
खड़े होकर क्यों नहीं पीना चाहिए पानी, सेहत पर क्या असर पड़ता है।

पानी पीना जीवन की मूल आवश्यकता है, लेकिन पानी कैसे पानी पिया जाए यह सवाल सदियों से चर्चा में रहा है। भारतीय परंपराओं में बैठकर पानी पीने की सलाह दी जाती है, जबकि खड़े होकर पानी पीने को हानिकारक माना जाता है। क्या यह केवल आस्था है या इसके पीछे कोई तर्क भी है? चलिए आज हम आपको बताते हैं।
क्या है परंपरागत मान्यता
आयुर्वेद और योग परंपरा में बैठकर पानी पीने को श्रेष्ठ माना गया है। मान्यता है कि बैठकर पानी पीने से शरीर में “प्राण ऊर्जा” संतुलित रहती है और पाचन बेहतर होता है। खड़े होकर पानी पीने से जल सीधे नीचे की ओर तेज़ी से जाता है, जिससे शरीर उसे ठीक से अवशोषित नहीं कर पाता—ऐसा कहा जाता है।
क्या कहता है विज्ञान?
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, स्वस्थ व्यक्ति के लिए खड़े होकर पानी पीना अपने आप में हानिकारक नहीं है। पाचन तंत्र तरल पदार्थों को दोनों ही स्थितियों में संभाल सकता है।
तेज़ी से पानी पीना
खड़े होकर लोग अक्सर जल्दी-जल्दी पानी पीते हैं, जिससे हवा भी निगल ली जाती है। इससे गैस, पेट में भारीपन या असहजता हो सकती है।
रिफ्लक्स की संभावना
जिन लोगों को एसिड रिफ्लक्स या हार्टबर्न की समस्या है, उनके लिए बैठकर या शांत अवस्था में पानी पीना ज़्यादा आरामदेह हो सकता है।
सावधानी और जागरूकता
बैठकर पानी पीने से व्यक्ति स्वाभाविक रूप से धीमा होता है, जिससे घूंट-घूंट पीना संभव होता है—यह आदत लाभकारी मानी जाती है।
जोड़ों को नुकसान होना
लोकप्रिय दावों में कहा जाता है कि खड़े होकर पानी पीने से गुर्दों या जोड़ों पर नकारात्मक असर पड़ता है। इस दावे का ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। गुर्दे रक्त को फ़िल्टर करते हैं, पानी पीने की मुद्रा सीधे तौर पर उनके काम को नुकसान नहीं पहुंचाती।
निष्कर्ष
खड़े होकर पानी पीना तुरंत कोई नुकसान नहीं पहुंचाता, लेकिन बैठकर, आराम से और ध्यानपूर्वक पानी पीना एक बेहतर आदत मानी जा सकती है। यह आदत न केवल परंपरा से जुड़ी है, बल्कि रोज़मर्रा की जल्दबाज़ी में हमें ठहराव भी देती है। जो अपने आप में स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।






