
From Hisar to the Supreme Court – Justice Surya Kant's journey is an example of honesty and dedication
हिसार से सुप्रीम कोर्ट तक: जस्टिस सूर्यकांत भारत के नए मुख्य न्यायाधीश
जज सूर्यकांत का सफर — गाँव की गलियों से सर्वोच्च अदालत तक
भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश के रूप में जस्टिस सूर्यकांत का नाम तय हो गया है। 24 नवंबर 2025 को वे देश के 53वें CJI के रूप में शपथ लेंगे। हिसार की एक सादगी-भरी गलियों से निकलकर देश की सर्वोच्च अदालत तक उनका सफर इस बात की मिसाल है कि मेहनत, ईमानदारी और इरादा — तीनों मिल जाएं तो मंज़िल खुद रास्ता बना लेती है।
📍नई दिल्ली
🗓️ 31 अक्तूबर 2025
✍️ आसिफ ख़ान
ईमानदारी, नर्मी और नज़रिया — जस्टिस सूर्यकांत की कहानी
आज जब देश में न्यायपालिका की साख और पारदर्शिता पर चर्चा हो रही है, ऐसे में जस्टिस सूर्यकांत की नियुक्ति एक अहम संकेत है। वे न केवल वरिष्ठतम न्यायाधीश हैं बल्कि उनके भीतर “क़ानून को इंसानियत से जोड़ने” की समझ गहरी मानी जाती है।
सफर की शुरुआत — छोटे शहर से बड़ी अदालत तक
सूर्यकांत का जन्म 10 फ़रवरी 1962 को हरियाणा के हिसार ज़िले में हुआ। मिडिल-क्लास पृष्ठभूमि, सरकारी स्कूल की पढ़ाई, और ज़मीनी संघर्ष से निकले एक ऐसे नौजवान, जिसने अपने ज्ञान और सब्र से क़ानूनी दुनिया में पहचान बनाई। 1984 में उन्होंने हिसार कोर्ट से वकालत शुरू की और जल्द ही पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट तक पहुँचे।
उनकी क़ानूनी समझ इतनी गहरी थी कि सिर्फ़ 38 साल की उम्र में वे हरियाणा के Advocate General बने — यह उस समय राज्य का सबसे कम उम्र का महाधिवक्ता था। 2004 में हाईकोर्ट जज बने, फिर 2018 में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और 2019 में सुप्रीम कोर्ट के जज।
24 नवंबर 2025 को वे देश के 53वें चीफ जस्टिस के रूप में शपथ लेंगे — उनका कार्यकाल फ़रवरी 2027 तक रहेगा।
न्यायिक दृष्टिकोण — समाज और संविधान के बीच सेतु
जस्टिस सूर्यकांत अपने फैसलों में अक्सर “मानवीय दृष्टि” को प्राथमिकता देते हैं। उनका मानना है कि न्याय सिर्फ़ कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि इंसान के हालात को समझने की क्षमता भी है।
उन्होंने जेल सुधार, धारा 144, और अल्पसंख्यक संस्थानों से जुड़े कई अहम फैसले दिए। उनकी टिप्पणी “क़ानून को डर नहीं, भरोसा पैदा करना चाहिए” आज भी सुप्रीम कोर्ट के चर्चित उद्धरणों में गिनी जाती है।
उनके कई निर्णयों में सामाजिक न्याय, हाशिए के वर्गों के अधिकार, और संविधान के मूल मूल्यों की गूंज सुनाई देती है।
शख़्सियत — नर्मी में दृढ़ता, फ़ैसलों में सख़्ती
जिन लोगों ने उनके साथ काम किया है, वे बताते हैं कि सूर्यकांत बेहद शांत, विनम्र और संयमी हैं। वे अपने सहयोगियों को सुनते हैं, लेकिन जब निर्णय लेते हैं तो पूरी मज़बूती से खड़े रहते हैं।
उनकी कार्यशैली में कोई दिखावा नहीं, बल्कि एक सादगी है — जो आज के तेज़, राजनीतिक माहौल में दुर्लभ लगती है।
विवाद और आलोचना — पारदर्शिता का सवाल
हर सार्वजनिक जीवन की तरह, सूर्यकांत के करियर पर भी सवाल उठे। कुछ पुरानी संपत्ति और टैक्स से जुड़े आरोप मीडिया में आए, हालांकि किसी न्यायिक जाँच में वे साबित नहीं हुए। पर सवाल यह है — क्या न्यायपालिका को अपने भीतर की पारदर्शिता को और खुला नहीं करना चाहिए?
यह प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए है। अगर न्यायालय खुद पर सवालों को सहन कर सके, तो वही उसकी असली ताक़त है।
आगामी चुनौतियाँ — विश्वास की कसौटी
नए CJI के रूप में जस्टिस सूर्यकांत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है — न्यायपालिका में “लोगों का भरोसा” मज़बूत करना।
मामलों का बैकलॉग, अदालतों में लंबित अपीलें, और तकनीक को अपनाने की धीमी रफ़्तार — ये सब उनके कार्यकाल की प्राथमिक चुनौतियाँ होंगी।
लेकिन जो व्यक्ति हिसार की गलियों से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा, वो इन कठिनाइयों को भी सहजता से पार कर सकता है। उनका अब तक का सफर यही बताता है कि वे सिर्फ़ एक जज नहीं, बल्कि एक सोच हैं — “न्याय हर दरवाज़े तक पहुँचे।”
उम्मीदों का नया अध्याय
जब 24 नवंबर को वे भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेंगे, तो वह केवल एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं होगी — बल्कि तीन दशकों की मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष का सम्मान भी होगा।
उनसे उम्मीद है कि वे अदालत को सिर्फ़ फ़ैसलों का स्थान नहीं, बल्कि संवाद और सुधार का मंच बनाएँगे।






