
उन्नीस देशों पर इमिग्रेशन रोक और उसके मायने
नेशनल गार्ड पर हमले के बाद ट्रंप सरकार ने उन्नीस देशों के लिए इमिग्रेशन प्रक्रिया पूरी तरह रोक दी है। इनमें अफगानिस्तान, सोमालिया, ईरान जैसे देश शामिल हैं। सरकार का कहना है कि यह फैसला सुरक्षा के लिए जरूरी है, जबकि आलोचकों का मानना है कि यह सामूहिक सज़ा जैसा कदम है।
📍वॉशिंगटन✍️ आसिफ़ ख़ान
वॉशिंगटन में पिछले हफ्ते जो गोलियों की गूंज सुनाई दी, वह सिर्फ एक हिंसक घटना नहीं थी, वह एक नीतिगत भूचाल की भूमिका बन गई। व्हाइट हाउस के करीब नेशनल गार्ड के जवानों पर हमले में एक सैनिक की मौत और दूसरे का गंभीर रूप से घायल होना, अमेरिका की राजनीति और समाज को फिर से उस मोड़ पर ले आया जहां सुरक्षा और स्वतंत्रता आमने सामने खड़ी दिखती हैं। इसी घटना का हवाला देकर सरकार ने उन्नीस गैर यूरोपीय देशों के सभी इमिग्रेशन आवेदनों पर रोक लगा दी है। ग्रीन कार्ड, नागरिकता, शरण और बाकी सभी कानूनी रास्ते फिलहाल बंद कर दिए गए हैं। सरकार कहती है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी कदम है। सवाल यह है कि क्या सुरक्षा सच में इसी रास्ते से आती है।
ट्रंप प्रशासन का तर्क सीधा और भावनात्मक है। एक आरोपी अफगान नागरिक की गिरफ्तारी, एक जवान की मौत और बढ़ता सार्वजनिक गुस्सा। सरकार ने कहा कि जब तक हम यह नहीं जान लेते कि कौन अंदर आ रहा है और क्यों, तब तक दरवाजे बंद रखना समझदारी है। आम आदमी को यह तर्क सरल लगता है। अगर किसी मोहल्ले में एक चोरी हो जाए तो लोग तुरंत दरवाजे दोहरी कुंडी से बंद कर लेते हैं। यह स्वाभाविक डर और प्रतिक्रिया है। लेकिन देश कोई मोहल्ला नहीं होता और इमिग्रेशन कोई छोटी खिड़की नहीं, यह लाखों जिंदगियों का रास्ता होता है।
उन्नीस देशों की सूची भी अपने आप में एक संदेश देती है। अफगानिस्तान, सोमालिया, ईरान, यमन, लीबिया, सूडान जैसे देश पहले से ही युद्ध, अशांति और आर्थिक तबाही से जूझ रहे हैं। इन देशों से आने वाले ज्यादातर लोग बेहतर जिंदगी नहीं, बल्कि जान बचाने की उम्मीद लेकर निकलते हैं। कोई मां अपने बच्चों को स्कूल भेजने से डरती है, कोई युवक जबरन भर्ती से भाग रहा होता है, कोई परिवार भूख से टूट चुका होता है। सवाल यह है कि क्या इन सबको एक ही तराजू में तौलना इंसाफ है।
सरकार यह भी कहती है कि यह पहला मौका नहीं है। जून में ट्रैवल बैन लगाया गया था, अब इमिग्रेशन पर भी रोक लगा दी गई है। यानी यह नीति किसी एक घटना की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पहले से चल रही एक सोच का विस्तार है। इस सोच की जड़ में यह धारणा बैठी है कि बाहरी लोग संभावित खतरा हैं। यह धारणा नई नहीं है। हर दौर में किसी न किसी समुदाय को खतरे के रूप में पेश किया गया है। कभी आयरिश, कभी यहूदी, कभी एशियाई, और अब मुसलमान बहुल देशों से आने वाले लोग। इतिहास गवाह है कि ऐसी सोच ने समाज को सुरक्षित कम और बंटा हुआ ज्यादा किया है।
एक और अहम सवाल यह है कि सुरक्षा का असली मतलब क्या है। क्या सुरक्षा सिर्फ बाहरी खतरे से बचाव का नाम है, या इसके भीतर सामाजिक स्थिरता, भरोसा और इंसानियत भी शामिल है। अगर सुरक्षा के नाम पर हम उन लोगों को रोक दें जो कानून के तहत, जांच प्रक्रिया से गुजरकर आना चाहते हैं, तो क्या हम सच में सुरक्षित हो जाएंगे। अमेरिका के ही आंकड़े बताते हैं कि इमिग्रेशन के रास्ते आने वालों में हिंसक अपराध की दर जन्मजात नागरिकों से कम रही है। फिर भी डर की राजनीति हकीकत पर भारी पड़ जाती है।
नेशनल गार्ड पर हमला एक गंभीर अपराध था और दोषी को कानून के तहत सख्त सजा मिलनी चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन एक व्यक्ति के अपराध को लाखों लोगों के चरित्र से जोड़ देना न्याय के उसूलों पर सवाल खड़ा करता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी शहर में एक सड़क हादसा हो जाए और पूरे शहर के ड्राइवरों के लाइसेंस रद्द कर दिए जाएं। यह तात्कालिक गुस्से का फैसला हो सकता है, दूरगामी समझ का नहीं।
ट्रंप के बयानों ने इस बहस को और तीखा बना दिया है। प्रवासियों को अपमानजनक शब्दों से संबोधित करना, उन्हें अपने देश वापस जाने की सलाह देना, यह सब न सिर्फ सामाजिक माहौल को जहरीला बनाता है, बल्कि नीतिगत फैसलों की नैतिक जमीन को भी कमजोर करता है। एक राष्ट्रपति के शब्द सिर्फ बयान नहीं होते, वे संकेत होते हैं। वे बताते हैं कि सत्ता किस दिशा में सोच रही है और समाज से क्या उम्मीद कर रही है।
समर्थकों का कहना है कि सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। अगर सख्ती से एक भी जान बचती है तो यह सही सौदा है। यह दलील पहली नजर में मजबूत लगती है। आखिर जान से बड़ा क्या है। लेकिन यहीं पर एक कठिन सवाल उठता है। अगर किसी नीति से एक जान बचती है लेकिन हजारों जिंदगियां अधर में लटक जाती हैं, तो उस नीति को कैसे तौला जाए। सुरक्षा का गणित भावनाओं से नहीं, संतुलन से तय होता है।
इस नई नीति का असर सिर्फ उन उन्नीस देशों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका संदेश दुनिया के बाकी हिस्सों तक भी जाएगा। अमेरिका लंबे समय से खुद को अवसरों की धरती बताता आया है। वह देश जिसने शरणार्थियों को अपनाया, युद्ध से भागे लोगों को नया घर दिया, जिसने कहा कि मेहनत करने वाला हर इंसान यहां अपनी जगह बना सकता है। अब वही देश अपने दरवाजों पर मोटा ताला लगा रहा है। यह छवि में बड़ा बदलाव है।
एक और पहलू जिस पर कम बात हो रही है, वह है अमेरिका के अंदर बसे उन प्रवासी परिवारों का डर। जिनके रिश्तेदार इन उन्नीस देशों में हैं, जो बरसों से अपने मां बाप, भाई बहन को बुलाने की प्रक्रिया में लगे थे। अब अचानक सब रुक गया है। किसी का बेटा अकेला रह गया है, किसी की पत्नी सालों से वीजा के इंतजार में है। उनके लिए यह सिर्फ एक सरकारी फैसला नहीं, यह रोजमर्रा के दर्द का नया अध्याय है।
आर्थिक असर भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इमिग्रेशन सिर्फ मानवीय मुद्दा नहीं, यह श्रम, शिक्षा और नवाचार से भी जुड़ा है। कई छोटे शहरों में अस्पताल, खेत, निर्माण और छोटे कारोबार प्रवासी कामगारों पर निर्भर हैं। जब आने का रास्ता बंद होगा, तो असर सिर्फ बाहर नहीं, भीतर भी दिखेगा। मजदूरी बढ़ेगी, काम रुकेगा और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। यह वह सच्चाई है जिसे चुनावी भाषणों में कम जगह मिलती है।
अब सवाल यह भी है कि क्या यह नीति कानूनी कसौटी पर टिक पाएगी। पहले भी ट्रैवल बैन को अदालतों में चुनौती मिली थी। कुछ हिस्से रुके, कुछ लागू हुए। अब जब इमिग्रेशन जैसी बुनियादी प्रक्रिया पूरी तरह रोकी गई है, तो कानूनी लड़ाई और तेज होगी। अमेरिका का संविधान सरकार को सुरक्षा के नाम पर असीमित अधिकार नहीं देता। हर कदम को न्यायिक जांच से गुजरना होता है। आने वाले हफ्तों में अदालतों की भूमिका अहम रहने वाली है।
सरकार यह भी कह रही है कि यह रोक स्थायी नहीं है, बल्कि तब तक है जब तक जांच प्रणाली को और सख्त नहीं किया जाता। लेकिन इतिहास बताता है कि अस्थायी कही गई कई पाबंदियां लंबे समय तक टिक जाती हैं। लोगों को धीरे धीरे उनकी आदत हो जाती है और फिर विरोध भी धीमा पड़ जाता है। डर यही है कि कहीं यह नई सामान्य स्थिति न बन जाए।
इस पूरे विवाद में मीडिया और समाज की जिम्मेदारी भी बड़ी है। अगर हर घटना को सिर्फ एक समुदाय या देश से जोड़कर पेश किया जाएगा, तो दायरा और सिकुड़ेगा। अगर सवाल पूछे जाएंगे, आंकड़ों पर बात होगी, वैकल्पिक रास्तों पर चर्चा होगी, तो शायद संतुलन बने। यह काम मुश्किल है क्योंकि गुस्से के दौर में ठंडे सवाल कम पसंद किए जाते हैं। लेकिन लोकतंत्र में सवाल ही असली सुरक्षा कवच होते हैं।
एक साधारण उदाहरण से बात समझी जा सकती है। अगर किसी स्कूल में एक छात्र अनुशासन तोड़ता है, तो उसे सजा मिलती है। पूरे स्कूल को बंद नहीं कर दिया जाता। अगर ऐसा किया जाए तो पढ़ाई का नुकसान उन छात्रों का भी होगा जिनका उस गलती से कोई लेना देना नहीं। यही तर्क देशों और इमिग्रेशन पर भी लागू होता है।
यह भी सच है कि दुनिया पहले से ज्यादा अस्थिर हो चुकी है। युद्ध, आतंक, तस्करी, जासूसी, सब कुछ जटिल हो गया है। सरकारों पर दबाव है कि वे कड़ाई दिखाएं। लेकिन कड़ाई और कठोरता में फर्क होता है। कड़ाई नियमों की मजबूती होती है, कठोरता इंसान की नजर से गिरना। नीति वही टिकाऊ होती है जिसमें दोनों के बीच संतुलन हो।
ट्रंप सरकार का यह फैसला उनके समर्थकों को शायद यह भरोसा दे कि सरकार मजबूत है, समझौता नहीं करेगी। विरोधियों को यह लगेगा कि डर को हथियार बनाया जा रहा है। सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं हो सकती है। लेकिन जो साफ दिख रहा है, वह यह कि इस फैसले ने अमेरिका के भीतर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सुरक्षा कितनी जरूरी है, यह कोई नहीं नकारता। सवाल सिर्फ इतना है कि सुरक्षा किस कीमत पर।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा सिर्फ अदालतों और संसद तक सीमित नहीं रहेगा, यह घरों के भीतर भी जाएगा। खाने की मेज पर, विश्वविद्यालयों के गलियारों में, दफ्तरों की कॉफी ब्रेक में। कोई कहेगा कि सरकार सही कर रही है, कोई कहेगा कि यह ज्यादती है। इन बातचीतों के बीच ही लोकतंत्र सांस लेता है।
दुनिया की नजर भी अमेरिका पर टिकी है। दूसरे देश देखेंगे कि दुनिया की सबसे ताकतवर लोकतांत्रिक व्यवस्था इस चुनौती से कैसे निपटती है। क्या वह डर के साथ चलेगी या आत्मविश्वास के साथ। क्या वह दीवारें खड़ी करेगी या पुल बनाएगी। इसका असर सिर्फ इमिग्रेशन पर नहीं, वैश्विक रिश्तों पर भी पड़ेगा।
अंत में लौटकर वही सवाल सामने आता है जिससे हमने शुरुआत की थी। नेशनल गार्ड के जवान की मौत एक गहरी मानवीय त्रासदी है। उसकी भरपाई कोई नीति नहीं कर सकती। उसकी जिम्मेदारी तय करना जरूरी है। लेकिन क्या उसी दर्द के सहारे लाखों बेगुनाह लोगों के रास्ते बंद कर देना सही जवाब है। शायद इतिहास इसका फैसला करेगा। फिलहाल हमारे सामने सिर्फ इतना है कि सुरक्षा और मानवता के बीच यह नई रस्साकशी और तेज हो गई है, और इसके नतीजे हम सबको मिलकर भुगतने होंगे।




