
त्योहारों के दौरान IRCTC वेबसाइट डाउन होने से यात्रियों में नाराज़गी, भरोसे की परीक्षा का संपादकीय विश्लेषण — Shah Times
रेलवे का फेस्टिवल सीज़न टेस्ट: टिकट, ट्रैवल और ट्रस्ट
त्योहारों में रेल सफ़र की सच्चाई: उम्मीदें बनाम हक़ीक़त
हर साल त्योहारों का मौसम आते ही रेलयात्रा एक जज़्बात बन जाती है — घर लौटने की चाह, सिस्टम की सीमाएं और ऑनलाइन बुकिंग की मुश्किलें। इस बार फिर IRCTC वेबसाइट का डाउन होना सिर्फ तकनीकी गलती नहीं, बल्कि उस भरोसे की परीक्षा है जिसे भारतीय रेल से जोड़कर करोड़ों लोग हर दिन जीते हैं।
📍नई दिल्ली🗓️17 अक्टूबर 2025✍️ आसिफ़ ख़ान
भारत में रेल सिर्फ एक सफ़र का ज़रिया नहीं, बल्कि एक एहसास है — घर की तरफ़ लौटते लोगों की उम्मीद, दूर बसे बच्चों का बेसब्री से लौटना, और बूढ़ी माँ का स्टेशन पर खड़ा इंतज़ार। त्योहारों के मौसम में यही रेल एक जज़्बात बन जाती है। लेकिन इस बार जब IRCTC की वेबसाइट धनतेरस से एक दिन पहले अचानक ठप पड़ गई, तो सिर्फ़ एक सर्वर नहीं गिरा — लोगों का भरोसा भी थोड़ा हिल गया।
आज जब हर क्लिक पर भरोसा टिका है, रेलवे की यह तकनीकी नाकामी हमें याद दिलाती है कि डिजिटल इंडिया की सबसे बड़ी ताकत, उसकी तैयारी पर भी सवाल उठते हैं। IRCTC पर रोज़ाना 12.5 लाख टिकट बुक होते हैं — जिसमें से 84% ऑनलाइन। मगर त्योहार आते ही यह सिस्टम मानो घुटनों पर आ जाता है।
एक पल के लिए सोचिए, एक मज़दूर जो सालभर मेहनत करता है और दिवाली पर घर लौटना चाहता है, जब ‘बुक नाउ’ दबाने पर सिर्फ़ “Server Error” देखता है — तो उसकी बेबसी का वज़न किसी आंकड़े में नहीं मापा जा सकता।
रेलवे हमेशा से भारतीय समाज की धड़कन रहा है। लेकिन यह धड़कन अब डिजिटल दबावों में सांस लेने की कोशिश कर रही है। IRCTC का सर्वर डाउन होना सिर्फ़ टेक्निकल फेल्योर नहीं, बल्कि उस सामूहिक असंतोष की झलक है जो लोगों के बीच चुपचाप पनप रहा है — “कब तक इंतज़ार करें कि सिस्टम सुधरे?”
त्योहारों में ट्रेन की बुकिंग का दृश्य अपने आप में एक ड्रामा है। सुबह 10 बजे एसी कोटे की तत्काल बुकिंग खुलती है — सेकंडों में खत्म। 11 बजे नॉन-एसी खुलती है — वहां भी वही हाल। इस दौरान वेबसाइट का डाउन होना ऐसा लगता है जैसे किसी ने भीड़भरे स्टेशन पर लाइट बंद कर दी हो।
लोग सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा ज़ाहिर करते हैं, मीम्स बनाते हैं, लेकिन असल में यह हंसी दर्द छिपाने का एक तरीका है। ट्विटर पर कोई लिखता है, “IRCTC should get a Tatkal slot for its own server upgrade.” यह मज़ाक है, पर सच्चाई भी।
दरअसल, भारत में फेस्टिवल ट्रैवल का अर्थ सिर्फ़ एक यात्रा नहीं — यह एक सामाजिक पलायन है। करोड़ों लोग शहरों से गाँवों की तरफ़ लौटते हैं, और रेलवे इन भावनाओं को ढोता है। जब सिस्टम फेल होता है, तो यह सिर्फ़ तकनीकी नहीं, सामाजिक असफलता भी होती है।
रेलवे की वेबसाइट के साथ-साथ ऐप भी ठप पड़ा। कई लोगों ने टिकट बुकिंग के बीच में पैसा कटने की शिकायत की। बाद में सर्वर ठीक हुआ, लेकिन तब तक समय निकल चुका था। यह सवाल उठता है — क्या हमारी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर त्योहारों की मांग के हिसाब से तैयार है?
पिछले कुछ वर्षों में रेलवे ने डिजिटल सुधारों की कई कोशिशें की हैं — AI आधारित सीट आवंटन, डाटा एनालिटिक्स, और बुकिंग प्लेटफॉर्म मॉडर्नाइजेशन। पर असली टेस्ट तब होता है जब करोड़ों लोग एक साथ लॉगिन करते हैं। त्योहारों में सिस्टम का यह स्ट्रेस-टेस्ट बार-बार यह दिखा देता है कि अभी बहुत दूरी बाकी है।
दिलचस्प बात यह है कि IRCTC का शेयर मार्केट प्रदर्शन भी इन घटनाओं से अछूता नहीं रहता। जब वेबसाइट डाउन होती है, तो शेयर में हल्की गिरावट दिखती है — यह निवेशकों के भरोसे की भी कहानी है।
1999 में जब IRCTC अस्तित्व में आया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह एक दिन भारत के सबसे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में से एक बनेगा। मगर 2025 में भी जब सर्वर डाउन जैसी समस्याएं बनी रहें, तो यह सोचने की बात है — क्या हमने तकनीक को सही तरह से अपनाया है, या सिर्फ़ उसका चमकदार चेहरा दिखाया है?
त्योहारों का समय सिर्फ़ यात्रा का नहीं, आत्ममंथन का भी है। हमें यह मानना होगा कि ट्रेन का टिकट सिर्फ़ कागज़ का टुकड़ा नहीं — यह उस उम्मीद की निशानी है जो हर भारतीय अपने घर के लिए रखता है।
रेलवे को इस उम्मीद का मान रखना होगा।
क्योंकि जब कोई कहता है — “माँ, टिकट मिल गया!” — तो वह सिर्फ़ एक बुकिंग नहीं, एक भावनात्मक जीत होती है।




