
Corporate donations to political parties through electoral trusts in India – Shah Times analysis
इलेक्टोरल बॉन्ड बंद, फिर भी चंदे का प्रवाह जारी
लोकतंत्र, चंदा और पारदर्शिता की नई परीक्षा
📍नई दिल्ली ✍️Asif Khan
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना रद्द होने के बाद जिस बदलाव की उम्मीद की जा रही थी, वह जमीन पर दिखाई नहीं देता। कॉर्पोरेट फंडिंग अब इलेक्टोरल ट्रस्ट के रास्ते से फिर उसी गति से सत्ता तक पहुंच रही है। आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में भी भाजपा को सबसे बड़ा हिस्सा मिला, जबकि कांग्रेस और अन्य दल काफी पीछे रह गए। यह संपादकीय इसी नई-पुरानी व्यवस्था की पारदर्शिता, नीयत और लोकतांत्रिक असर का विश्लेषण करता है।
इलेक्टोरल बॉन्ड को जब असंवैधानिक करार दिया गया, तब बहुत-से लोगों ने इसे लोकतंत्र की जीत कहा। लगा कि अब राजनीति और पैसे के रिश्ते पर कुछ रोशनी पड़ेगी। आम नागरिक को उम्मीद बंधी कि अब वह यह जान सकेगा कि सत्ता के पीछे खड़ा धन आखिर आता कहां से है। मगर कुछ ही महीनों में यह भरोसा धीमे-धीमे सवाल में बदलने लगा। कारण साफ था। बॉन्ड गए, मगर ट्रस्ट बचे रहे। रास्ता बदला, मंज़िल वही रही।
यह वही कहानी है जिसमें किरदार बदलते हैं, पर स्क्रिप्ट लगभग वही रहती है। पहले बॉन्ड थे, अब ट्रस्ट हैं। पहले गोपनीयता एक स्कीम के भीतर छिपी थी, अब वह कानूनी खामोशी के भीतर सुरक्षित है। फर्क बस इतना है कि पहले बैंक के जरिए पहचान छिपती थी, अब ट्रस्ट के जरिए दानदाता का नाम परदे में है। बाहर से देखने पर लगता है कि सिस्टम बदला, भीतर से देखने पर लगता है कि बस परदा बदला है।
यहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसे कितना चंदा मिला। असली सवाल यह है कि चंदा मिलना लोकतंत्र के लिए क्या मायने रखता है। जब एक ही पार्टी को लगभग पूरा हिस्सा मिलता है, तो मुकाबले का संतुलन कैसे बचेगा। जब विपक्ष संसाधनों की कमी से जूझेगा, तो सत्ता से सवाल कौन पूछेगा। चुनाव महज वोटों का खेल नहीं, संसाधनों का भी मैच होता है। और जब मैदान ही बराबर न हो, तो नतीजों पर भरोसा कमजोर पड़ने लगता है।
आंकड़े अपना-अपना सच कहते हैं। भाजपा को ट्रस्टों से सैकड़ों करोड़ का समर्थन मिला। कांग्रेस को मिला, मगर कहीं कम। अन्य दलों का हाल और भी सीमित रहा। कुछ क्षेत्रीय दलों को थोड़ी राहत जरूर दिखी, पर वह राहत उस भारी प्रवाह के सामने बहुत छोटी लगती है जो सत्ता की ओर बह रहा है। यह असमानता सिर्फ पैसों की नहीं, राजनीतिक ताकत की भी है।
यहां एक दिलचस्प बात यह भी है कि लोग अकसर कहते हैं कि कॉर्पोरेट पैसा विकास के लिए जरूरी है। दलील दी जाती है कि जो पार्टी स्थिर सरकार देती है, वही निवेश का भरोसा बनाती है, इसलिए पैसा उसी ओर जाता है। सुनने में यह बात व्यवहारिक लगती है। मगर इसी तर्क में एक खतरनाक फिसलन भी छिपी है। अगर पैसा सिर्फ सत्ता की गारंटी पर बहेगा, तो सत्ता बदलने की संभावना कमजोर होती जाएगी। लोकतंत्र का असली सौंदर्य बदलाव की संभावना में ही तो है।
एक आम आदमी की नजर से देखिए। वह दुकानदार हो, शिक्षक हो या कोई छोटा कर्मचारी। उसके लिए चुनाव अब भी उम्मीद का त्योहार होता है। वह सोचता है कि शायद इस बार कुछ बदलेगा। मगर जब उसके सामने यह तस्वीर आती है कि हजारों करोड़ का खेल पर्दे के पीछे चलता है, तो उसकी उम्मीद में कहीं न कहीं थकान उतर आती है। उसे लगता है कि उसका एक वोट उस धनबल के मुकाबले कितना कमजोर है।
यह भी उतना ही सच है कि केवल सत्ता पक्ष को दोष देना आधा सच होगा। विपक्ष को भी यह आत्ममंथन करना होगा कि वह जनता से वह भरोसा क्यों नहीं बना पा रहा, जो बड़े दानदाताओं को आकर्षित करे। क्या केवल सत्ता की वजह से पैसा जाता है, या भरोसे की राजनीति की भी हिस्सेदारी होती है। यह सवाल विपक्ष के लिए उतना ही जरूरी है, जितना सत्ता के लिए पारदर्शिता।
ट्रस्ट प्रणाली को लेकर एक बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि यह कानूनी है, इसलिए इस पर सवाल क्यों। कानून का होना हमेशा नैतिक होने की गारंटी नहीं देता। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है जब जो कुछ कानूनी था, वह समाज के लिए न्यायपूर्ण नहीं था। इलेक्टोरल बॉन्ड भी तब पूरी तरह कानूनी थे, फिर भी उन्हें असंवैधानिक ठहराया गया। मतलब साफ है कि कानून और न्याय के बीच फर्क को समझना जरूरी है।
ट्रस्ट के जरिए दान देने में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि दानदाता का नाम सार्वजनिक नहीं होता। आम नागरिक यह तो जान लेता है कि किस पार्टी को कितना मिला, मगर यह नहीं जान पाता कि किस कंपनी ने क्यों दिया। नीयत का सवाल यहीं से शुरू होता है। क्या यह दान नीतियों के बदले में होता है। क्या यह किसी भविष्य के फायदे की उम्मीद में दिया जाता है। इन सवालों के जवाब जब अंधेरे में रहते हैं, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं।
एक छोटा-सा उदाहरण सोचिए। अगर कोई छात्र बिना नाम बताए शिक्षक को उपहार दे और फिर परीक्षा में अचानक उसके नंबर बढ़ जाएं, तो शिक्षक कुछ भी कहे, शक पैदा होगा ही। यही शक राजनीति में भी पैदा होता है। जब भारी-भरकम रकम गुप्त रास्तों से आती है और बाद में नीतियों में कॉर्पोरेट हितों की झलक दिखती है, तो जनता का भरोसा डगमगाता है।
यहां समर्थक यह भी कहते हैं कि सभी दलों को मौका है, ट्रस्ट सभी के लिए खुले हैं। यह बात कागज पर सही हो सकती है, हकीकत में नहीं। सत्ता के आकर्षण का गुरुत्व अलग होता है। जो सत्ता में होता है, उसी के चारों ओर संसाधनों का चक्कर तेज हो जाता है। यह एक तरह का नैसर्गिक झुकाव है, जहां पैसा उस ओर जाता है, जहां उसे सबसे ज्यादा सुरक्षा और फायदा दिखाई देता है।
चुनाव आयोग की वेबसाइट पर दर्ज 2024–25 के आंकड़े इस कहानी को ठोस शक्ल देते हैं। इन रिपोर्टों के मुताबिक, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को इस साल ट्रस्टों से करीब नौ सौ उनसठ करोड़ रुपये का चंदा मिला है। इसमें सबसे बड़ा योगदान टाटा समूह से जुड़े प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट का रहा, जिसने अपने कुल नौ सौ पंद्रह करोड़ रुपये के दान का लगभग तिरासी प्रतिशत हिस्सा अकेले भाजपा को दे दिया। यही वह मोड़ है, जहां सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं रह जाता, बल्कि उस नीयत का बन जाता है जो इन आंकड़ों के पीछे खड़ी है।
सोचने वाली बात यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने बॉन्ड्स को असंवैधानिक ठहराया, तो इतनी जल्दी ट्रस्ट वाला रास्ता कैसे इतना मजबूत हो गया। क्या कॉर्पोरेट जगत पहले से इसके लिए तैयार बैठा था, या सत्ता से निकटता की लय इतनी गहरी हो चुकी है कि ज़रूरत पड़ते ही नया रास्ता अपने आप बन जाता है।
कांग्रेस की हालत इस तस्वीर में अलग दिखती है। उसे 2024–25 में ट्रस्टों के जरिए करीब तीन सौ तेरह करोड़ रुपये मिले हैं। कुल आय पांच सौ सत्रह करोड़ रुपये के आसपास रही। यह रकम पिछले साल बॉन्ड्स के दौर के मुकाबले काफी कम है, लेकिन गैर-चुनावी सालों के आंकड़ों से ज़्यादा भी है। यानी विपक्ष के लिए यह न तो पूरी हार है, न कोई बड़ी जीत। यह एक अजीब सी बीच की ज़मीन है, जहां संसाधन हैं, मगर बराबरी नहीं।
अन्य दलों की तस्वीर और भी साफ़ इशारा करती है। तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल, भारत राष्ट्र समिति जैसे दलों को ट्रस्ट के रास्ते जो पैसा मिला, वह बॉन्ड्स के दौर के मुकाबले बहुत कम है। यह फर्क सिर्फ पैसे का नहीं, असर का भी है। चंदा कम होता है तो प्रचार सीमित होता है, संगठन पर दबाव बढ़ता है, और सियासी ताक़त अंततः सिकुड़ने लगती है।
यहां एक दिलचस्प बात यह भी है कि प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट की पूरी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है। यही वह ट्रस्ट है, जिसके ज़रिए पिछले साल सबसे ज़्यादा चंदा बांटा गया था और जिसमें भाजपा सबसे बड़ी लाभार्थी थी। अगर इस साल के आंकड़े भी उसी राह पर निकले, तो नौ सौ उनसठ करोड़ का यह अंक बहुत छोटा लगने लगेगा। असली तस्वीर शायद इससे कहीं बड़ी है।
पर क्या लोकतंत्र को भी इसी झुकाव के सहारे छोड़ देना चाहिए। अगर ऐसा हुआ, तो धीरे-धीरे चुनाव विचारों की जगह निवेश का मुकाबला बन जाएगा। पोस्टर कम, पैकेज ज्यादा; भाषण कम, प्रचार ज्यादा। और फिर नेता नहीं, ब्रांड चुने जाएंगे। यह तस्वीर जितनी आधुनिक लगती है, उतनी ही खतरनाक भी है।
कांग्रेस को मिले सीमित चंदे की कहानी भी इसी तस्वीर का हिस्सा है। गैर-सत्ता दलों के लिए संसाधन जुटाना हमेशा कठिन रहा है। मगर बॉन्ड के दौर में भी कांग्रेस को एक समय बड़ा हिस्सा मिला था। अब ट्रस्ट के युग में वह हिस्सा घट गया है। इसका अर्थ केवल यह नहीं कि सत्ता का पलड़ा भारी है, इसका यह भी संकेत है कि कॉर्पोरेट भरोसा किस दिशा में झुका हुआ है।
क्षेत्रीय दलों की स्थिति और भी जटिल है। कुछ को ठीक-ठाक हिस्सा मिला, कुछ लगभग हाशिये पर चले गए। जिन राज्यों में वे सत्ता में हैं, वहां उन्हें थोड़ा सहारा मिला। जहां वे विपक्ष में हैं, वहां फंडिंग लगभग सूखती दिखी। यह पैटर्न बताता है कि धन और सत्ता का रिश्ता अब राष्ट्रीय नहीं, बल्कि सत्ता-केन्द्रित हो गया है। जहां सत्ता, वहां संसाधन।
टाटा समूह के योगदान पर अलग से बात करना जरूरी है। यह देश का बड़ा औद्योगिक नाम है, जिसकी सामाजिक छवि मजबूत रही है। जब उसका नियंत्रित ट्रस्ट किसी एक पार्टी को इतनी बड़ी राशि देता है, तो यह केवल आर्थिक फैसला नहीं रहता। यह एक सिग्नल बन जाता है। समर्थक इसे भरोसा कहते हैं, आलोचक झुकाव कहते हैं। सच शायद इन दोनों के बीच कहीं ठहरता है।
अब सवाल यह उठता है कि समाधान क्या है। क्या ट्रस्ट प्रणाली भी बंद कर दी जाए। क्या चंदा पूरी तरह राज्य के हाथ में दे दिया जाए। क्या पार्टियों को केवल सदस्यता और सार्वजनिक अनुदान पर चलने को मजबूर किया जाए। दुनिया के कई देशों में ऐसे मॉडल हैं। कुछ बेहतर हैं, कुछ असफल। मतलब यह नहीं कि एक ही जवाब सबके लिए सही है, मगर इतना तय है कि मौजूदा व्यवस्था लोकतांत्रिक भरोसे को चोट पहुंचा रही है।
एक और पहलू जिस पर कम बात होती है, वह मीडिया और जनता की जिम्मेदारी है। जब चंदे के ये आंकड़े सामने आते हैं, तो कुछ दिन बहस होती है, फिर सब सामान्य हो जाता है। सवाल यह है कि क्या हम इन खबरों को सिर्फ सनसनी की तरह देखते हैं या किसी बड़े सुधार की मांग की तरह भी। लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता, नागरिकों की चेतना से भी चलता है।
यह भी सच है कि राजनीति में शुद्धता की उम्मीद करना आदर्शवाद जैसा लगता है। पर आदर्श ही तो दिशाएं तय करते हैं। अगर हम यह मान लें कि पैसा हमेशा सत्ता खरीदेगा, तो सुधार की गुंजाइश ही खत्म हो जाएगी। इतिहास बताता है कि सुधार हमेशा असंभव लगने वाले दौर में ही शुरू होते हैं।
आज की तारीख में तस्वीर यही है कि बॉन्ड गए, ट्रस्ट आए। नाम बदले, आदत नहीं। पारदर्शिता का सपना अधूरा रह गया। पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। हर आंकड़ा, हर खुलासा, हर सवाल उस अधूरी कहानी को आगे बढ़ाता है। यही सवाल धीरे-धीरे व्यवस्था पर दबाव बनाते हैं।
एक संपादकीय के रूप में हमारा काम किसी को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि आईना दिखाना है। सत्ता को भी, विपक्ष को भी, कॉर्पोरेट जगत को भी और खुद हमें भी। क्या हम उस लोकतंत्र को चाहते हैं, जहां चुनाव विचारों से जीते जाएं। या हम उस लोकतंत्र को स्वीकार करने लगे हैं, जहां निवेश सबसे बड़ा प्रचारक हो।
शायद इसका जवाब आसान नहीं है। मगर इतना जरूर है कि जब तक चंदे का रास्ता पूरी तरह उजाला नहीं होता, तब तक लोकतंत्र पर संदेह की हल्की-हल्की परछाईं बनी रहेगी। और लोकतंत्र सिर्फ वोट का नाम नहीं, भरोसे का भी नाम है। अगर भरोसा कमजोर पड़ा, तो बाकी सब मजबूत होकर भी अधूरा रह जाएगा।






