
Strategic trade discussion between India and the US amid tariff debate – Shah Times
टैरिफ़ सियासत के दरमियान ट्रेड समझौते का इम्तिहान
अदालत, एग्ज़िक्युटिव पावर और भारत अमेरिका रिश्ता
अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए वैश्विक पारस्परिक टैरिफ़ को निरस्त कर एक अहम संवैधानिक संदेश दिया है। इसके बावजूद व्हाइट हाउस का रुख सख़्त है और सेक्शन 122 के तहत 10 प्रतिशत अतिरिक्त ग्लोबल टैरिफ़ की घोषणा ने बहस को और तेज़ कर दिया है। सवाल यह है कि भारत अमेरिका ट्रेड डील, जो अंतिम चरण में बताई जा रही है, इस कानूनी और सियासी उथल पुथल में किस दिशा में जाएगी। क्या यह समझौता स्थिरता लाएगा या नई शर्तों के साथ फिर से लिखा जाएगा।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
भारत अमेरिका टैरिफ़ टकराव और नई ट्रेड दिशा
अदालत का फैसला और एग्ज़िक्युटिव की हद
अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट का छह तीन का फैसला सिर्फ़ एक कानूनी तकनीकी मामला नहीं है। यह उस बुनियादी सवाल से जुड़ा है कि टैक्स और टैरिफ़ लगाने का हक़ किसके पास है। अदालत ने साफ़ कहा कि इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के तहत राष्ट्रपति को इम्पोर्ट ड्यूटी लगाने की खुली छूट नहीं मिलती। संविधान में टैक्सेशन की ताक़त कांग्रेस के पास है।
यह फैसला एक तरह से एग्ज़िक्युटिव पावर पर ब्रेक है। लेकिन क्या इससे व्हाइट हाउस की ट्रेड स्ट्रैटेजी रुक जाएगी। शायद नहीं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में सख़्त लहजे ने साफ़ कर दिया कि पॉलिसी की दिशा बदलेगी, रफ़्तार नहीं। सेक्शन 122 के तहत अतिरिक्त 10 प्रतिशत ग्लोबल टैरिफ़ की घोषणा यही दिखाती है कि सियासत में रास्ते बंद नहीं होते, सिर्फ़ मोड़ बदलते हैं।
यहां हमें एक असहज सवाल पूछना चाहिए। क्या बार बार इमरजेंसी का हवाला देकर ट्रेड पॉलिसी बनाना एक लंबी अवधि की स्ट्रैटेजी है या यह तात्कालिक सियासी दबाव का नतीजा है।
टैरिफ़ हथियार या इलाज
टैरिफ़ को अक्सर घरेलू इंडस्ट्री की हिफ़ाज़त का औज़ार बताया जाता है। दलील दी जाती है कि इससे ट्रेड डेफिसिट घटेगा और मैन्युफैक्चरिंग को बूस्ट मिलेगा। मगर तजुर्बा बताता है कि टैरिफ़ एक दोधारी तलवार है।
मान लीजिए आप अपने शहर के बाज़ार में बाहर से आने वाली सब्ज़ियों पर टैक्स बढ़ा दें ताकि लोकल किसान को फायदा हो। शुरुआत में किसान खुश होगा, लेकिन अगर बीज, मशीन और खाद भी बाहर से आती हो तो उनकी कीमत बढ़ जाएगी। आख़िरकार उपभोक्ता महंगी सब्ज़ी खरीदेगा और किसान की लागत भी बढ़ेगी। यही हाल ग्लोबल ट्रेड का है।
अमेरिका में स्टील और एल्युमीनियम पर लगे सेक्शन 232 टैरिफ़ बरक़रार हैं। ऑटो और कुछ ऑटो कंपोनेंट्स पर भी ड्यूटी जारी है। सवाल यह है कि क्या इससे मैन्युफैक्चरिंग में स्थायी रोज़गार बढ़ा या महंगाई का दबाव बढ़ा। आंकड़े बताते हैं कि दोनों असर साथ साथ चलते हैं।
भारत अमेरिका डील का पेचीदा मोड़
अब बात उस समझौते की, जो नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच अंतिम चरण में बताया जा रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था में 25 प्रतिशत पारस्परिक टैरिफ़ को घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा की गई थी। रूस से कच्चा तेल खरीदने पर लगाए गए दंडात्मक शुल्क हटाने की भी बात हुई।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद समीकरण बदले हैं। अगर पारस्परिक टैरिफ़ की वैधता पर सवाल है, तो भारत को 55 प्रतिशत निर्यात पर 18 प्रतिशत देने की बाध्यता क्यों रहे। क्या अब स्टैंडर्ड एमएफ़एन टैरिफ़ लागू होंगे। अगर ऐसा होता है तो भारतीय एक्सपोर्टर के लिए राहत होगी।
मगर कहानी इतनी सीधी नहीं है। सेक्शन 232 के तहत स्टील पर 50 प्रतिशत और कुछ ऑटो पार्ट्स पर 25 प्रतिशत टैक्स जारी रहेंगे। स्मार्टफोन, पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और फार्मा के बड़े हिस्से पर टैरिफ़ नहीं है। यानी तस्वीर मिली जुली है।
यहां भारत को भावनाओं से नहीं, कैलकुलेशन से काम लेना होगा। क्या हमें जल्दी में डील साइन करनी चाहिए या नए कानूनी हालात में शर्तों की समीक्षा करनी चाहिए।
सियासत की बयानबाज़ी बनाम ज़मीनी हक़ीक़त
जब कहा जाता है कि भारत हमें लूट रहा था या हमने फ्लिप कर दिया है, तो यह बयान घरेलू सियासत के लिए असरदार हो सकता है। मगर ट्रेड रिश्ते नारों से नहीं, नंबर से चलते हैं।
भारत और अमेरिका के बीच टेक्नोलॉजी, डिफेंस, एनर्जी और सर्विस सेक्टर में गहरा ताल्लुक है। आईटी सर्विस, फार्मा सप्लाई और सेमीकंडक्टर कोऑपरेशन महज़ टैरिफ़ से तय नहीं होते। यहां लॉन्ग टर्म पॉलिसी और भरोसा अहम है।
अगर हर कुछ महीनों में एग्ज़िक्युटिव ऑर्डर के ज़रिये टैरिफ़ बदले जाएं, तो बिज़नेस कम्युनिटी में अनिश्चितता बढ़ती है। इन्वेस्टमेंट फैसले स्थिर माहौल मांगते हैं।
भारत के लिए सबक
भारत को यह समझना होगा कि ग्लोबल ट्रेड में पावर पॉलिटिक्स हमेशा रहेगी। कभी नेशनल सिक्योरिटी का हवाला, कभी ट्रेड डेफिसिट का। मगर हमें अपनी स्ट्रैटेजी तीन स्तर पर बनानी होगी।
पहला, डाइवर्सिफिकेशन। अगर अमेरिका बड़ा मार्केट है तो यूरोप, अफ्रीका और एशिया में भी पहुंच बढ़ानी होगी।
दूसरा, डोमेस्टिक रिफॉर्म। लॉजिस्टिक्स, लेबर रिफॉर्म और सप्लाई चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा तो टैरिफ़ का झटका कम लगेगा।
तीसरा, नेगोशिएशन में ठंडा दिमाग। हर सख़्त बयान का जवाब सख़्त बयान नहीं होता। कई बार खामोशी भी स्ट्रैटेजी होती है।
क्या यह अवसर भी है
सुप्रीम कोर्ट का फैसला एग्ज़िक्युटिव पावर पर एक लिमिट तय करता है। इसका मतलब यह भी है कि भविष्य की ट्रेड पॉलिसी में कांग्रेस की भूमिका बढ़ेगी। कांग्रेस के साथ काम करने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है, लेकिन वह ज्यादा स्थिर होती है।
अगर भारत समझदारी से लॉबिंग और डिप्लोमैटिक एंगेजमेंट बढ़ाए, तो दीर्घकालीन और संस्थागत समझौता संभव है।
हमें यह भी पूछना चाहिए कि क्या हम सिर्फ़ टैरिफ़ में कटौती को सफलता मान लें। असली सवाल यह है कि क्या हमारी इंडस्ट्री ग्लोबल कम्पटीशन के लिए तैयार है। अगर नहीं, तो टैरिफ़ की दीवारें अस्थायी राहत देंगी, स्थायी ताक़त नहीं।
आगे की राह
आने वाले महीनों में अदालतों में राजस्व वापसी का मुद्दा चलेगा। एग्ज़िक्युटिव नए रास्ते तलाशेगा। कांग्रेस अपनी संवैधानिक भूमिका पर जोर देगी। इस खींचतान के बीच भारत को अपनी प्राथमिकता साफ़ रखनी होगी।
ट्रेड डील कोई इमोशनल बयान नहीं, एक लीगल और इकोनॉमिक डॉक्यूमेंट होती है। उसमें हर लाइन का असर लाखों नौकरियों और अरबों डॉलर पर पड़ता है।
शायद यह वक्त जश्न या नाराज़गी का नहीं, ठहरकर सोचने का है। क्या हम सिर्फ़ 18 प्रतिशत बनाम 25 प्रतिशत पर बहस करेंगे, या अपनी एक्सपोर्ट क्वालिटी, वैल्यू एडिशन और टेक्नोलॉजी अपग्रेड पर भी ध्यान देंगे।
भारत अमेरिका रिश्ता सिर्फ़ टैरिफ़ की कहानी नहीं है। यह भरोसे, रणनीति और वैश्विक संतुलन की कहानी है। अदालत का फैसला एक अध्याय है, पूरी किताब नहीं।




