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दुनिया भर में उत्तर प्रदेश बरेली के सुरमे की अपनी एक खास पहचान बनी हुई है।बरेली में हाशमी परिवार ने शुरू किया था सुरमे का कारोबार
बरेली,मो इरफान (Shah Times)। दुनिया भर में उत्तर प्रदेश बरेली के सुरमे की अपनी एक खास पहचान बनी हुई है। बरेली के सुरमे को पहचान दिलाने वाले एम हसीन हाशमी का अक्टूबर 2021 में इंतकाल हो गया। वह सुरमा कारोबार में चौथी पीढ़ी के सदस्य थे और 1971 से बरेली में सुरमा बनाने का काम कर रहे थे। अब उनके बेटे शावेज हाशमी और सोहेल हाशमी इस कारोबार को संभाल रहे हैं।
आज भी एम हाशमी सुरमा रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन और गांव देहात कस्बों में आसानी से मिल जाता है। इस सुरमे को देश के हर एक कोने-कोने तक पहुंचाने का पूरा श्रेय एम हसीन हाशमी को जाता है। वैसे तो मायानगरी मुंबई में बरेली के झुमके ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में, फिर बरेली के सुरमे ‘सुरमा बरेली वाला, अंखियों में ऐसा डाला’, जैसे गाने बन चुके हैं। इन गानों ने बरेली की दुनिया भर में एक अलग पहचान कायम कर दी है।
छोटी सी दुकान से सुरमा बेचने का काम शुरू किया
एम हसीन हाशमी ने एक छोटी सी दुकान से सुरमा बेचने का काम शुरू किया था। कड़ी मेहनत के बल पर उन्होंने अपने बरेली के सुरमे को एक बड़ा ब्रांड बना लिया है। विदेशों में भी बरेली के सुरमे की डिमांड हमेशा बनी रहती है। वहीं, अब लोग गिफ्ट में देने के लिए भी सुरमे का इस्तेमाल कर रहे हैं।
आंखों की सुंदरता को बढ़ा रहा बरेली का सुरमा
बरेली का सुरमा दुनिया भर में आंखों की चमक बढ़ाने के लिए सप्लाई किया जाता है। यहां सुरमा बनाने की शुरुआत आज से 200 साल से अधिक पहले दरगाह-ए-आला हजरत के पास नीम वाली गली में हाशमी परिवार ने की थी। बरेली में सुरमे का एक कारखाना है, जिसका संचालन हाशमी परिवार कर रहा है। बिहारीपुर में दरगाह-ए-आला हजरत वाली गली में बरेली की सबसे पुरानी सुरमे की दुकान भी इन्हीं के परिवार की है।
हीरे जवाहरात का कारोबार सुरमा में बदला
एम हसीन हाशमी के पुत्र सोहेल हाशमी बताते हैं कि आज से लगभग 200 साल से अधिक पहले उनके पिता एम हसीन हाशमी के परदादा मोहम्मद हाशम के द्वारा हीरे-जवाहरात का कारोबार किया जाता था। यह प्रतिष्ठान बरेली के बाजार में स्थित था। एक दिन उनके प्रतिष्ठान पर एक फकीर आया और उसने पहनने के लिए कुछ कपड़े और भोजन की मांग की। परिवार की तरफ से उनको कुछ कपड़े और भोजन कराया गया। जब वह फकीर जाने लगे तभी चलते-चलते अपनी झोली में से एक चमकदार पत्थर निकालकर मोहम्मद हाशमी को दिया और सुरमा बनाने की पूरी विधि बताई। साथ ही सुरमे का कारोबार करने की सलाह देते हुए कहा गया कि तुम्हारी सात पीढ़ियां तक यह कारोबार तुम्हें फर्श से अर्श तक पहुंचा देगा। इसके बाद 1794 से हाशमी परिवार के द्वारा यह सुरमा बनाने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है और आज हाशमी परिवार का सुरमा पूरी दुनिया भर में प्रसिद्ध हो चुका है।
सुरमा बनाने के लिए अरब से आता है पत्थर
हाशमी परिवार के खादिम जाहीद शम्सी बताते हैं कि सुरमा बनाने के लिए यह पत्थर सऊदी अरब से मंगाया जाता है। सऊदी अरब में एक पहाड़ी है, जिसका नाम कोहिकूर है। उसी पहाड़ी से यह पत्थर आता है। इस पत्थर को 6 महीने गुलाब जल में, 6 महीने सौंफ के पानी में डुबोकर रखा जाता है। फिर सूखने पर इसकी घिसाई की जाती है। इसके बाद इसमें घिसाई करके इसमें सोना चांदी और बादाम का अर्क मिलाकर सुरमा तैयार किया जाता है।





