
यूपी बार काउंसिल चुनाव 2025: नामांकन की तेज़ रफ़्तार और सत्ता संतुलन की नई जंग
📍 प्रयागराज
🗓️ 6 नवंबर 2025
✍️ आसिफ़ ख़ान
दो दिनों में 74 नामांकन, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी, 2.49 लाख वोटर, कड़ी जांच, 4 चरणों में मतदान—यूपी बार काउंसिल चुनाव इस बार सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि वकालत बिरादरी की साख और सियासी समझ का बड़ा इम्तिहान बन चुका है।
यूपी बार काउंसिल चुनाव में 74 नामांकन, नई समीकरणों की आहट
यूपी बार काउंसिल का चुनाव हमेशा दिलचस्प रहा है, लेकिन इस बार मामला कुछ और है। पहले दो दिनों में ही 74 अधिवक्ताओं ने नामांकन दाख़िल किया। यह संख्या बताती है कि वकालत बिरादरी सिर्फ representation नहीं चाहती, बल्कि अपना असर, अपना तजुर्बा और अपनी आवाज़ काउंसिल में देखना चाहती है।
यहाँ एक बात समझनी होगी: बार काउंसिल का चुनाव सिर्फ 25 सीटों का मुकाबला नहीं है। यह power structure, professional reputation, और legal fraternity के भीतर leadership की नई परिभाषा गढ़ने वाला मंच भी है।
निगरानी का साया और पारदर्शिता की ज़रूरत
सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी ने माहौल बदला है।
नारेबाज़ी पर रोक, लगातार वीडियोग्राफी, और अनुशासनहीनता पर नामांकन रद्द करने की चेतावनी—ये सब बताते हैं कि सिस्टम अब खुद को साफ़ और मजबूत करने की कोशिश में है।
यहाँ मेरा पहला counter-point उठता है:
क्या सख्ती से पारदर्शिता आती है, या पारदर्शिता तभी बनती है जब भरोसा और ज़िम्मेदारी दोनों तरफ हों?
कई अधिवक्ता मानते हैं कि निगरानी ज़रूरी है, मगर कुछ का कहना है कि अत्यधिक नियंत्रण से democratic spirit प्रभावित होती है।
Truth lies somewhere in the middle.
सिस्टम को सख्ती चाहिए, लेकिन वकालत की आज़ादी भी बराबर महत्त्व रखती है।
डिग्रियों की जांच: पेशे की पवित्रता पर सवाल
120 फर्जी डिग्रियां—ये सिर्फ एक आंकड़ा नहीं। यह legal profession की साख पर चोट है।
“वकालत एक पेशा नहीं, एक अमानत है। और अमानत में ख़यानत बर्दाश्त नहीं की जाती।”
इसलिए scrutiny welcome है, लेकिन यहाँ दूसरा सवाल उठता है:
क्या यह जांच सिस्टम की विफलता का सबूत है, या सुधार का पहला कदम?
दोनों बातें सही हो सकती हैं।
Important part यह है कि verification अब culture बनना चाहिए, न कि forced action.
चुनाव का असल dynamics: तजुर्बा बनाम नया खून
25 सीटों में से 12 पर दस साल तजुर्बा ज़रूरी है।
यहाँ एक छोटा सा example लें—
कोई युवा वकील जो district courts में रोज़ाना struggles face करता है, उसकी priorities अलग होती हैं।
वहीं कोई senior advocate जो committees, precedents और disciplinary matters से जुड़ा रहा है, उसकी सोच ज्यादा institutional होती है।
Council को दोनों चाहिए:
energy भी, और understanding भी।
मगर मैदान में बाज़ी कौन मारेगा?
यही असली लड़ाई है।
चुनावी geography और power clusters
चार phases में चुनाव होगा।
यूपी जैसे बड़े राज्य में यह सिर्फ logistics नहीं, बल्कि political chemistry भी बनाता है।
गोरखपुर, प्रयागराज, लखनऊ, मुज़फ्फरनगर, मेरठ, नोएडा—हर ज़ोन की अपनी बार राजनीति, अपनी grouping, और अपने seniors होते हैं।
This election is not only about who wins but about which regions consolidate influence inside the Council.
Equation कैसे बनते हैं?
बार काउंसिल के चुनाव में caste equations नहीं चलतीं, लेकिन chambers, seniors, practice areas, और regional affiliations ज़रूर चलती हैं।
“रिश्तों का असर और तजुर्बे की गूंज।”फिर भी, , इस बार narrative बदल रहा है।
Young lawyers want representation.
Senior groups want stability.
और दोनों को एक दूसरे की ज़रूरत है।
क्या ये चुनाव वाकई बदलाव लाएगा?
यहाँ तीसरा सवाल उठता है:
क्या काउंसिल के चुनाव से ground realities बदलती हैं?
कुछ लोग कहते हैं—
“काउंसिल सिर्फ resolutions पास करती है।”
लेकिन हक़ीक़त यह है कि disciplinary समितियों से लेकर welfare schemes, bar associations के conflicts, और professional ethics सब कुछ काउंसिल के decisions पर depend करता है।
So yes, change possible है—अगर elected members genuinely work करते हैं।
Alternative Perspective
यह चुनाव तीन चीज़ों पर टिकेगा:
कौन trust build कर सकता है?
कौन professionals की real challenges समझता है?
कौन अपने influence का इस्तेमाल personal gains के बजाय community good के लिए करेगा?
और bottom line यह है:
बार काउंसिल वही होगी जैसी उसके सदस्य उसे बनाते हैं।






