
जब पुलिस हद पार करे और अदालत चेतावनी दे
क्या यूपी पुलिस स्टेट की तरफ बढ़ रहा है
इलाहाबाद हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां सिर्फ पुलिस की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठातीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन की याद भी दिलाती हैं। एनकाउंटर मामलों में न्यायिक अधिकारियों पर कथित दबाव को लेकर हाई कोर्ट की नाराजगी ने यूपी की कानून व्यवस्था, पुलिस संस्कृति और न्यायिक स्वतंत्रता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। यह मुद्दा सिर्फ पुलिस बनाम अदालत का नहीं, बल्कि संविधान बनाम ताकत के इस्तेमाल का है।यह संपादकीय विश्लेषण उसी संतुलन की पड़ताल करता है।
📍Prayagraj ✍️ Asif Khan
यूपी में पुलिस और न्यायपालिका का तनाव: कानून की कसौटी पर एनकाउंटर
अदालत की बात क्यों मायने रखती है
इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। जब कोई संवैधानिक अदालत यह कहे कि राज्य को पुलिस स्टेट नहीं बनने दिया जाएगा, तो यह महज़ जुमला नहीं होता। यह एक जुमला नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अदालत ने जो कहा, उसमें घबराहट भी है और तजुर्बे से निकली हुई सख्ती भी। सवाल यह नहीं कि पुलिस को अपराध से निपटने का अधिकार है या नहीं। सवाल यह है कि उस अधिकार की हद कहां खत्म होती है।
आम आदमी के लिए यह बहस कभी कभी दूर की लगती है। लेकिन सोचिए, अगर कल किसी आम केस में फैसला पुलिस के दबाव में हो जाए, तो इंसाफ का क्या मतलब रह जाएगा। अदालत इसी डर को शब्दों में रख रही है।
एनकाउंटर की संस्कृति और उसका असर
उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर कोई नया शब्द नहीं है। कई लोग इसे तेज इंसाफ मानते हैं। कुछ इसे डर का इलाज कहते हैं। लेकिन कानून इस तरह नहीं चलता। कानून सबूत, सुनवाई और फैसले की मांग करता है। जब गोली पहले चलती है और सवाल बाद में पूछे जाते हैं, तो इंसाफ का रास्ता उल्टा हो जाता है।
अदालत ने खास तौर पर हाफ एनकाउंटर पर सवाल उठाया। पैर में गोली, फिर अखबारों में बड़ी हेडलाइन, फिर प्रमोशन की चर्चा। यह तस्वीर किसी फिल्म की तरह लग सकती है, लेकिन हकीकत में यह सिस्टम को खोखला करती है। हर आरोपी दोषी नहीं होता। और हर पुलिसिया दावा सच नहीं होता। इसी लिए अदालतें होती हैं।
पुलिस का दबाव और न्यायिक आज़ादी
जब कहा जाता है कि कुछ जिलों में पुलिस अधिकारी जजों पर दबाव बनाते हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक समस्या नहीं रह जाती। यह सीधा सीधा न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला बन जाता है। जज अगर यह सोचने लगें कि कौन सा आदेश पुलिस को खुश करेगा, तो अदालत का मतलब ही खत्म हो जाता है।
उर्दू की एक पुरानी बात याद आती है, इंसाफ अगर डर से लिखा जाए, तो वह इंसाफ नहीं रहता। अदालत शायद यही कहना चाह रही है। कानून की किताबें ताकतवर के हिसाब से नहीं, बल्कि संविधान के हिसाब से खुलती हैं।
युवा अफसर और ताकत का नशा
कोर्ट की टिप्पणी में युवा अधिकारियों का जिक्र खास है। यह एक नाज़ुक लेकिन जरूरी बात है। नई वर्दी, जल्दी मिली ताकत और मीडिया की तारीफ कई बार अफसरों को यह यकीन दिला देती है कि वे सिस्टम से ऊपर हैं। लेकिन सिस्टम किसी एक अफसर से नहीं चलता।
एक वरिष्ठ वकील की बात याद आती है। उन्होंने कहा था कि कुर्सी जितनी ऊंची होती है, गिरने की चोट उतनी गहरी होती है। अदालत शायद यही बात युवा अधिकारियों को समझाना चाह रही है।
क्या पुलिस की मजबूरी समझी जानी चाहिए
यह भी सच है कि पुलिस कठिन हालात में काम करती है। राजनीतिक दबाव, अपराध का डर और जनता की उम्मीदें। कई बार हालात ऐसे होते हैं जहां सेकंडों में फैसला लेना पड़ता है। इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन मजबूरी कानून का विकल्प नहीं बन सकती। अगर हर मुश्किल हालात में नियम तोड़े जाएं, तो नियम किताबों में ही रह जाएंगे। अदालत यहां संतुलन की बात कर रही है। ताकत जरूरी है, लेकिन जवाबदेही उससे भी जरूरी है।
बार एसोसिएशन की बात और अदालत की चिंता
जब अदालत कहती है कि बार एसोसिएशन से शिकायतें मिली हैं, तो मामला और गंभीर हो जाता है। वकील रोज अदालत में रहते हैं। वे माहौल को नजदीक से देखते हैं। अगर वे कह रहे हैं कि पुलिस सीधे दबाव बना रही है, तो इसे अफवाह कहकर टाला नहीं जा सकता।
यह सिर्फ जजों का मामला नहीं है। यह हर उस नागरिक का मामला है जो अदालत से इंसाफ की उम्मीद करता है। अगर अदालत का माहौल डर से भरा होगा, तो आम आदमी कहां जाएगा।
अवमानना की चेतावनी का मतलब
हाई कोर्ट की अवमानना की चेतावनी कोई औपचारिक लाइन नहीं है। यह आखिरी कदम से पहले की घंटी है। अदालत यह साफ कर रही है कि अब नरमी का वक्त खत्म हो रहा है। नियमों का पालन नहीं हुआ, तो व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होगी।
यह संदेश ऊपर तक जाता है। डीजीपी से लेकर थाने तक। यह याद दिलाता है कि वर्दी संविधान के अधीन है, संविधान वर्दी के अधीन नहीं।
सरकार और पुलिस की प्रतिक्रिया
डीजीपी और गृह विभाग की सहमति एक सकारात्मक संकेत है। कागज पर यह सही लगता है। लेकिन असली परीक्षा जमीन पर होगी। क्या थानों में व्यवहार बदलेगा। क्या अदालतों के फैसलों का सम्मान होगा।
अक्सर ऐसा होता है कि बयान अच्छे होते हैं और अमल कमजोर। अदालत शायद इस बार सिर्फ भरोसा नहीं कर रही, बल्कि निगरानी भी चाहती है।
बड़ी तस्वीर क्या है
यह पूरा मामला सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं है। यह सवाल पूरे देश के लिए है। क्या हम तेज इंसाफ के नाम पर सही प्रक्रिया छोड़ने को तैयार हैं। क्या हमें ताकतवर हाथ चाहिए या मजबूत कानून।
अंग्रेजी में एक लाइन कही जाती है, power without restraint becomes fear. यही डर अदालत के शब्दों में झलकता है।
नतीजे से पहले एक सवाल
अगर आज अदालत चुप रहती, तो क्या होता। शायद सब कुछ वैसे ही चलता रहता। कुछ एनकाउंटर, कुछ तारीफ, कुछ दबाव। लेकिन चुप्पी भी एक तरह की सहमति होती है। अदालत ने चुप रहने से इनकार किया।
यही इस संपादकीय का सार है। यह पुलिस विरोधी लेख नहीं है। यह कानून समर्थक सोच है।
आखरी बात
उत्तर प्रदेश पुलिस स्टेट बने या नहीं, यह सिर्फ अदालत तय नहीं करेगी। यह पुलिस के व्यवहार, सरकार की नीति और समाज की सोच से तय होगा। अदालत ने आईना दिखा दिया है। अब देखना यह है कि सिस्टम उसमें खुद को पहचानता है या नहीं।





