
दिल्ली दंगा केस: सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद, शरजील इमाम की बेल खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगा केस में उमर खालिद और शरजील इमाम की बेल याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि दोनों की तुलना अन्य आरोपियों से नहीं की जा सकती।
📍नई दिल्ली 🗓️ 05 जनवरी 2026 ✍️ Asif Khan
दिल्ली में फरवरी 2020 के दौरान हुई हिंसा से जुड़े केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम ऑर्डर जारी किया है। यह मामला उन आरोपों से जुड़ा है जिनमें कई लोगों पर दंगे की साजिश और हिंसा को भड़काने के इल्ज़ाम लगाए गए हैं। इस केस में कठोर कानूनी प्रावधानों के तहत प्रोसीडिंग्स चल रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
शीर्ष अदालत में बेल से जुड़ी अपीलों पर सुनवाई हुई। बेंच ने केस फाइल, चार्जशीट, और रिकॉर्ड पर मौजूद मैटीरियल को देखा। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ किया कि बेल का फैसला हर आरोपी की भूमिका, सबूत और कानूनी शर्तों के आधार पर किया जाता है।
उमर खालिद और शरजील इमाम पर फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की बेल याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दोनों के मामले अन्य सह-आरोपियों से अलग हैं। अदालत के अनुसार, उपलब्ध मैटीरियल के आधार पर प्रथम दृष्टया आरोप बनते हैं और इस स्टेज पर बेल देने का औचित्य नहीं है।
तुलना से इनकार
अदालत ने यह भी कहा कि किसी एक आरोपी को मिली राहत के आधार पर दूसरे आरोपी को स्वतः बेल नहीं दी जा सकती। हर केस में भूमिका, आरोप और सबूत अलग होते हैं। कोर्ट ने सामूहिक नजरिए से बचने की बात कही और इंडिविजुअल असेसमेंट पर जोर दिया।
अन्य आरोपियों को राहत
इसी आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अन्य आरोपियों को बेल दी है। इनमें गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद शामिल हैं। कोर्ट ने उनके मामलों में अलग परिस्थितियां और फैक्ट्स को ध्यान में रखते हुए राहत दी।
कानूनी प्रावधान
यह केस गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून और अन्य धाराओं के तहत दर्ज किया गया है। ऐसे मामलों में बेल के लिए सख्त मानक लागू होते हैं। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं पर लागू कानूनी शर्तें पूरी नहीं होतीं, इसलिए बेल नहीं दी जा सकती।
अदालत की टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया आरोपों की पुष्टि होती है। अदालत ने यह भी नोट किया कि केस की मेरिट्स पर अंतिम फैसला ट्रायल के दौरान होगा, लेकिन वर्तमान स्टेज पर बेल का आधार नहीं बनता।
दिल्ली दंगे का संदर्भ
फरवरी 2020 में दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा हुई थी। यह घटनाएं नागरिकता कानून से जुड़े प्रदर्शनों के बीच सामने आई थीं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।
जांच और चार्जशीट
जांच एजेंसियों ने इस मामले में विस्तृत जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की थी। आरोप है कि कुछ लोगों ने कथित तौर पर साजिश रची और हिंसा को बढ़ावा दिया। सभी आरोपियों ने इन इल्ज़ामों से इनकार किया है और मामले में न्यायिक प्रक्रिया जारी है।
बेल प्रक्रिया पर कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि बेल नियम है और जेल अपवाद, लेकिन विशेष कानूनों के मामलों में यह सिद्धांत सीमित रूप से लागू होता है। ऐसे मामलों में अदालत को समाजिक प्रभाव, आरोपों की गंभीरता और सबूतों की मजबूती देखनी होती है।
आगे की कानूनी प्रक्रिया
उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले अब निचली अदालत में ट्रायल के लिए आगे बढ़ेंगे। अन्य आरोपियों को बेल मिलने के बाद भी केस की सुनवाई जारी रहेगी। अदालत ने सभी पक्षों को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने को कहा है।
पक्षकारों की स्थिति
बेल खारिज होने के बाद दोनों आरोपियों की न्यायिक हिरासत जारी रहेगी। उनके वकीलों की ओर से आगे कानूनी विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट के आदेश का समर्थन किया है।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से साफ है कि बेल से जुड़े मामलों में अदालत व्यक्तिगत भूमिका और उपलब्ध सबूतों के आधार पर निर्णय लेती है। दिल्ली दंगा केस में कानूनी प्रक्रिया अपने तय रास्ते पर आगे बढ़ रही है।




