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बात करते हैं, तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि यह सब उन्हीं लोगों के कंधों पर टिका है जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. बीएलओ कोई सुर्खियों के हीरो नहीं होते, पर वे उसी कहानी के नायक हैं जिसका अंत एक निष्पक्ष चुनाव में होता है.
यह संपादकीय किसी एक पक्ष के समर्थन में नहीं, बल्कि एक सच की याद दिलाने के लिए है. वह सच यह है कि लोकतंत्र सिर्फ मतपत्रों से नहीं चलता, वह इंसानों से चलता है. और इंसान तभी बेहतर काम कर सकता है जब वह सुरक्षित महसूस करे, सम्मान पाए, और यह भरोसा रखे कि अगर वह गिरेगा, तो तंत्र उसे कुचलने की जगह सहारा देगा.
शायद अब समय आ गया है कि हम लक्ष्य पूरे होने की खुशी से पहले यह पूछें कि क्या रास्ते में किसी की ज़िंदगी तो नहीं टूट गई. हम यह भी पूछें कि क्या प्रक्रिया इतनी पवित्र है कि उसके नाम पर इंसान की कीमत वसूल की जाए. अगर इन सवालों के जवाब ईमानदारी से खोजे गए, तो शायद आने वाले चुनाव सिर्फ संख्या में ही नहीं, इंसानियत में भी मजबूत होंगे.






