
“नो व्हीकल डे” से हाईकोर्ट ने दिया बड़ा पर्यावरण संदेश
पेट्रोल बचाओ अभियान में पैदल पहुंचे चीफ जस्टिस और जज
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ईंधन संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता को लेकर “नो व्हीकल डे” मनाया। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता समेत सभी जज, वकील और कर्मचारी पैदल कोर्ट पहुंचे। अदालत ने वर्चुअल सुनवाई को भी ईंधन बचत और पब्लिक सुविधा से जोड़ते हुए बड़ा संदेश दिया।
📍 Nainital
📰 15 May 2026
✍️ Afjal Hussain Fauji
हाईकोर्ट परिसर से निकला ईंधन बचत का बड़ा संदेश
Uttarakhand High Court में शुक्रवार को एक अलग तरह का माहौल देखने को मिला। अदालत परिसर में गाड़ियों की लंबी कतारों की जगह पैदल चलते जज, अधिवक्ता और कर्मचारी दिखाई दिए। “नो व्हीकल डे” के जरिए न्यायपालिका ने केवल एक सांकेतिक कार्यक्रम नहीं किया, बल्कि ईंधन संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक संदेश देने की कोशिश की।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता स्वयं पैदल अदालत पहुंचे। उनके साथ कई वरिष्ठ न्यायाधीश, बार एसोसिएशन के सदस्य और अदालत कर्मचारी भी बिना निजी वाहन के कोर्ट पहुंचे। इस पहल का मकसद पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने के साथ लोगों को छोटे स्तर पर बदलाव के लिए प्रेरित करना बताया गया।
देश में लगातार बढ़ती ईंधन खपत, ट्रैफिक दबाव और प्रदूषण के बीच न्यायपालिका की यह पहल प्रतीकात्मक होने के बावजूद चर्चा का विषय बन गई है। खासकर ऐसे समय में, जब बड़े शहरों से लेकर पर्वतीय इलाकों तक वायु प्रदूषण और ईंधन लागत दोनों चुनौती बनते जा रहे हैं।
न्यायपालिका ने क्यों चुना “नो व्हीकल डे”
मुख्य न्यायाधीश ने अपने संदेश में कहा कि ईंधन संरक्षण केवल सरकारी नीति का हिस्सा नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सामाजिक जिम्मेदारी बननी चाहिए। उन्होंने यह संकेत दिया कि छोटे-छोटे कदम भी सामूहिक स्तर पर बड़ा असर पैदा कर सकते हैं।
कार्यक्रम के दौरान अदालत प्रशासन ने यह भी रेखांकित किया कि वर्चुअल सुनवाई व्यवस्था का उपयोग केवल तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि ईंधन बचत और समय प्रबंधन से भी जुड़ा हुआ है। अदालत ने दूरदराज के इलाकों से आने वाले अधिवक्ताओं और वादकारियों के लिए ऑनलाइन सुनवाई को महत्वपूर्ण विकल्प बताया।
पर्वतीय राज्य होने के कारण उत्तराखंड में लंबी सड़क यात्राएं आम बात हैं। भवाली, हल्द्वानी और अन्य क्षेत्रों से रोजाना अदालत पहुंचने वाले लोगों को कई घंटे सड़क पर बिताने पड़ते हैं। ऐसे में अदालत का मानना है कि डिजिटल सुनवाई से अनावश्यक यात्रा कम हो सकती है।
केवल एक दिन का अभियान या लंबी सोच?
इस कार्यक्रम को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या “नो व्हीकल डे” जैसी पहलें केवल प्रतीकात्मक रहती हैं या उनका व्यवहारिक असर भी पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एक दिन पैदल चलना सीधे तौर पर ईंधन संकट हल नहीं कर सकता, लेकिन सार्वजनिक संस्थाओं का व्यवहार समाज में संदेश जरूर भेजता है।
जब न्यायपालिका, प्रशासन या बड़े संस्थान खुद उदाहरण पेश करते हैं, तो उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव अधिक होता है। अदालत जैसी संस्था का इस तरह सार्वजनिक रूप से भाग लेना लोगों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि रोजमर्रा की आदतों में छोटे बदलाव संभव हैं।
हालांकि कुछ लोग इसे केवल “इवेंट आधारित एक्टिविज्म” भी मानते हैं। उनका तर्क है कि अगर सरकारी सिस्टम को वास्तव में ईंधन बचत करनी है तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को बड़े स्तर पर मजबूत करना होगा।
वर्चुअल कोर्ट मॉडल पर फिर चर्चा
कोविड काल के दौरान शुरू हुई वर्चुअल कोर्ट व्यवस्था अब कई संस्थानों के लिए स्थायी मॉडल बन चुकी है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी इस मॉडल को ईंधन संरक्षण और नागरिक सुविधा से जोड़ा है।
ऑनलाइन सुनवाई से अधिवक्ताओं और वादकारियों की यात्रा कम होती है। इससे पेट्रोल और डीजल की खपत घटती है, ट्रैफिक दबाव कम होता है और समय की भी बचत होती है। पर्वतीय राज्यों में यह मॉडल और ज्यादा उपयोगी माना जा रहा है क्योंकि वहां यात्रा कई बार मौसम और सड़क स्थितियों पर निर्भर रहती है।
हालांकि डिजिटल व्यवस्था को लेकर चुनौतियां भी हैं। इंटरनेट कनेक्टिविटी, तकनीकी संसाधनों की कमी और साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दे अब भी मौजूद हैं। ग्रामीण इलाकों के कई लोगों के लिए डिजिटल सुनवाई तक पहुंच आसान नहीं है। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि हाइब्रिड मॉडल ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है।
पर्यावरण बहस के बीच अदालतों की भूमिका
देशभर में अदालतें समय-समय पर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में सख्त टिप्पणियां करती रही हैं। प्रदूषण, जंगल कटाई, नदी संरक्षण और जलवायु संकट जैसे मुद्दों पर न्यायपालिका की सक्रियता पहले भी दिखाई देती रही है।
लेकिन इस बार अदालत ने केवल निर्देश देने के बजाय खुद व्यवहारिक संदेश देने की कोशिश की। यही वजह है कि यह पहल अलग नजर आती है।
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने कहा कि केवल एक दिन नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में पैदल चलने और साइकिल उपयोग की आदत बढ़ाई जानी चाहिए। उनका बयान इस बात की तरफ इशारा करता है कि व्यक्तिगत स्तर पर बदलाव को संस्थागत समर्थन की जरूरत है।
क्या आम लोग भी बदलेंगे अपनी आदतें?
भारत में निजी वाहनों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। छोटे शहरों और पहाड़ी राज्यों में भी दोपहिया और चारपहिया वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में “कम दूरी के लिए पैदल चलना” अब व्यवहार से बाहर होता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को केवल अपील से नहीं, बल्कि सुविधाओं से जोड़ना होगा। सुरक्षित फुटपाथ, बेहतर सार्वजनिक परिवहन और साइकिल फ्रेंडली इंफ्रास्ट्रक्चर के बिना बड़े बदलाव मुश्किल हैं।
उत्तराखंड जैसे राज्यों में पर्यटन दबाव भी ईंधन खपत और ट्रैफिक का बड़ा कारण बनता है। नैनीताल जैसे शहरों में सीजन के दौरान भारी जाम और प्रदूषण आम समस्या बन चुके हैं। ऐसे में स्थानीय प्रशासन और संस्थाओं की ओर से जागरूकता अभियान महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
सामाजिक संदेश से राजनीतिक और प्रशासनिक संकेत तक
हाईकोर्ट का यह कदम केवल पर्यावरण संदेश नहीं, बल्कि प्रशासनिक सोच का संकेत भी माना जा रहा है। सरकारें लगातार “ग्रीन डेवलपमेंट” और “सस्टेनेबल मोबिलिटी” की बात कर रही हैं। ऐसे में संवैधानिक संस्थाओं की भागीदारी इन अभियानों को सार्वजनिक भरोसा देती है।
हालांकि यह भी सच है कि केवल प्रतीकात्मक कार्यक्रमों से बड़े स्तर की पर्यावरणीय चुनौतियां हल नहीं होंगी। भारत अभी भी जीवाश्म ईंधन पर काफी निर्भर है और सार्वजनिक परिवहन की स्थिति कई राज्यों में कमजोर बनी हुई है।
इसके बावजूद सामाजिक बदलाव अक्सर प्रतीकात्मक कदमों से ही शुरू होते हैं। अदालत की यह पहल कम से कम इस बहस को फिर सामने लाने में सफल दिख रही है कि ईंधन बचत केवल सरकारी नीति नहीं, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी भी है।
भविष्य में क्या हो सकता है
अगर ऐसी पहलें नियमित रूप से होती हैं, तो अन्य सरकारी संस्थान और विभाग भी इसी तरह के अभियान शुरू कर सकते हैं। स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ्तर और कॉर्पोरेट सेक्टर “नो व्हीकल डे” मॉडल को अपनाने की कोशिश कर सकते हैं।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भविष्य में अदालतों और सरकारी संस्थानों में हाइब्रिड वर्किंग और डिजिटल सुनवाई का दायरा और बढ़ सकता है। इससे केवल ईंधन ही नहीं, बल्कि समय और प्रशासनिक लागत में भी कमी आ सकती है।
हालांकि इसके लिए मजबूत डिजिटल नेटवर्क, साइबर सुरक्षा और ग्रामीण कनेक्टिविटी पर निवेश जरूरी होगा। बिना इन बुनियादी सुधारों के केवल अपील आधारित अभियान सीमित असर ही छोड़ पाएंगे।
सम्पादकीय दृष्टिकोण
उत्तराखंड हाईकोर्ट का “नो व्हीकल डे” अभियान एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम से आगे बढ़कर सामाजिक संदेश देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश से लेकर अदालत कर्मचारियों तक का पैदल कोर्ट पहुंचना यह दिखाता है कि सार्वजनिक संस्थाएं भी ईंधन संरक्षण की बहस में सक्रिय भूमिका निभाना चाहती हैं।
यह पहल सीधे तौर पर देश की ईंधन खपत नहीं बदल देगी, लेकिन इसने एक जरूरी सवाल जरूर सामने रखा है, क्या छोटे व्यक्तिगत बदलाव मिलकर बड़े पर्यावरणीय असर पैदा कर सकते हैं? आने वाले समय में इस तरह के अभियानों की निरंतरता ही तय करेगी कि यह केवल एक दिन की खबर थी या लंबे बदलाव की शुरुआत।




