
Revised voter roll schedule across key Indian states, Shah Times.
मतदाता सूची संशोधन में विस्तार, आयोग ने नई तिथियाँ तय कीं
यूपी और अन्य प्रदेशों को राहत, मसौदा सूची अब देरी से जारी
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की समयसीमा यूपी समेत छह प्रदेशों में बढ़ा दी है। नई तिथियों के अनुसार मसौदा सूची अब महीने के अंत तक जारी होगी।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
उत्तर प्रदेश और उसके साथ कई प्रदेशों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण चल रहा है। चुनावी माहौल हमेशा की तरह संवेदनशील है। लोग चाय की दुकान पर बैठकर कहते हैं कि “सूची में नाम रह जाए, वही बड़ा सुकून।” यह छोटी-सी बात लगती है, पर असल में लोकतंत्र की सबसे गहरी परत यहीं बसती है। आयोग का यह निर्णय कि सूची की समयसीमा बढ़ाई जाए, ठंडी हवा की तरह आया है, खासकर उन लोगों के लिए जो अब तक फॉर्म भरने में पिछड़ गए थे या जिनकी प्रविष्टियों को दोबारा जाँचना ज़रूरी था।
यह विस्तार इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि सूची में ग़लत प्रविष्टियाँ, मृत अथवा स्थानांतरित मतदाता, और दोहराव की समस्या कई प्रदेशों में लगातार चिन्हित हुई है। यही वजह है कि आयोग ने समय बढ़ाकर एक तरह से यह संदेश दिया है कि मज़बूत सूची लोकतंत्र की पहली शर्त है।
क्या बदला और क्यों
रिपोर्ट के अनुसार, सबसे ज़्यादा प्रभाव उत्तर प्रदेश में दिख रहा है। यहाँ लोगों का बहाव हमेशा ज़्यादा रहा है। जगह बदलने वाले, पढ़ाई या रोज़गार के लिए बाहर गए युवा, या बुज़ुर्ग जिनके दस्तावेज़ पुराने थे — सबको अतिरिक्त समय मिला है। फ़ॉर्म जमा करने की अवधि अब पंद्रह दिन और बढ़ी है। कई परिवार जो खेत-खलिहानों में व्यस्त थे, अब राहत महसूस कर रहे हैं।
तमिलनाडु और पुडुचेरी में यह अवधि तीन दिन बढ़ी। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और अंडमान निकोबार में सात दिन का समय मिला। इन आंकड़ों को देख कर समझ आता है कि प्रदेशों की ज़रूरतें अलग हैं, और आयोग ने एक ही रूल नहीं चलाया, बल्कि स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से सोचने की कोशिश की। मतदाता सूची का मसौदा इन प्रदेशों में अब नई तिथियों पर जारी होगा।
लोग अक्सर कहते हैं कि “इतना बड़ा देश, इतनी बड़ी जनसंख्या… ग़लती तो हो ही जाती है।” यह बात ठीक है, मगर साथ ही यह भी सच है कि अगर ग़लत नाम हटा दिए जाएँ और सही नाम जोड़ दिए जाएँ, तो चुनाव परिणामों पर भरोसा और भी गहरा हो जाता है।
यूपी की अलग स्थिति
उत्तर प्रदेश की स्थिति हमेशा से अलग मानी जाती है। यहाँ मतदाता संख्या इतनी ज़्यादा है कि कौन अनुपस्थित है, कौन स्थानांतरित, और कौन दोहरी प्रविष्टि में आया — यह सब निकालना चुनौतीपूर्ण है।
आयोग की तरफ़ से हुई जाँच में अनेक प्रविष्टियाँ संदेहास्पद बताई गईं। मिसाल के तौर पर, लाखों फॉर्म ऐसे थे जिनमें मतदाताओं ने जवाब ही नहीं दिया। कुछ बूथों पर पता चला कि अनेक नाम उन लोगों के थे जो वर्षों पहले कहीं और जा चुके थे। अन्य जगहों पर डुप्लिकेट प्रविष्टियाँ मिलीं। ऐसे में अतिरिक्त समय देना समझदारी थी।
साधारण भाषा में कहें तो आयोग ने कहा: “पहले पूरी तरह जाँच लो, फिर आगे बढ़ो।” यह फैसला मतदाताओं के भरोसे को मज़बूत करने वाला है।
अन्य प्रदेशों की स्थिति
तमिलनाडु में पाँच दिन की भारी बारिश और प्रशासनिक गतिविधियों पर उसका असर रहा। पुडुचेरी ने स्थानीय त्योहारों और स्टाफ की कमी की बात उठाई। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में प्रवासन ज़्यादा है। अंडमान निकोबार में दूरी की चुनौती और सीमित स्टाफ की वजह से जाँच में देरी हुई।
इन सभी वजहों को देखते हुए समय बढ़ाया गया। यह संयोग नहीं, बल्कि ज़रूरत थी।
पश्चिमी बंगाल—जैसे का तैसा
दिलचस्प बात यह है कि पश्चिमी बंगाल में कोई बदलाव नहीं किया गया। वहाँ शोर-शराबे की खबरें जरूर आईं, कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ भी सामने आईं, मगर आयोग ने साफ़ कहा कि शेड्यूल में बदलाव की माँग ही नहीं आई। यह एक तरह से यह संदेश भी देता है कि किसी प्रदेश में राजनीतिक हलचल हो, इसका मतलब यह नहीं कि पूरा सिस्टम बदल जाए। प्रक्रिया वही रहती है, नियम वही चलते हैं।
लोकतांत्रिक अर्थ
यह फैसला सिर्फ तारीखें बढ़ाने जैसा नहीं है। यह एक संकेत है कि सूची को और साफ़ बनाया जाएगा। खासकर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े प्रदेश में, जहाँ एक छोटी ग़लती लाखों को प्रभावित कर सकती है। सूची में नाम सही होना उतना ही ज़रूरी है जितना चुनाव के दिन वोट डालना।
लोग अक्सर एक उदाहरण देते हैं कि “अगर घर की मेहमान सूची में नाम ग़लत लिखा हो, तो मेहमान नाराज़ हो जाते हैं।” चुनाव में यह बात और भी सूक्ष्म हो जाती है, क्योंकि यहाँ नाराज़गी सिर्फ घर तक सीमित नहीं रहती, लोकतंत्र तक पहुँच जाती है।
संभावित चुनौतियाँ
समय बढ़ाने से यह ज़रूर उम्मीद है कि सूची ज़्यादा साफ़ और भरोसेमंद बनेगी, लेकिन साथ ही यह चुनौती भी है कि क्या यह अतिरिक्त समय पूरी तरह उपयोग होगा? क्या स्थानीय अधिकारी नए निर्देशों के अनुसार तेजी से काम कर पाएँगे? क्या मतदाता सच में जागरूक होकर अपने दस्तावेज़ समय पर दे पाएँगे?
यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि कई बार लोग अंतिम तारीख तक इंतज़ार करते रहते हैं। छोटे कस्बों में यह प्रवृत्ति और भी ज़्यादा है। ऐसे में प्रशासन और सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा।
नतीजा क्या होगा?
जब सूची साफ़ होगी, तो चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा बढ़ेगा। शक-शुबहा कम होगा। राजनीतिक बहसें अधिक मुद्दों पर होंगी, कम तकनीकी गड़बड़ियों पर। यही लोकतंत्र का असली सौंदर्य है — जहाँ जनता और व्यवस्था दोनों मिलकर सुधार की राह बनाते हैं।




