
US President speaking on India Pakistan tension issue during a policy meeting | Shah Times
ट्रंप की टैरिफ की धमकी और बैकडोर डिप्लोमेसी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर दावा किया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव को उन्होंने भारी टैरिफ की धमकी देकर रोका। उनके अनुसार आर्थिक दबाव और निजी बातचीत ने संभावित जंग को टाल दिया। दूसरी ओर भारत ने साफ कहा है कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं हुई और सीजफायर का निर्णय दोनों देशों के सैन्य स्तर पर हुआ। सवाल यह है कि क्या यह कूटनीतिक कामयाबी थी या घरेलू राजनीति के लिए रची गई कथा।
📍New Delhi ✍️Asif Khan
बयान की टाइमिंग और सियासी संदर्भ
जब भी कोई ताक़तवर नेता किसी अंतरराष्ट्रीय मसले पर अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, तो हमें सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि उनकी टाइमिंग भी पढ़नी चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप का ताज़ा बयान एक ऐसी मीटिंग में आया जिसे उन्होंने शांति के मंच के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान जंग करते, तो वह दोनों पर 200 फीसदी टैरिफ लगा देते। यह सुनने में एक दमदार संवाद लगता है, जैसे किसी फिल्म का क्लाइमेक्स सीन हो। मगर रियल वर्ल्ड डिप्लोमेसी फिल्मों से थोड़ी अलग होती है।
सवाल यह है कि क्या दो परमाणु ताक़तें महज़ टैरिफ की धमकी से जंग रोक देतीं। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे पर आर्थिक दबाव इतना निर्णायक हो सकता है। या फिर यह बयान घरेलू पॉलिटिक्स के लिए एक स्ट्रॉन्ग नैरेटिव तैयार करने की कोशिश है। अक्सर नेता अपनी छवि को एक निर्णायक, स्ट्रॉन्गमैन की तरह गढ़ते हैं। इस बयान में वही टोन दिखाई देता है।
टैरिफ की राजनीति बनाम जमीनी हकीकत
टैरिफ एक इकॉनमिक टूल है। इसे ट्रेड वार में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन क्या यह मिलिट्री कॉन्फ्लिक्ट को रोकने का प्रभावी तरीका है। मान लीजिए दो पड़ोसी देशों के बीच सीमा पर गोलाबारी हो रही है। उस वक्त ज़मीन पर फैसले सेना के कमांडरों और सरकारों के सुरक्षा सलाहकार लेते हैं। ऐसे में बाहर से आई टैरिफ की चेतावनी कितनी असरदार होगी।
ट्रंप का दावा है कि पैसों की बात आते ही दोनों देशों ने लड़ाई से पीछे हटने का फैसला किया। यह तर्क थोड़ा सादा लगता है। भारत और पाकिस्तान के रिश्ते सिर्फ व्यापारिक समीकरण नहीं हैं। इनके बीच इतिहास, जज़्बात, सुरक्षा, और पब्लिक ओपिनियन जैसे कई फैक्टर काम करते हैं। कोई भी सरकार सिर्फ इस डर से सैन्य कदम नहीं रोकती कि एक्सपोर्ट महंगा हो जाएगा।
यहां हमें एक दूसरा एंगल भी देखना चाहिए। क्या टैरिफ की धमकी खुद एक तरह का प्रेशर पॉलिटिक्स नहीं है। क्या इसे शांति का औज़ार कहा जाए या इकॉनमिक दबाव की रणनीति। दोनों में बारीक फर्क है।
भारत का रुख और संप्रभुता का सवाल
भारत ने साफ कहा है कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं हुई। विदेश मंत्रालय ने दो टूक बयान दिया कि सीजफायर का फैसला डीजीएमओ स्तर की बातचीत में हुआ। यह स्टैंड भारत की पुरानी नीति के अनुरूप है, जिसमें द्विपक्षीय मसलों को द्विपक्षीय तरीके से सुलझाने पर जोर दिया जाता है।
यहां एक अहम सवाल उठता है। अगर भारत लगातार इन दावों को खारिज कर रहा है, तो फिर बार-बार यह कथा क्यों दोहराई जा रही है। क्या यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक खास इमेज बनाने की कोशिश है। या फिर यह घरेलू दर्शकों के लिए तैयार किया गया नैरेटिव है कि देखिए, हमने दो दुश्मन देशों के बीच जंग रुकवा दी।
डिप्लोमेसी में परसेप्शन भी अहम होता है। लेकिन परसेप्शन और फैक्ट में फर्क करना ज़रूरी है। अगर किसी घटना का श्रेय लेने की होड़ शुरू हो जाए, तो असली प्रोसेस धुंधला पड़ जाता है।
आंकड़ों का दावा और विश्वसनीयता
ट्रंप ने यह भी कहा कि 11 फाइटर जेट गिराए गए थे और हालात बेहद खतरनाक थे। इस तरह के दावे हमेशा वेरिफिकेशन की मांग करते हैं। किसी भी सैन्य टकराव में आंकड़ों को लेकर अलग-अलग पक्ष अलग बातें कहते हैं। इसलिए बिना स्वतंत्र पुष्टि के किसी भी संख्या को अंतिम सत्य मान लेना ठीक नहीं।
जब नेता बड़े आंकड़े बोलते हैं, तो उनका मकसद अक्सर प्रभाव पैदा करना होता है। 11 जेट गिराए गए, 2.5 करोड़ जिंदगियां बचाईं गईं। यह भाषा इमोशनल इम्पैक्ट पैदा करती है। लेकिन क्या वास्तव में इतने बड़े पैमाने पर खतरा था। यह सवाल अभी भी खुला है।
क्या आर्थिक दबाव ही अंतिम उपाय है
मान लीजिए कि किसी हद तक बाहरी दबाव ने माहौल ठंडा करने में भूमिका निभाई हो। तब भी हमें यह समझना होगा कि शांति सिर्फ डर के कारण टिकाऊ नहीं होती। अगर दो देशों के बीच अविश्वास गहरा हो, तो असली समाधान संवाद और भरोसे से आता है, न कि टैरिफ की तलवार से।
कई बार घर के दो सदस्यों में झगड़ा होता है। पड़ोसी आकर कह दे कि अगर लड़ाई जारी रही तो वह पानी की सप्लाई बंद कर देगा। हो सकता है झगड़ा उस दिन रुक जाए, मगर मन का फासला खत्म नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में भी कुछ ऐसा ही होता है।
व्यक्तिगत कूटनीति की सीमा
ट्रंप ने कहा कि वह दोनों नेताओं को जानते थे और उन्होंने सीधे फोन कर समझौता कराया। पर्सनल डिप्लोमेसी निश्चित रूप से असर डाल सकती है। लेकिन क्या सिर्फ निजी रिश्ते इतने बड़े संकट को रोक सकते हैं। यह मान लेना शायद ओवरसिंप्लिफिकेशन होगा।
राजनीति में अक्सर नेता अपनी भूमिका को केंद्रीय दिखाते हैं। मगर असल में फैसले कई स्तरों पर होते हैं। मिलिट्री कमांड, इंटेलिजेंस इनपुट, कूटनीतिक बातचीत, बैक चैनल कम्युनिकेशन। यह पूरा प्रोसेस किसी एक फोन कॉल से ज्यादा जटिल होता है।
घरेलू राजनीति और ग्लोबल इमेज
हर बड़ा बयान किसी न किसी पॉलिटिकल संदर्भ में आता है। अगर कोई नेता खुद को पीसमेकर के रूप में पेश करता है, तो यह उसकी ग्लोबल इमेज को मजबूत करता है। खासकर ऐसे समय में जब चुनावी माहौल हो या अंतरराष्ट्रीय आलोचना बढ़ रही हो।
इसलिए यह भी संभव है कि यह बयान एक स्ट्रैटेजिक मैसेजिंग हो। दुनिया को दिखाना कि हम सिर्फ ट्रेड डील नहीं करते, हम जंग भी रोकते हैं। लेकिन दूसरी तरफ अगर संबंधित देश इस दावे को नकार रहे हों, तो विश्वसनीयता का सवाल खड़ा होता है।
सच्चाई शायद बीच में कहीं है
यह भी हो सकता है कि कई फैक्टर एक साथ काम कर रहे हों। जमीनी स्तर पर सैन्य बातचीत, अंतरराष्ट्रीय दबाव, आर्थिक चिंताएं, और राजनीतिक समझदारी। शांति कभी एक कारण से नहीं आती। यह कई छोटे फैसलों का नतीजा होती है।
हमें किसी भी दावे को पूरी तरह खारिज करने या पूरी तरह स्वीकार करने से पहले तथ्यों को देखना चाहिए। भावनात्मक भाषा से परे जाकर यह समझना जरूरी है कि क्या सच में टैरिफ की धमकी निर्णायक थी या यह सिर्फ एक राजनीतिक कहानी है।
आगे का रास्ता
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव नया नहीं है। हर कुछ वर्षों में हालात गर्म होते हैं और फिर ठंडे पड़ते हैं। असली चुनौती यह है कि क्या दोनों देश स्थायी भरोसा बना सकते हैं। बाहरी शक्तियां कभी-कभी माहौल पर असर डाल सकती हैं, मगर दीर्घकालीन समाधान क्षेत्रीय समझदारी से ही आएगा।
इस पूरे प्रकरण से एक सीख जरूर मिलती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बयान और वास्तविकता के बीच दूरी हो सकती है। इसलिए हमें हर दावे को आलोचनात्मक नजर से देखना चाहिए। सिर्फ इसलिए नहीं कि वह किसी विरोधी ने कहा है, बल्कि इसलिए कि सच हमेशा बहुस्तरीय होता है।
आखिर में सवाल वही है। क्या जंग सच में टल गई क्योंकि किसी ने टैरिफ की धमकी दी। या फिर दोनों देशों ने अपने हित में खुद संयम दिखाया। शायद जवाब आसान नहीं है। लेकिन लोकतांत्रिक समाज में सवाल पूछना ही सबसे बड़ी ताकत है।




