
पुतिन दौरा और विपक्ष की अनदेखी का सवाल,क्या विदेश नीति में विपक्ष की कोई जगह नहीं
📍नई दिल्ली ✍️Asif Khan
रूस के राष्ट्रपति के प्रस्तावित भारत दौरे से पहले यह बहस तेज हो गई है कि क्या विदेशी मेहमानों को विपक्षी नेतृत्व से मिलने से रोका जा रहा है। सत्ता और विपक्ष के बीच यह टकराव अब सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा सवाल बन गया है। राहुल गांधी के आरोप, शशि थरूर की संतुलित राय, और भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया है। क्या भारत की विदेश नीति सिर्फ सरकार की आवाज तक सीमित हो गई है, या विपक्ष भी देश का प्रतिनिधि है। यह एडिटोरियल उसी टकराव को परत दर परत खोलता है।
विदेशी मेहमान जब किसी देश में आते हैं तो वे सिर्फ सत्ता से नहीं मिलते, वे उस देश की आत्मा से मिलते हैं। प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक, व्यापारी से लेकर कलाकार तक, और कई बार विपक्ष के नेता भी इस आत्मा का हिस्सा होते हैं। यही वजह है कि दुनिया के मजबूत लोकतंत्रों में सिर्फ गवर्नमेंट नहीं, बल्कि अपोज़ीशन भी डिप्लोमेसी का एक चेहरा माना जाता है। भारत भी लंबे समय तक इसी परंपरा पर चलता रहा।
अब सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी ने क्या कहा। असल सवाल यह है कि अगर जो कहा गया है उसमें थोड़ा भी सच है, तो वह सच हमारे लोकतंत्र के लिए कितना खतरे की घंटी है। यह बहस भावनाओं की नहीं, सिस्टम की है। यह आरोप किसी व्यक्ति पर नहीं, एक सोच पर है।
राहुल गांधी का कहना है कि विदेशी मेहमानों को उनसे मिलने से रोका जा रहा है। उनका यह भी आरोप है कि विदेश दौरों के समय भी गवर्नमेंट यह संदेश भिजवाती है कि उनसे कोई संपर्क न रखा जाए। प्रियंका गांधी इसे डेमोक्रेटिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताती हैं। शशि थरूर कहते हैं कि लोकतंत्र में यह अच्छा होगा कि विदेशी मेहमान सबसे मिलें। भाजपा इसे गैर-जिम्मेदाराना बयान करार देती है।
अब जरा एक आम नागरिक की तरह सोचिए। आपके मोहल्ले में कोई बाहर से बड़ा अफसर आता है। क्या वह सिर्फ गली के प्रधान से ही मिलेगा या पूरे मोहल्ले के हालात जानना चाहेगा। अगर उसे बाकी घरों में जाने से रोक दिया जाए, तो क्या उसे पूरी सच्चाई मिलेगी। बस यही फर्क है सत्ता और देश में।
सरकार यह कहती है कि भारत आज एक आत्मविश्वासी ताकत है। यह बात सही है। इकोनॉमी मजबूत हुई है, डिप्लोमैटिक स्टैंड पहले से ज़्यादा स्पष्ट है। लेकिन आत्मविश्वास का मतलब यह नहीं होता कि सवालों से डर हो। असली कॉन्फिडेंस तो तब दिखता है जब सत्ता कहे कि आप विपक्ष से भी मिलिए, उनसे भी बात करिए, क्योंकि सच से हमें डर नहीं।
यहां भाजपा का यह तर्क भी सुना जाना चाहिए कि राहुल गांधी के बयान तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। लोकतंत्र में हर आरोप का जवाब सबूत से दिया जाना चाहिए। लेकिन जवाब सिर्फ बयान से नहीं, व्यवहार से भी दिया जाता है। अगर वास्तव में कोई रोक नहीं है, तो सरकार स्वयं यह स्पष्ट क्यों नहीं करती कि विदेशी मेहमान चाहे तो विपक्ष से मिल सकता है।
आज की राजनीति में सबसे आसान काम है किसी को गैर-जिम्मेदार ठहरा देना। सबसे मुश्किल काम है खुद को आईने में देखना। यह सच है कि राहुल गांधी जब विदेश जाते हैं तो कभी-कभी सरकार की आलोचना करते हैं। यह भी एक राजनीतिक रणनीति हो सकती है। लेकिन क्या इस वजह से उन्हें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए। यही वह नैतिक सवाल है जहां राजनीति और राष्ट्र के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है।
शशि थरूर का बयान इस पूरे विवाद में सबसे संतुलित लगता है। वे कहते हैं कि लोकतंत्र में यह अच्छा होगा कि विदेशी मेहमान सबसे मिलें। वे यह भी जोड़ते हैं कि उन्हें इस मामले की पूरी डिटेल नहीं पता। यह एक जिम्मेदार स्टैंड है। न आंख मूंदकर समर्थन, न आंख मूंदकर विरोध। आज की राजनीति में यही संतुलन सबसे ज्यादा गायब है।
पुतिन का भारत दौरा खुद में बहुत अहम है। रूस, चीन और अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि रणनीति भी हैं। रक्षा सौदे, तकनीकी सहयोग, ऊर्जा और वर्कर्स की मोबिलिटी जैसे मुद्दे सीधे आम लोगों की जिंदगी से जुड़े हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या विपक्ष को इन विषयों पर अलग नजरिया रखने का हक नहीं है।
सरकार की यह दलील कि विपक्ष का नेता ऐसी बयानबाजी से देश की छवि खराब करता है, आधा सच है। आधा इसलिए क्योंकि छवि सिर्फ आलोचना से नहीं बिगड़ती, छवि छिपाने से भी बिगड़ती है। जब सरकार हर आलोचक को देश विरोधी ठहराने लगे, तब दुनिया सवाल पूछती है कि यहां वास्तव में डर किसे लग रहा है।
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव जीतना नहीं होता। लोकतंत्र का मतलब है अलग-अलग आवाजों को जगह देना। अगर विदेशी मेहमान सिर्फ सत्ता की बात सुनेंगे, तो वे भारत को एक पार्टी का देश समझेंगे, पूरे समाज का नहीं। भारत सिर्फ सरकार नहीं है, भारत उसका विपक्ष भी है, उसका किसान भी है, उसका मज़दूर भी है, उसका छात्र भी है।
भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी कहती हैं कि राहुल गांधी को रूस के राष्ट्रपति का स्वागत करना चाहिए था और नकारात्मकता से बचना चाहिए था। यह बात सुनने में अच्छी लगती है। लेकिन लोकतंत्र में स्वागत और सवाल दोनों साथ चलते हैं। अगर सवाल पूछना नकारात्मकता है, तो फिर संसद किसलिए है।
नरहरि अमीन का यह कहना कि राहुल गांधी विदेश जाकर भारत की बुराई करते हैं, एक पुराना आरोप है। लेकिन यहां भी एक बारीक फर्क है। सरकार की आलोचना और देश की बुराई एक जैसी चीज नहीं होती। अगर दोनों को एक कर दिया गया, तो फिर लोकतंत्र और तानाशाही में फर्क क्या रह जाएगा।
अखिलेश प्रसाद सिंह की बात भी ध्यान देने लायक है। वे कहते हैं कि पहले बड़े विदेशी नेता प्रधानमंत्री से भी मिलते थे और विपक्ष के नेता से भी। यह परंपरा थी। परंपराएं सिर्फ रस्म नहीं होतीं, वे लोकतंत्र की रीढ़ होती हैं। जब रीढ़ कमजोर होती है, तो शरीर चल तो सकता है, लेकिन पतन तय हो जाता है।
आज का भारत एक अजीब दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ हम खुद को विश्वगुरु कहते हैं, दूसरी तरफ हम अपनी ही आवाजों से डरते नजर आते हैं। एक तरफ हम कहते हैं कि हमारी विदेश नीति स्वतंत्र है, दूसरी तरफ हम यह संकेत देते हैं कि हमारी राजनीति असुरक्षित है।
राहुल गांधी का यह कहना कि सरकार असुरक्षित महसूस करती है, एक राजनीतिक आरोप है। यह साबित नहीं हुआ है। लेकिन इतना जरूर साबित हो रहा है कि भरोसे की कमी दोनों तरफ है। सत्ता को विपक्ष पर भरोसा नहीं, विपक्ष को सत्ता पर भरोसा नहीं। और इस भरोसे की कमी का नुकसान सिर्फ राजनेताओं को नहीं, देश को होता है।
अब अगर व्यवहारिक नजरिए से देखें तो सरकार यह क्यों चाहेगी कि विदेशी मेहमान विपक्ष से न मिलें। इसका पहला कारण नियंत्रण की इच्छा हो सकता है। जब बातें नियंत्रण में रहती हैं, तो नैरेटिव भी नियंत्रण में रहता है। दूसरा कारण यह डर हो सकता है कि कहीं कोई अलग कहानी दुनिया के सामने न चली जाए। तीसरा कारण घरेलू राजनीति हो सकता है, जहां हर मुलाकात को जीत-हार के चश्मे से देखा जाता है।
लेकिन हर नियंत्रण अंततः कमजोरी की निशानी बन जाता है। जो सत्ता सच में मजबूत होती है, वह आलोचना से नहीं डरती। वह जानती है कि असहमति भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है जिसने उसे सत्ता तक पहुंचाया है।
आज के समय में सोशल मीडिया, इंटरनेशनल मीडिया और डिजिटल डिप्लोमेसी के दौर में कुछ भी छिपा नहीं रहता। अगर सरकार विपक्ष से मिलने पर रोक लगाएगी भी, तो इसकी खबर बाहर जाएगी ही। तब सवाल यह उठेगा कि आखिर छिपाया क्या जा रहा है।
भारत की विदेश नीति हमेशा बहुध्रुवीय रही है। हम एक समय रूस के करीब थे, फिर अमेरिका के करीब आए, अब चीन के साथ संतुलन बना रहे हैं। यह संतुलन तभी विश्वसनीय होता है जब भीतर का लोकतंत्र मजबूत दिखे। अगर भीतर ही असहमति को दबाया जाएगा, तो बाहर की डिप्लोमेसी भी खोखली लगेगी।
यह बहस सिर्फ राहुल गांधी बनाम भाजपा नहीं है। यह सत्ता बनाम संवैधानिक भावना की बहस है। नेता प्रतिपक्ष का पद संविधान से आता है, किसी पार्टी की कृपा से नहीं। जब उस पद को महत्व नहीं दिया जाता, तो असल में संविधान को छोटा किया जाता है।
एक छोटा सा उदाहरण समझिए। अगर किसी परिवार में सिर्फ एक व्यक्ति ही बाहर से आने वाले मेहमानों से बात करे और बाकी सबको कमरे में बंद कर दिया जाए, तो मेहमान उस परिवार की पूरी हकीकत नहीं समझ पाएगा। लोकतंत्र भी एक परिवार ही तो है, बस बहुत बड़ा।
राहुल गांधी के आरोपों में राजनीति है, इसमें कोई शक नहीं। भाजपा की प्रतिक्रियाओं में भी राजनीति है, इसमें भी कोई शक नहीं। लेकिन इन दोनों के बीच जो सच दब रहा है, वह है लोकतांत्रिक मर्यादा। मर्यादा न सरकार की बपौती होती है, न विपक्ष की।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार साफ शब्दों में यह कहे कि भारत में कोई भी विदेशी मेहमान, अगर चाहे, तो विपक्षी नेताओं से भी मिल सकता है। और विपक्ष भी यह स्पष्ट करे कि वह इस मंच का उपयोग देश को बदनाम करने के लिए नहीं, देश की विविधता दिखाने के लिए करेगा।
पुतिन का दौरा आए और चला जाएगा। एग्रीमेंट साइन होंगे, फोटो सेशन होंगे, बयान जारी होंगे। लेकिन यह सवाल रह जाएगा कि क्या उस दौरे में भारत का पूरा चेहरा दुनिया ने देखा या सिर्फ सत्ता का।
इतिहास गवाह है कि जिन देशों में विपक्ष को दबाया गया, वहां विदेश नीति भी धीरे-धीरे एकतरफा होती गई। और एकतरफा नीति अंततः जनता से भी दूर हो जाती है। भारत की ताकत हमेशा उसकी विविधता रही है, उसकी बहस रही है, उसकी बहुल आवाजें रही हैं।
आज अगर हम यह मान लें कि सिर्फ सत्ता ही राष्ट्र है, तो हम उसी रास्ते पर चल पड़ेंगे जहां राष्ट्र और सरकार का फर्क मिट जाता है। और जहां यह फर्क मिटता है, वहां लोकतंत्र एक औपचारिक शब्द बनकर रह जाता है।
इस पूरे विवाद में किसी का पूरी तरह सही होना जरूरी नहीं है। जरूरी यह है कि हम सही सवाल पूछें। और सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम एक ऐसे भारत की ओर बढ़ रहे हैं जहां विदेश नीति भी सिर्फ सत्ता का एकाधिकार बन जाएगी, या हम उस परंपरा को बचाएंगे जिसमें विपक्ष भी देश की आवाज होता है।
लोकतंत्र में असहज सवाल सबसे जरूरी होते हैं। राहुल गांधी का बयान असहज है। भाजपा की प्रतिक्रिया भी असहज है। लेकिन इन असहजताओं के बीच जो सहज सत्य है, वह यही है कि भारत को सत्ता और विपक्ष दोनों की जरूरत है। एक के बिना दूसरा अधूरा है।
आज अगर विदेशी मेहमान विपक्ष से नहीं मिलेंगे, तो कल शायद कुछ और आवाजें भी बंद की जाएंगी। इतिहास बताता है कि जब एक दरवाजा बंद होता है, तो धीरे-धीरे सारे झरोखे बंद होने लगते हैं।
इसलिए यह बहस केवल पुतिन के दौरे की नहीं है। यह हमारे लोकतंत्र की दिशा की बहस है। यह तय करेगा कि आने वाले समय में भारत सिर्फ एक मजबूत सरकार वाला देश होगा या एक मजबूत लोकतंत्र वाला देश।
और मजबूत लोकतंत्र वही होता है जहां सत्ता के साथ-साथ सवाल भी उतने ही मजबूत हों।





