
The Supreme Court during a hearing related to a contempt notice issued against an advocate over courtroom conduct.
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: जज से बहस पर वकील को क्यों लगी फटकार
अवमानना नोटिस को चुनौती देने पहुंचे वकील को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, कोर्ट ने बार-बेंच संतुलन पर दी अहम सीख।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
एडवोकेसी, कोर्टरूम मर्यादा और अवमानना की सीमा
संदर्भ: क्या हुआ
सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने कोर्टरूम आचरण और प्रोफेशनल सीमाओं पर फिर बहस खड़ी कर दी। झारखंड हाईकोर्ट के एक जज के साथ तीखी बहस के बाद एडवोकेट महेश तिवारी के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी हुआ था। उसी नोटिस को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे वकील को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की कड़ी टिप्पणी का सामना करना पड़ा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माफी का रास्ता खुला है, लेकिन जजों के प्रति भाषा और व्यवहार की सीमा तय है।
यहां तक कैसे पहुंचे
मामला एक व्यावहारिक विवाद से शुरू हुआ। एक विधवा महिला पर 1.30 लाख रुपये से अधिक का बिजली बिल बकाया था, कनेक्शन काट दिया गया। सुनवाई में जमा राशि को लेकर शर्तें तय हुईं और विवाद निपट गया। लेकिन इसके बाद दलील पेश करने के तरीक़े पर टिप्पणी ने तनाव पैदा किया। वकील ने कोर्ट में अपनी पेशकश की आज़ादी पर जोर दिया, जज ने न्यायिक अनुशासन की बात कही। बहस शब्दों की तीव्रता तक पहुंची और वहीं से अवमानना की प्रक्रिया शुरू हो गई।
यह मामला क्यों अहम है
यह प्रसंग किसी एक वकील या एक जज तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि कोर्टरूम में असहमति कैसे रखी जाए। एडवोकेसी में दृढ़ता ज़रूरी है, लेकिन ज़बान और अंदाज़ का संतुलन भी उतना ही ज़रूरी है। जजों का दायित्व न्यायिक प्रक्रिया को नियंत्रित करना है, वहीं वकीलों का दायित्व मुवक्किल की बात मजबूती से रखना। जब यह संतुलन टूटता है, तो सिस्टम पर दबाव आता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी यहां संकेत देती है कि अवमानना का कानून कोई हथियार नहीं, बल्कि आख़िरी उपाय है। माफी को प्राथमिकता देना उसी सोच का हिस्सा है। साथ ही यह चेतावनी भी है कि कोर्टरूम को पर्सनल टकराव का मंच नहीं बनने दिया जा सकता। इंस्टीट्यूशन की गरिमा पर्सनल एगोज़ से ऊपर रहती है।
किस पर और कैसे
इस तरह के मामले सबसे पहले बार और बेंच के रिश्ते को प्रभावित करते हैं। जूनियर लॉयर्स के लिए यह संदेश जाता है कि आक्रामकता प्रोफेशनल स्ट्रेंथ नहीं है। आम नागरिक के लिए असर अलग है। उन्हें लगता है कि जब कोर्ट के भीतर ही टकराव है, तो न्याय का प्रोसेस कितना सहज रहेगा। मीडिया कवरेज से पब्लिक ट्रस्ट भी प्रभावित होता है, क्योंकि बहस का फोकस फैसलों से हटकर व्यक्तियों पर चला जाता है।
बार काउंसिल्स के लिए भी यह एक रिमाइंडर है कि प्रोफेशनल एथिक्स पर लगातार संवाद ज़रूरी है। कोर्ट्स के लिए सीख यह कि अनुशासन और संवेदनशीलता दोनों साथ चलनी चाहिए।
संतुलन की ज़रूरत
यह मामला किसी विजेता या पराजित का नहीं है। यह याद दिलाता है कि न्यायिक प्रणाली शब्दों से चलती है और शब्द ही उसे चोट भी पहुंचा सकते हैं। असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन मर्यादा उसका आधार। सुप्रीम कोर्ट का रुख यही बताता है कि सख्ती और सहानुभूति के बीच संतुलन बनाए रखना ही सिस्टम को मज़बूत करता है। यही संतुलन आगे भी बार और बेंच दोनों के लिए सबसे बड़ा सबक है।




