
Shah Times coverage of Supreme Court issuing notice on CEC and EC lifetime immunity law.
सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी और ईसी इम्यूनिटी कानून पर किया नोटिस जारी
सीईसी नियुक्ति और छूट कानून पर केंद्र व ईसी से जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी और चुनाव आयुक्तों को दी गई आजीवन कानूनी छूट से जुड़े कानून पर नोटिस जारी किया है।
केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा गया है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
सुप्रीम कोर्ट ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस उस याचिका पर जारी किया गया है जिसमें संसद द्वारा बनाए गए चीफ इलेक्शन कमिश्नर और अन्य इलेक्शन कमिश्नर, नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल अधिनियम, २०२३ के एक प्रावधान को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि इस कानून के तहत सीईसी और ईसी को अपने आधिकारिक काम के दौरान किए गए कार्यों के लिए सिविल और क्रिमिनल कार्रवाई से आजीवन छूट दी गई है।
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच के सामने हुई। बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि वह इस विषय की जांच करना चाहेगी और इसलिए केंद्र सरकार तथा चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई
कोर्ट की ओर से जारी नोटिस के जरिए दोनों पक्षों से इस कानून के तहत दिए गए प्रावधानों पर उनका पक्ष मांगा गया है। अदालत ने कहा कि वह यह देखना चाहती है कि क्या इस तरह की आजीवन छूट संविधान के ढांचे के अनुरूप है या नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया है और मामला अभी विचाराधीन है।
बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे संवैधानिक महत्व के हैं और इसलिए इनकी जांच जरूरी है। इसके बाद औपचारिक रूप से नोटिस जारी करने का आदेश दिया गया।
याचिका में क्या कहा गया
याचिका में संसद द्वारा पारित २०२३ के कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस कानून से सीईसी और चुनाव आयुक्तों को अप्रत्याशित और व्यापक सुरक्षा मिल जाती है। याचिका के अनुसार, यह प्रावधान इन अधिकारियों को उनकी ड्यूटी के दौरान किए गए किसी भी सिविल या क्रिमिनल कृत्य से जीवन भर के लिए मुक्त कर देता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसी छूट संविधान में किसी अन्य उच्च पदाधिकारी को भी नहीं दी गई है और इससे जवाबदेही की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
संसद के अधिकार पर प्रश्न
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि संसद सीईसी और ईसी को ऐसी आजीवन छूट नहीं दे सकती जो संविधान निर्माताओं ने अन्य संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को भी नहीं दी। दलील में यह भी कहा गया कि न्यायपालिका के जजों को भी इस तरह की आजीवन इम्यूनिटी नहीं है, फिर चुनाव अधिकारियों को यह सुविधा कैसे दी जा सकती है।
इस दलील का उद्देश्य यह दिखाना था कि कानून द्वारा दी गई यह सुरक्षा असाधारण है और इसकी संवैधानिकता पर अदालत की जांच आवश्यक है।
नियुक्ति प्रक्रिया पर भी चुनौती
याचिका में केवल लाइफटाइम इम्यूनिटी का मुद्दा ही नहीं उठाया गया है, बल्कि सीईसी और ईसी की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सवाल किए गए हैं। २०२३ के कानून के तहत नियुक्ति पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं।
इससे पहले एक अंतरिम व्यवस्था के तहत इस पैनल में देश के चीफ जस्टिस को भी शामिल किया गया था। याचिकाकर्ता का कहना है कि चीफ जस्टिस को पैनल से हटाने से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है।
कोर्ट के समक्ष रखी गई दलीलें
सुनवाई के दौरान बेंच के सामने याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि नियुक्ति पैनल की वर्तमान संरचना से कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है। इस कारण चुनाव आयोग की स्वतंत्र और निष्पक्ष भूमिका पर प्रश्न उठ सकते हैं। याचिका में यह भी कहा गया कि पहले जो अंतरिम व्यवस्था थी, उसमें न्यायपालिका की भागीदारी से संतुलन बना रहता था।
कोर्ट ने इन दलीलों को रिकॉर्ड पर लिया और कहा कि वह सभी पहलुओं पर विचार करेगा।
केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब
नोटिस जारी होने के बाद अब केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को तय समय सीमा के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा। उनके जवाब में यह स्पष्ट किया जाएगा कि कानून में दी गई इम्यूनिटी और नियुक्ति प्रक्रिया किस संवैधानिक आधार पर तय की गई है।
सरकार की ओर से यह भी बताया जा सकता है कि यह कानून किस उद्देश्य से बनाया गया और इसके पीछे क्या विधायी मंशा रही।
अधिनियम २०२३ का संदर्भ
चीफ इलेक्शन कमिश्नर और अन्य इलेक्शन कमिश्नर, नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल अधिनियम, २०२३ संसद द्वारा पारित किया गया था। इस कानून का उद्देश्य चुनाव आयोग के शीर्ष पदों से जुड़ी नियुक्तियों और सेवा शर्तों को एक स्पष्ट कानूनी ढांचे में लाना था।
हालांकि, याचिका में कहा गया है कि इसी कानून के एक प्रावधान ने सीईसी और ईसी को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए आजीवन कानूनी सुरक्षा प्रदान कर दी है, जो विवाद का विषय बन गया है।
याचिकाकर्ता की पहचान
इस मामले में याचिकाकर्ता कांग्रेस की जया ठाकुर हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इस कानून के खिलाफ याचिका दाखिल की है। उनकी ओर से अदालत में यह कहा गया कि चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि किसी भी अधिकारी को कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता, चाहे वह कितना ही उच्च पद पर क्यों न हो।
अदालत की आगे की प्रक्रिया
नोटिस जारी होने के बाद यह मामला अगली तारीख पर फिर से सूचीबद्ध किया जाएगा। तब अदालत केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के जवाबों को देखेगी और आगे की सुनवाई करेगी।
इस चरण पर कोर्ट ने कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया है। मामला पूरी तरह से सुनवाई के लिए खुला रखा गया है।
संवैधानिक महत्व
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय से जुड़ा है। चुनाव आयोग देश में चुनावों के संचालन के लिए जिम्मेदार है और उसकी स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक प्रमुख आधार मानी जाती है।
हालांकि, इस रिपोर्ट में किसी भी प्रकार का मूल्यांकन या निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। अदालत द्वारा तय की जाने वाली प्रक्रिया के अनुसार ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
क्या कहा बेंच ने
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि अदालत इस मुद्दे की जांच करना चाहेगी। इसी आधार पर नोटिस जारी किया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा।
बेंच की यह टिप्पणी इस बात को दर्शाती है कि अदालत मामले को गंभीरता से देख रही है।
आगे की सुनवाई
अब इस याचिका पर अगली सुनवाई की तारीख तय की जाएगी। उस दिन केंद्र और चुनाव आयोग के लिखित जवाबों पर विचार किया जाएगा और आगे की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
इस तरह, सीईसी और ईसी से जुड़े इस कानून पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में विस्तृत सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।




