तमिलनाडु की सियासत में बड़ा उलटफेर दिखाई दे रहा है। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी TVK सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन अभी भी बहुमत से कुछ सीट दूर है। कांग्रेस ने शर्तों के साथ समर्थन दिया है, जबकि AIADMK और दूसरी पार्टियों की भूमिका पर सस्पेंस बना हुआ है। सवाल सिर्फ सरकार गठन का नहीं, बल्कि तमिलनाडु की दशकों पुरानी द्रविड़ राजनीति के बदलते समीकरण का भी है।
📍Chennai 📰 6 May 2026 ✍️ Asif Khan
तमिलनाडु की सियासत लंबे अरसे से दो बड़े द्रविड़ दलों, DMK और AIADMK, के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन 2026 के चुनाव नतीजों ने इस पुराने सियासी ढांचे को जोरदार झटका दिया है। फिल्म स्टार विजय की पार्टी तमिझगा वेत्री कषगम यानी TVK पहली बार चुनाव मैदान में उतरी और सीधे सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई। यह नतीजा सिर्फ एक चुनावी सरप्राइज नहीं, बल्कि तमिलनाडु की बदलती पब्लिक साइकोलॉजी का संकेत भी माना जा रहा है।
हालांकि TVK बहुमत के आंकड़े से अभी भी पीछे है। 234 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 118 सीट जरूरी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक TVK करीब 108 सीटों तक पहुंची है। कांग्रेस के समर्थन के बाद आंकड़ा बढ़ा, लेकिन फिर भी पार्टी को बहुमत से कुछ सीट कम बताया जा रहा है। अलग-अलग रिपोर्ट्स में यह कमी पांच से छह सीट तक बताई गई है। यही वजह है कि सरकार गठन को लेकर अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं मानी जा रही।
तमिलनाडु कांग्रेस ने विजय को समर्थन देने का फैसला किया। यह फैसला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि कांग्रेस लंबे समय से DMK के साथ खड़ी रही थी। इस बार कांग्रेस ने साफ संकेत दिया कि उसका मकसद “सांप्रदायिक ताकतों” को सत्ता से दूर रखना है। इसी लाइन पर उसने TVK को समर्थन देने की बात कही।
यहीं से राजनीतिक बहस और तेज हो गई। DMK समर्थक इसे राजनीतिक अवसरवाद बता रहे हैं। कांग्रेस का जवाब है कि गठबंधन बदलना लोकतंत्र में सामान्य प्रक्रिया है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या कांग्रेस ने भविष्य की राजनीति को देखते हुए नया दांव खेला है।
कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि यह गठबंधन सिर्फ सरकार गठन तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि लोकसभा, राज्यसभा और स्थानीय निकाय चुनाव तक जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो तमिलनाडु की राजनीति में नई स्थायी धुरी बन सकती है।
विजय लंबे समय से तमिल सिनेमा के बड़े चेहरों में गिने जाते हैं। लेकिन तमिलनाडु की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां फिल्मी लोकप्रियता हमेशा राजनीतिक सफलता की गारंटी नहीं रही। एमजीआर और जयललिता जैसे उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन कई बड़े सितारे राजनीति में टिक नहीं पाए।
TVK की सफलता के पीछे सिर्फ स्टार इमेज नहीं, बल्कि मजबूत डिजिटल कैंपेन, सोशल मीडिया नेटवर्क और युवा वोटर कनेक्शन को भी अहम माना जा रहा है। कई रिपोर्ट्स में कहा गया कि पार्टी ने पारंपरिक मीडिया से ज्यादा सोशल मीडिया नैरेटिव पर फोकस किया। फैन क्लब को बूथ नेटवर्क में बदलने की कोशिश की गई।
युवा वोटरों में “नई राजनीति” का नैसेज भी असरदार रहा। खासकर शहरी और पहली बार वोट देने वाले युवाओं में TVK को लेकर उत्साह दिखा। लेकिन आलोचक कहते हैं कि चुनाव जीतना और स्थिर प्रशासन चलाना दो अलग चीजें हैं।
इस चुनाव में एक बड़ा फैक्टर एंटी-इनकंबेंसी भी माना जा रहा है। कई सीटों पर सत्ता विरोधी माहौल की चर्चा रही। कुछ TVK नेताओं ने खुलकर कहा कि जनता बदलाव चाहती थी।
लेकिन यहां एक दूसरा पहलू भी है। TVK को मिला जनादेश पूरी तरह निर्णायक नहीं कहा जा सकता क्योंकि पार्टी अभी बहुमत से दूर है। इसका मतलब यह भी निकाला जा रहा है कि जनता बदलाव चाहती थी, लेकिन पूरी तरह एकतरफा सत्ता नहीं देना चाहती थी।
यही वजह है कि अब पोस्ट-पोल राजनीति सबसे अहम बन गई है।
तमिलनाडु की सियासत में अब नजर AIADMK पर भी है। कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया कि पार्टी के भीतर TVK को समर्थन देने को लेकर चर्चा हुई। हालांकि अभी तक स्पष्ट समर्थन सामने नहीं आया।
अगर AIADMK किसी रूप में समर्थन देती है तो तमिलनाडु की राजनीति में एक नया समीकरण बन सकता है। लेकिन यह फैसला पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। क्योंकि विजय की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता AIADMK के पारंपरिक वोट बैंक पर भी असर डाल सकती है।
विजय ने राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया। लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्यपाल ने पूर्ण बहुमत के समर्थन पत्र लाने को कहा। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में 112 विधायकों के हस्ताक्षर जमा करने की बात कही गई, जबकि बहुमत के लिए 118 जरूरी बताए गए।
यानी संवैधानिक प्रक्रिया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। आने वाले कुछ दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं।
DMK लंबे समय से तमिलनाडु की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकतों में रही है। लेकिन इस चुनाव में पार्टी सत्ता से बाहर जाती दिख रही है। कांग्रेस का साथ छोड़ना उसके लिए राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दोनों तरह का झटका माना जा रहा है।
हालांकि DMK अभी भी मजबूत संगठन और कैडर वाली पार्टी है। इसलिए यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि उसकी राजनीति खत्म हो गई। लेकिन इतना साफ है कि तमिलनाडु की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहने वाली।
कांग्रेस और कुछ विपक्षी नेताओं ने दावा किया कि उनका मकसद BJP को तमिलनाडु की सत्ता से दूर रखना है।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि दक्षिण भारत की राजनीति में BJP की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है और तमिलनाडु में भी वैचारिक बहस बदल रही है। ऐसे में “BJP विरोध” को ही स्थायी रणनीति मानना भविष्य में कारगर रहेगा या नहीं, यह अलग सवाल है।
अगर विजय सरकार बनाने में सफल होते हैं तो असली परीक्षा उसके बाद शुरू होगी। अब तक उनकी राजनीति मुख्य रूप से बदलाव, युवा ऊर्जा और एंटी-एस्टेब्लिशमेंट नैरेटिव पर आधारित रही है। लेकिन सत्ता में आने के बाद रोजगार, उद्योग, कल्याण योजनाएं, प्रशासनिक अनुभव और गठबंधन प्रबंधन जैसे मुद्दे सामने आएंगे।
उनकी पार्टी नई है। ज्यादातर विधायक पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं। ऐसे में स्थिर शासन देना आसान नहीं माना जा रहा।
तमिलनाडु में अगले कुछ दिन बेहद निर्णायक रहेंगे। कांग्रेस समर्थन के बावजूद TVK को बहुमत का स्पष्ट आंकड़ा जुटाना होगा। AIADMK, छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका अचानक अहम हो गई है।
अगर विजय सरकार बना लेते हैं तो यह तमिल राजनीति के लिए ऐतिहासिक मोड़ होगा। लेकिन अगर बहुमत साबित नहीं हो पाया तो राज्य में नई राजनीतिक अनिश्चितता भी पैदा हो सकती है। कुछ विश्लेषक दोबारा चुनाव या अस्थायी संवैधानिक संकट की संभावना से भी इनकार नहीं कर रहे।
तमिलनाडु की जनता ने इस चुनाव में साफ संकेत दिया है कि वह नई राजनीति सुनने को तैयार है। लेकिन क्या वह नई राजनीति को लंबे समय तक सत्ता भी देगी, इसका जवाब अभी बाकी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।