
India Pakistan T20 match diplomacy Colombo Shah Times
कॉल से मैदान तक बदलती राजनीति
मैच बहाली और क्षेत्रीय संतुलन
भारत पाकिस्तान टी ट्वेंटी मैच पर पाकिस्तान के यू टर्न ने एक बार फिर दिखाया कि क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, बल्कि संवाद का ज़रिया भी है। श्रीलंका की पहल, मित्र देशों का दबाव और आईसीसी की भूमिका ने इस फैसले को आकार दिया।
पाकिस्तान द्वारा पहले बहिष्कार और फिर खेलने की मंज़ूरी देना सिर्फ खेल का फैसला नहीं था। यह क्षेत्रीय राजनीति, भरोसे और व्यवहारिकता का संगम है। इस संपादकीय विश्लेषण में हम इस बदलाव के कारणों, इसके असर और इसके निहितार्थों को परखते हैं।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
क्रिकेट और सियासत का पुराना रिश्ता
दक्षिण एशिया में क्रिकेट हमेशा बल्ले और गेंद से आगे की कहानी कहता रहा है। जब भी भारत और पाकिस्तान आमने सामने होते हैं, तो मैदान के बाहर की आवाज़ें ज़्यादा तेज़ सुनाई देती हैं। यह कोई नई बात नहीं है। फर्क बस इतना है कि इस बार एक फोन कॉल ने माहौल को पलट दिया। सवाल यह है कि क्या यह बदलाव अचानक था, या फिर पहले से तय किसी रास्ते का नतीजा।
एक कॉल जिसने लहजा बदला
श्रीलंका के राष्ट्रपति और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के बीच हुई बातचीत को कई लोग साधारण शिष्टाचार कह रहे हैं। मगर सच यह है कि यह बातचीत उस वक्त हुई जब पाकिस्तान खुद को एक कोने में खड़ा कर चुका था। बहिष्कार का ऐलान हो चुका था, और अंतरराष्ट्रीय मंच पर सवाल उठने लगे थे। ऐसे में यह कॉल एक आईना बनी, जिसमें पाकिस्तान को अपनी स्थिति साफ दिखी। कभी कभी दोस्त वही होता है जो कठिन समय में सख्त बात कह दे।
व्यवहारिकता बनाम भावनात्मक राजनीति
पाकिस्तान के फैसले को सिर्फ दबाव में लिया गया कदम मानना आसान है, लेकिन अधूरा सच है। भावनात्मक राजनीति में बहिष्कार तालियां दिला सकता है, मगर व्यवहारिक राजनीति रास्ता दिखाती है। क्रिकेट बोर्ड, सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्था सब जानते थे कि मैच न खेलना लंबे समय में नुकसान पहुंचाएगा। यहां सवाल आत्मसम्मान का नहीं, बल्कि समझदारी का था।
आईसीसी की चुप लेकिन अहम भूमिका
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संस्था अक्सर खुद को खेल तक सीमित बताती है। इस मामले में भी उसने यही किया। मगर पर्दे के पीछे लगातार संवाद चलता रहा। यह वह कूटनीति है जो कैमरों से दूर होती है। कोई बयानबाज़ी नहीं, कोई धमकी नहीं। बस यह याद दिलाना कि टूर्नामेंट की विश्वसनीयता सबकी साझा ज़िम्मेदारी है।
श्रीलंका की स्मृति और संदेश
श्रीलंका ने उन्नीस सौ छियानवे की याद दिलाई। वह वक्त जब सुरक्षा चिंताओं के बावजूद भारत और पाकिस्तान कोलंबो में खेले थे। यह याद सिर्फ इतिहास नहीं थी, यह संदेश था। संदेश यह कि खेल कभी कभी डर से बड़ा हो सकता है। श्रीलंका ने खुद को सिर्फ मेज़बान नहीं, बल्कि मध्यस्थ की तरह पेश किया।
बांग्लादेश की अपील और क्षेत्रीय भाईचारा
बांग्लादेश की भूमिका को नज़रअंदाज़ करना गलत होगा। उसकी अपील में भावुकता कम, व्यावहारिकता ज़्यादा थी। क्रिकेट वहां सिर्फ मनोरंजन नहीं, पहचान है। जब वह कहता है कि खेल जारी रहना चाहिए, तो वह अपने अनुभव से बोलता है। यहां एक अनकही बात भी है। अगर आज एक देश बहिष्कार करता है, तो कल कोई और भी कर सकता है। यह सिलसिला खेल को कमजोर करेगा।
यू टर्न की आलोचना या तारीफ
कुछ लोग इसे कमजोरी कह रहे हैं। उनका तर्क है कि फैसले बदलने से संदेश गलत जाता है। लेकिन क्या हर यू टर्न गलत होता है। सड़क पर गलत मोड़ ले लिया जाए, तो वापस मुड़ना ही समझदारी है। पाकिस्तान ने वही किया। उसने माना कि शुरुआती फैसला शायद सही नहीं था। राजनीति में यह स्वीकार करना आसान नहीं, इसलिए यह कदम अपने आप में अहम है।
भारत पाकिस्तान मैच का प्रतीकात्मक अर्थ
यह मैच सिर्फ दो टीमों के बीच नहीं है। यह उन करोड़ों दर्शकों के लिए है जो टीवी के सामने बैठकर कुछ घंटों के लिए बाकी तनाव भूल जाना चाहते हैं। यह उन खिलाड़ियों के लिए भी है, जो राजनीति के बोझ से दूर सिर्फ अपना खेल दिखाना चाहते हैं। यहां एक छोटी सी मिसाल याद आती है। जब बच्चा दो दोस्तों के झगड़े में फंस जाता है, तो वह चाहता है कि बड़े लोग सुलह कर लें। क्रिकेट भी वही बच्चा है।
खेल भावना की असली परीक्षा
खेल भावना शब्द अक्सर भाषणों में सुनाई देता है। असली परीक्षा तब होती है जब हालात मुश्किल हों। इस फैसले से यह तो साफ हुआ कि कम से कम क्रिकेट के मैदान पर संवाद अभी जिंदा है। यह उम्मीद की छोटी सी लौ है, जिसे न तो बहुत बड़ा चमत्कार समझना चाहिए, न ही नजरअंदाज करना चाहिए।
आगे का रास्ता क्या
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक मैच तक सीमित रहेगा। इतिहास बताता है कि खेल अपने आप राजनीति नहीं बदलता, मगर दरवाज़ा ज़रूर खोलता है। अगर इस दरवाज़े से बातचीत, सम्मान और धैर्य अंदर आ सके, तो फायदा होगा। अगर नहीं, तो यह भी एक याद बनकर रह जाएगा।
नतीजा की जगह एक सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक सवाल छोड़ा है। क्या दक्षिण एशिया को हर बार खेल के सहारे संवाद शुरू करना पड़ेगा। या फिर कभी ऐसा वक्त आएगा जब खेल को सिर्फ खेल रहने दिया जाएगा। जवाब आसान नहीं है। मगर इतना तय है कि इस बार क्रिकेट ने टकराव नहीं, बातचीत चुनी। और कभी कभी यही सबसे बड़ी जीत होती है।






