
SIR, Mamata Banerjee and the uncomfortable test of democracy
मतदाता सूची से सत्ता तक, भरोसे की लड़ाई
आयोग, सरकार और आम आदमी का सवाल
लोकतंत्र के आईने में एसआईआर विवाद
पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और निर्वाचन आयोग के बीच टकराव ने लोकतंत्र, प्रक्रिया और भरोसे पर बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं।
एसआईआर की प्रक्रिया तकनीकी से ज़्यादा राजनीतिक और मानवीय बन गई है। आरोप, प्रत्यारोप और अदालत की दहलीज़ तक पहुंचा यह विवाद लोकतंत्र की सेहत पर सीधी बहस मांगता है।
📍 कोलकाता ✍️ Asif Khan
जब सवाल सिर्फ़ काग़ज़ों का नहीं रहता
मतदाता सूची आमतौर पर एक सूखी प्रशासनिक चीज़ लगती है। नाम, उम्र, पता और कुछ दस्तावेज़। लेकिन जैसे ही किसी को लगता है कि उसका नाम कट सकता है, मामला अचानक दिल से जुड़ जाता है। पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर यही हुआ। यह बहस अब सिर्फ़ प्रक्रिया की नहीं, पहचान और भरोसे की बन चुकी है। ममता बनर्जी का ग़ुस्सा इसी जगह से निकलता दिखता है।
कठोर शब्द और उनके पीछे का डर
टॉर्चर कमीशन, तुगलकी फ़ैसले, हिटलरी अंदाज़। ये शब्द हल्के नहीं हैं। इन्हें बोलते वक्त कोई नेता जानता है कि वह आग में घी डाल रहा है। लेकिन कभी कभी राजनीति में शब्द डर का अनुवाद बन जाते हैं। डर इस बात का कि कहीं वैध मतदाता बाहर न हो जाए। डर इस बात का कि प्रक्रिया इंसान को कुचल न दे।
एक ही देश, अलग अलग नियम
यह सवाल साधारण है, पर असर गहरा। अगर बिहार में कुछ दस्तावेज़ चल गए और बंगाल में वही काग़ज़ बेकार हो गए, तो आम आदमी क्या समझे। वह यही सोचेगा कि नियम बदल रहे हैं या नीयत। कोई भी सिस्टम तब तक मजबूत नहीं लगता जब तक वह हर जगह एक जैसा न दिखे। यहां आयोग को सिर्फ़ नियम नहीं, नियमों की वजह भी साफ़ करनी चाहिए थी।
तेज़ी की राजनीति और थकता हुआ समाज
कहा जा रहा है कि जो काम बरसों में होना था, वह कुछ महीनों में कराया जा रहा है। प्रशासन इसे कुशलता कहेगा। ज़मीन पर खड़ा आदमी इसे दबाव कहेगा। त्योहार, खेती, रोज़गार, बीमारी। इन सबके बीच अचानक दस्तावेज़ ढूंढने की दौड़ लगवा देना आसान फ़ैसला नहीं है। कभी आपने बुज़ुर्ग पड़ोसी को बैंक की लाइन में खड़ा देखा है। नियम सही होता है, पर तस्वीर बेचैन कर देती है।
अल्पसंख्यक और हाशिए की बेचैनी
जब यह आरोप लगता है कि कुछ समुदायों को ज़्यादा निशाना बनाया जा रहा है, तो मामला और नाज़ुक हो जाता है। इतिहास हमें सिखाता है कि पहचान की जांच अक्सर सबसे पहले कमज़ोरों पर भारी पड़ती है। अगर ऐसा हो रहा है, तो यह सिर्फ़ राजनीतिक मुद्दा नहीं, नैतिक संकट है। और अगर नहीं हो रहा, तो इसे साबित करना भी उतना ही ज़रूरी है।
अफ़सरों पर कार्रवाई और सिस्टम का संदेश
एईआरओ अधिकारियों के निलंबन पर उठा विवाद बताता है कि सिस्टम के भीतर भी भरोसा डगमगा रहा है। बिना सुने सज़ा देना किसी भी इंसाफ़ की बुनियाद को हिला देता है। अफ़सर अगर हर फ़ैसले में डरेंगे, तो निष्पक्षता कैसे बचेगी। यहां सरकार और आयोग दोनों को सोचना चाहिए कि वे अपने कर्मचारियों को क्या संदेश दे रहे हैं।
आंकड़ों की सियासत और इंसानी क़ीमत
लाखों नाम हटने और सैकड़ों मौतों के दावे सुनकर कोई भी सिहर जाएगा। सवाल यह नहीं कि आंकड़े सही हैं या नहीं। सवाल यह है कि अगर लोगों को ऐसा लग रहा है, तो सिस्टम कहां चूक गया। डर चाहे सच हो या भ्रम, उसका असर असली होता है। राजनीति में अक्सर यही भूल हो जाती है।
अदालत का मंच और प्रतीकात्मक लम्हा
मुख्यमंत्री का खुद अदालत में खड़े होकर दलील देना असामान्य है। यह एक संदेश है कि मामला सिर्फ़ प्रशासनिक नहीं, अस्तित्व का है। हाथ जोड़कर खड़े होने की तस्वीरें भावनाओं को छूती हैं, लेकिन अदालतें भावनाओं से नहीं चलतीं। यहां से निकलने वाला फ़ैसला आने वाले सालों तक मिसाल बनेगा।
सत्ता बनाम संस्था या दोनों की परीक्षा
यह कहना आसान है कि आयोग दबाव में है या सरकार राजनीति कर रही है। सच शायद बीच में कहीं है। लोकतंत्र में संस्थाएं और चुनी हुई सरकारें एक दूसरे पर निगरानी रखती हैं। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो नुकसान किसी एक का नहीं, सबका होता है। एक दोस्त की तरह सोचें तो, यह बहस जीतने की नहीं, व्यवस्था बचाने की है।
आम मतदाता की खामोश उम्मीद
इस पूरे शोर में आम मतदाता सबसे शांत है। वह टीवी बहसों में नहीं चिल्लाता। वह बस चाहता है कि उसका नाम रहे, उसका वोट पड़े, और उसकी इज़्ज़त बनी रहे। उसके लिए न तुगलक मायने रखता है, न हिटलर। उसके लिए मायने रखता है कि सिस्टम उसे अपना समझे।
आगे क्या किया जा सकता है
संवाद, पारदर्शिता और समय। ये तीन शब्द साधारण लगते हैं, लेकिन अमल में सबसे मुश्किल हैं। प्रक्रिया की समीक्षा, दस्तावेज़ों में समानता, और शिकायतों की तेज़ सुनवाई। इससे न सरकार कमजोर होगी, न आयोग। उल्टा भरोसा बढ़ेगा।
आखरी सोच
एसआईआर विवाद हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र कोई मशीन नहीं, एक जीवित व्यवस्था है। इसमें गलती भी होती है और सुधार भी। सवाल यह नहीं कि कौन ज़्यादा ताक़तवर है। सवाल यह है कि क्या हम इंसान को सिस्टम से ऊपर रख पा रहे हैं। अगर जवाब हां है, तो लोकतंत्र सुरक्षित है। अगर नहीं, तो खतरे की घंटी बज चुकी है।





