
क्या ईरान पर हमला आसान जीत होगा या लंबी लड़ाई?
ट्रंप बनाम सैन्य सलाह: टकराव की असली कीमत
ईरान क्यों झुकने से कर रहा है इंकार?
अमेरिका और ईरान के दरमियान बढ़ता तनाव सिर्फ दो मुल्कों की रस्साकशी नहीं है। यह उस सवाल का इम्तिहान है कि ताकत का इस्तेमाल कब और कैसे किया जाए। डोनाल्ड ट्रंप के तेवर सख्त हैं, जबकि अमेरिकी सैन्य नेतृत्व संभावित लंबे और जटिल संघर्ष की चेतावनी दे रहा है। उधर ईरान दबाव में झुकने के बजाय प्रतिरोध को अपनी सुरक्षा का आधार मान रहा है। यह संपादकीय इसी टकराव के राजनीतिक, सैन्य और नैतिक पहलुओं को परखता है और आसान जीत के दावों को तर्क की कसौटी पर रखता है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
जंग की ज़बान और सियासत की हकीकत
डोनाल्ड ट्रंप का अंदाज़ हमेशा से मुखर रहा है। जब वह कहते हैं कि अगर जंग हुई तो जीत आसान होगी, तो यह बयान सिर्फ सैन्य आकलन नहीं, बल्कि सियासी संदेश भी होता है। सवाल यह है कि क्या जंग कभी आसान होती है। कागज पर रणनीति बनाना और मैदान में हालात झेलना दो अलग बातें हैं।
अमेरिकी आर्मी के आला अफसरों ने जिन खतरों की तरफ इशारा किया, वह महज डर फैलाना नहीं था। किसी भी बड़े सैन्य अभियान में लॉजिस्टिक्स, सहयोगी देशों का समर्थन, हथियारों की उपलब्धता और सैनिकों की सुरक्षा जैसे मसले अहम होते हैं। अगर जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन ने लंबी और जटिल लड़ाई की आशंका जताई, तो उसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होना चाहिए।
यहां एक बुनियादी सवाल उठता है। क्या राजनीतिक नेतृत्व को सैन्य सलाह पर पूरी तरह चलना चाहिए, या अंतिम फैसला निर्वाचित प्रतिनिधि का होना चाहिए। जम्हूरियत में अंतिम फैसला सियासी होता है, लेकिन समझदारी यह है कि वह पेशेवर सलाह की बुनियाद पर लिया जाए।
ईरान का नजरिया: दबाव या दखल
ईरान के लिए अमेरिकी शर्तें महज नीति परिवर्तन नहीं हैं। यूरेनियम संवर्धन रोकना, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम सीमित करना और क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों से दूरी बनाना, यह सब उसकी सुरक्षा संरचना का हिस्सा है। तेहरान इसे आत्मसमर्पण जैसा मानता है।
अगर कोई देश दशकों से प्रतिबंध झेलते हुए एक प्रतिरोधक ढांचा खड़ा करता है, तो वह उसे एक झटके में छोड़ने को तैयार क्यों होगा। ईरानी नेतृत्व की नजर में यह सिर्फ हथियारों का सवाल नहीं, बल्कि संप्रभुता और इज्जत का मसला है।
हम अक्सर सोचते हैं कि आर्थिक दबाव से कोई भी सरकार झुक जाएगी। लेकिन इतिहास बताता है कि कई बार दबाव उल्टा असर करता है। लोग कठिन हालात में अपनी सरकार के पीछे भी खड़े हो जाते हैं, खासकर जब बाहरी खतरे का एहसास कराया जाए।
आसान जीत का दावा कितना ठोस
ट्रंप का यह कहना कि अमेरिका आसानी से जीत जाएगा, आत्मविश्वास का संकेत हो सकता है। अमेरिका की सैन्य ताकत निर्विवाद है। विमानवाहक पोत, उन्नत फाइटर जेट और तकनीकी बढ़त किसी से छिपी नहीं।
लेकिन जंग सिर्फ हथियारों से नहीं जीती जाती। इराक और अफगानिस्तान के अनुभव सामने हैं। शुरुआती सैन्य सफलता के बाद भी स्थिरता हासिल करना कठिन रहा। अगर ईरान के खिलाफ अभियान शुरू होता है और वह क्षेत्रीय नेटवर्क को सक्रिय करता है, तो संघर्ष सीमाओं से बाहर फैल सकता है।
युद्ध की शुरुआत अक्सर स्पष्ट होती है, उसका अंत नहीं। कोई भी गलत आकलन स्थिति को बेकाबू कर सकता है। अगर तेल आपूर्ति बाधित हुई या क्षेत्रीय ठिकानों पर जवाबी हमले हुए, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।
ईरान की आंतरिक राजनीति और जोखिम
ईरान के सर्वोच्च नेता के सामने विकल्प आसान नहीं हैं। अगर वह अमेरिकी मांगें मान लेते हैं, तो घरेलू सियासत में उनकी साख पर सवाल उठ सकते हैं। अगर वह टकराव चुनते हैं, तो सैन्य और आर्थिक जोखिम बढ़ेंगे।
हाल के वर्षों में वहां आंतरिक असंतोष देखा गया है। आर्थिक मुश्किलें, महंगाई और बेरोजगारी ने आम लोगों को प्रभावित किया है। ऐसे में जंग की स्थिति सत्ता संतुलन को और जटिल बना सकती है।
यह भी मुमकिन है कि बाहरी हमला घरेलू असंतोष को कुछ समय के लिए दबा दे। लेकिन लंबी जंग अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर सकती है। लोगों का गुस्सा दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता।
अमेरिका के लिए दांव
अमेरिका के सामने भी जोखिम कम नहीं। अगर हमला सीमित रहा तो शायद राजनीतिक लाभ मिले। लेकिन अगर संघर्ष लंबा चला और हताहत बढ़े, तो घरेलू समर्थन कम हो सकता है।
सैन्य संसाधन अनंत नहीं होते। सहयोगी देशों का रुख भी अहम है। अगर समर्थन आधा अधूरा रहा, तो अभियान की लागत बढ़ेगी।
यह भी ध्यान रखना होगा कि सत्ता परिवर्तन हमेशा स्थिरता नहीं लाता। अगर ईरान में केंद्रीय सत्ता कमजोर होती है, तो शक्ति का शून्य कट्टर गुटों को मजबूत कर सकता है। इससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है।
कूटनीति की गुंजाइश
कई रिपोर्टों में यह संकेत मिला कि कुछ सलाहकारों ने पहले कूटनीति को मौका देने की बात कही। यह रुख व्यावहारिक लगता है। जंग आखिरी विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।
अगर बातचीत के जरिए सीमित समझौता हो सकता है, जिसमें दोनों पक्ष कुछ रियायत दें, तो शायद टकराव टाला जा सकता है। सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष अपने अधिकतम लक्ष्यों से थोड़ा पीछे हटने को तैयार हैं।
अक्सर नेता सार्वजनिक रूप से सख्त रुख अपनाते हैं, ताकि बातचीत में बेहतर स्थिति हासिल कर सकें। लेकिन यह रणनीति जोखिम भरी होती है। अगर बयानबाजी बहुत आगे बढ़ जाए, तो पीछे हटना राजनीतिक रूप से कठिन हो जाता है।
ताकत और तर्क के दरमियान
यह टकराव सिर्फ सैन्य नहीं, वैचारिक भी है। एक पक्ष कहता है कि दबाव से बदलाव होगा। दूसरा कहता है कि दबाव प्रतिरोध को मजबूत करेगा। सच शायद बीच में कहीं है।
जंग का फैसला भावनाओं से नहीं, ठंडे दिमाग से होना चाहिए। आसान जीत के दावे आकर्षक लगते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर ज्यादा पेचीदा होती है।
अगर समझदारी हावी रही तो शायद बातचीत का रास्ता खुले। अगर अहंकार हावी हुआ तो क्षेत्र एक और लंबे संघर्ष की तरफ बढ़ सकता है।
इतिहास गवाह है कि जंग शुरू करना आसान है, खत्म करना मुश्किल। इसलिए असली ताकत सिर्फ सैन्य क्षमता में नहीं, बल्कि सही वक्त पर सही फैसला लेने में है।




