
Strategic map showing India, Israel and Iran amid rising maritime tensions – Shah Times
ओमान तट हमला और भारत की दुविधा
समंदर में सुलगता संकट, दिल्ली के सामने सवाल
कूटनीति, तेल और छवि का त्रिकोण
ओमान के पास तेल टैंकर पर हमले और उस पर सवार भारतीय नागरिकों की मौजूदगी ने भारत को मुश्किल मोड़ पर ला खड़ा किया है। इजरायल और ईरान के दरमियान बढ़ता तनाव अब समुद्री रास्तों तक फैल चुका है। यह सिर्फ सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि तेल आपूर्ति, विदेश नीति, ब्रिक्स की राजनीति और भारत की वैश्विक छवि का भी सवाल है। ऐसे वक्त में दिल्ली का हर कदम तौला जाएगा।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
समंदर से उठता धुआं, दिल्ली तक पहुंचती आहट
ओमान के तट के पास तेल टैंकर पर हमला कोई मामूली खबर नहीं है। जहाज पर 15 भारतीय सवार थे, चार जख्मी हुए। यह सिर्फ एक समुद्री घटना नहीं, बल्कि उस बड़े टकराव की आहट है जो इजरायल और ईरान के बीच तेज हो चुका है। सवाल यह है कि क्या यह महज जवाबी कार्रवाई का सिलसिला है, या एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष की शुरुआत।
हम अक्सर सोचते हैं कि दूर कहीं जंग हो रही है तो उसका असर हम पर सीमित होगा। लेकिन समंदर की लहरें सीमाएं नहीं मानतीं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाला तेल भारत की अर्थव्यवस्था की धड़कन है। अगर वही रास्ता असुरक्षित हो जाए तो पेट्रोल पंप पर खड़े आम आदमी की जेब तक असर पहुंचता है।
यहां हमें ठहरकर सोचना चाहिए। क्या भारत सिर्फ दर्शक बना रह सकता है। या फिर उसे अपनी भूमिका नए सिरे से तय करनी होगी।
कूटनीति की रस्सी पर संतुलन
भारत के इजरायल से रणनीतिक रिश्ते मजबूत हुए हैं। रक्षा सहयोग, तकनीक, कृषि नवाचार, सबमें बढ़त दिखी है। प्रधानमंत्री का हालिया दौरा और संसद में दिया गया बयान इस नजदीकी को साफ करता है। दूसरी तरफ ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध, चाबहार बंदरगाह, ऊर्जा और क्षेत्रीय संपर्क की अहमियत भी कम नहीं है।
अब असली कसौटी यह है कि क्या दोनों के बीच संतुलन संभव है। कुछ लोग कहते हैं कि दुनिया बदल रही है, इसलिए स्पष्ट पक्ष लेना ही बेहतर है। लेकिन क्या अंतरराष्ट्रीय सियासत इतनी सीधी रेखा में चलती है। अगर भारत खुलकर एक तरफ जाता है तो दूसरी तरफ के दरवाजे बंद होने का खतरा रहेगा।
यहां एक आम उदाहरण समझिए। अगर आप दो पुराने दोस्तों के बीच झगड़े में खुलकर एक का साथ देते हैं, तो दूसरे से रिश्ता कमजोर पड़ता है। राष्ट्रों की राजनीति में भी भावनाएं नहीं, हित चलते हैं।
तेल की हकीकत और बाजार का डर
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से लाता है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाला तेल लगभग आधी आपूर्ति को प्रभावित करता है। अगर वहां खतरा बढ़ता है तो बीमा लागत, शिपिंग चार्ज और बाजार की घबराहट सब कीमतें ऊपर धकेल देते हैं।
कहा जा रहा है कि भारत सीधे ईरान से तेल नहीं ले रहा। लेकिन रास्ता वही है। अगर रास्ता असुरक्षित हो जाए तो फर्क पड़ता है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि वैकल्पिक रूट जैसे रेड सी भी जोखिम में आ सकते हैं। ऐसे में महंगाई, चालू खाता घाटा और रुपया सब दबाव में आ सकते हैं।
लेकिन यहां एक और पहलू है। क्या भारत ने ऊर्जा स्रोतों में पर्याप्त विविधता लाई है। रूस से आयात बढ़ाना एक कदम था। नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर भी दिया जा रहा है। फिर भी सच्चाई यह है कि तेल अभी भी अर्थव्यवस्था की नसों में बहता है।
ब्रिक्स और वैश्विक छवि का सवाल
भारत खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज बताता है। ब्रिक्स की अध्यक्षता भी इस समय भारत के पास है। ईरान अब इस समूह का सदस्य है। ऐसे में अगर इजरायल और ईरान के टकराव पर भारत की प्रतिक्रिया अस्पष्ट रहती है, तो क्या उसकी विश्वसनीयता पर असर होगा।
कुछ लोग कहते हैं कि तटस्थ रहना ही समझदारी है। लेकिन तटस्थता भी एक तरह का संदेश होती है। अगर भारत हमले की निंदा नहीं करता, तो सवाल उठेंगे। अगर करता है, तो रणनीतिक साझेदारी पर असर पड़ सकता है।
यह वही दुविधा है जिसमें कई उभरती ताकतें फंसती हैं। एक तरफ पश्चिमी सहयोग, दूसरी तरफ क्षेत्रीय संतुलन।
सुरक्षा और नागरिकों की जिम्मेदारी
तेल टैंकर पर मौजूद भारतीयों का जख्मी होना एक चेतावनी है। विदेशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा भारत की प्राथमिक जिम्मेदारी है। एडवाइजरी जारी करना जरूरी है, लेकिन क्या उससे ज्यादा सक्रिय कूटनीतिक पहल की जरूरत नहीं।
अगर तनाव लंबा खिंचता है तो निकासी अभियान, बीमा, समुद्री सुरक्षा सब पर अतिरिक्त बोझ आएगा। भारत ने पहले भी युद्धग्रस्त क्षेत्रों से अपने नागरिकों को निकाला है। लेकिन हर बार हालात अलग होते हैं।
अमेरिका का साया और रणनीतिक स्वायत्तता
यह मानना होगा कि इस पूरे समीकरण में अमेरिका की भूमिका सीमित है। इजरायल के साथ उसका गहरा रिश्ता है। भारत के साथ भी सामरिक सहयोग बढ़ा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत की विदेश नीति पूरी तरह स्वतंत्र है या दबावों से प्रभावित।
रणनीतिक स्वायत्तता सिर्फ बयान से नहीं, फैसलों से दिखती है। अगर भारत हर मोर्चे पर एक ही खेमे के करीब दिखे, तो उसकी स्वतंत्र छवि कमजोर हो सकती है।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि वैश्विक राजनीति में साझेदारियां जरूरी हैं। अकेले खड़े रहना विकल्प नहीं।
क्या भारत मध्यस्थ बन सकता है
कुछ लोगों को उम्मीद है कि भारत मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। लेकिन क्या दोनों पक्ष उसे स्वीकार करेंगे। मध्यस्थ वही बनता है जिस पर दोनों का भरोसा हो। अभी हालिया घटनाओं के बाद यह भरोसा किस स्तर पर है, यह स्पष्ट नहीं।
शायद भारत की प्राथमिकता फिलहाल अपने हितों की रक्षा करना ही होगी। यानी ऊर्जा सुरक्षा, नागरिकों की सलामती और क्षेत्रीय स्थिरता।
आगे का रास्ता
यह संकट लंबा खिंच सकता है। अगर संघर्ष सीमित रहता है तो बाजार संभल जाएंगे। लेकिन अगर समुद्री रास्ते बार-बार निशाना बनते हैं तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला हिल जाएगी।
भारत के लिए जरूरी है कि वह भावनाओं से नहीं, ठोस गणित से फैसले करे। संतुलित बयान, शांत कूटनीति और ऊर्जा विविधीकरण ही आगे का रास्ता दिखा सकते हैं।
आखिर में सवाल यही है। क्या भारत इस संकट को अवसर में बदल सकता है। या फिर यह उसकी वैश्विक भूमिका की परीक्षा बन जाएगा। जवाब अभी धुंध में है। लेकिन इतना साफ है कि समंदर में उठी यह लहर दिल्ली की नीति को लंबे समय तक प्रभावित करेगी।





