
Shah Times analysis on mysterious deaths of top defense scientists in US and China
न्यूक्लियर और एआई रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिक निशाने पर?
क्या महाशक्तियों के बीच शुरू हो चुका है साइलेंट साइंटिफिक वॉर?
अमेरिका और चीन में रक्षा, न्यूक्लियर, हाइपरसोनिक, स्पेस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े वैज्ञानिकों की संदिग्ध मौतों और गायब होने की घटनाओं ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कुछ लोग इसे जासूसी युद्ध का संकेत मान रहे हैं, जबकि विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे जल्दबाजी में बनाई जा रही साजिश थ्योरी बता रहा है। असली सवाल यह है कि अगर दुनिया की सबसे संवेदनशील टेक्नोलॉजी पर काम करने वाले लोग सुरक्षित नहीं हैं, तो वैश्विक सुरक्षा कितनी मजबूत है?
📍New Delhi🗓️ 25 April 2026 ✍️ Asif Khan
रहस्य सिर्फ मौतों का नहीं, समय का भी है
दुनिया इस वक्त पारंपरिक युद्ध से ज्यादा टेक्नोलॉजी युद्ध के दौर में है। मिसाइलें सिर्फ सीमाओं पर नहीं बन रहीं, कोडिंग लैब्स में भी तैयार हो रही हैं। भविष्य के युद्ध अब टैंकों से कम और डेटा, एल्गोरिद्म, सैटेलाइट, क्वांटम सिस्टम और न्यूक्लियर डिलीवरी प्लेटफॉर्म से ज्यादा तय होंगे।
ऐसे समय में अगर अमेरिका और चीन जैसे दो बड़े प्रतिद्वंद्वी देशों में हाई-सिक्योरिटी डिफेंस वैज्ञानिक अचानक मरने लगें या गायब होने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
अमेरिका में जिन मामलों का जिक्र किया जा रहा है, उनमें कुछ नाम बेहद संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़े बताए जा रहे हैं। कुछ लोग न्यूक्लियर रिसर्च से जुड़े थे, कुछ एयरोस्पेस सेक्टर से, कुछ एडवांस्ड डिफेंस टेक्नोलॉजी प्रोग्राम्स से। चीन में भी कई वैज्ञानिकों की मौतों को लेकर इसी तरह की चर्चा तेज हुई है।
लेकिन यहां पहली जिम्मेदारी पत्रकारिता की है। हर रहस्यमयी मौत को जासूसी ऑपरेशन घोषित कर देना गंभीर गलती होगी। अभी तक सार्वजनिक स्तर पर ऐसा कोई निर्णायक सबूत सामने नहीं आया है जो यह साबित करे कि यह किसी विदेशी एजेंसी की संगठित साजिश है।
यही फर्क रिपोर्टिंग और अफवाह में होता है।
टेक्नोलॉजी की नई कोल्ड वॉर
अमेरिका और चीन के बीच आज सबसे बड़ी लड़ाई व्यापार की नहीं है। असली लड़ाई टेक्नोलॉजी की है।
हाइपरसोनिक हथियारों में चीन ने तेजी दिखाई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सैन्य सिस्टम में अमेरिका अपनी बढ़त बनाए रखना चाहता है। स्पेस डिफेंस में दोनों देश आक्रामक निवेश कर रहे हैं। ताइवान को लेकर तनाव अलग है।
अगर किसी देश को दूसरे देश की सैन्य क्षमता धीमी करनी हो, तो सबसे आसान रास्ता हमेशा हथियारों पर हमला नहीं होता। कई बार दिमागों पर हमला ज्यादा प्रभावी होता है।
इतिहास इसका गवाह है।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वैज्ञानिकों की भर्ती, संरक्षण और चोरी, तीनों हुए। शीत युद्ध में सोवियत संघ और अमेरिका ने वैज्ञानिक प्रतिभाओं को अपने पक्ष में खींचने के लिए बड़े ऑपरेशन चलाए। परमाणु रहस्यों की जासूसी कोई नई कहानी नहीं है।
आज फर्क सिर्फ इतना है कि तकनीक ज्यादा जटिल है और दांव ज्यादा बड़ा।
क्या पैटर्न वाकई संदिग्ध है?
कुछ मामलों में दावा किया गया कि लोग घर से बिना फोन, बिना वॉलेट निकले। कुछ अचानक लापता हुए। कुछ कथित दुर्घटनाओं में मारे गए।
यह सुनने में फिल्मी लगता है। लेकिन हमें ठहरकर देखना होगा।
क्या सभी मामलों के बीच आधिकारिक संबंध साबित हुआ है? नहीं।
क्या जांच एजेंसियों ने सार्वजनिक रूप से विदेशी साजिश की पुष्टि की है? नहीं।
क्या परिवारों ने सवाल उठाए हैं? कुछ मामलों में हां।
क्या सोशल मीडिया ने अधूरी जानकारी को बढ़ाया है? बिल्कुल।
यही वह जगह है जहां भ्रम पैदा होता है। इंटरनेट आधी जानकारी को पूरी कहानी बना देता है।
कई मामलों में मानसिक स्वास्थ्य, पेशेवर दबाव, निजी जीवन संकट, दुर्घटना या सामान्य अपराध जैसे पहलुओं की भी जांच होती है, लेकिन वे सुर्खियां कम बनती हैं।
चीन की चुप्पी अलग कहानी कहती है
चीन का सिस्टम अमेरिका से अलग है।
वहां राज्य सूचना को बहुत नियंत्रित करता है। अगर किसी रक्षा वैज्ञानिक की मौत होती है, तो पूरी जानकारी हमेशा सार्वजनिक नहीं होती।
यही कारण है कि संदेह और बढ़ता है।
अगर किसी वैज्ञानिक को “राष्ट्रीय कर्तव्य में बलिदान” जैसी भाषा के साथ याद किया जाता है, तो सवाल उठना तय है कि क्या वह सिर्फ दुर्घटना थी या कुछ और।
लेकिन फिर वही बात। सवाल उठना और निष्कर्ष निकाल लेना, दोनों अलग बातें हैं।
वैज्ञानिक अब सैनिक जितने अहम क्यों?
आज एक हाइपरसोनिक इंजीनियर कई बार एक फाइटर स्क्वाड्रन जितना रणनीतिक महत्व रखता है।
एक एआई आर्किटेक्ट भविष्य की ड्रोन सेना तैयार कर सकता है।
एक न्यूक्लियर वैज्ञानिक पूरे डिटरेंस मॉडल को बदल सकता है।
एक स्पेस इंजीनियर सैन्य सैटेलाइट नेटवर्क की रीढ़ हो सकता है।
यानी लैब में बैठा व्यक्ति अब युद्ध के मैदान से जुड़ा हुआ है।
इसीलिए कई देशों ने अपने वैज्ञानिकों की सुरक्षा बढ़ा दी है। इजराइल, रूस, अमेरिका, चीन और यूरोपीय देश संवेदनशील रिसर्च स्टाफ की सुरक्षा को लेकर पहले से ज्यादा सतर्क हैं।
क्या यह ब्रेन वॉर है?
दुनिया लंबे समय से ब्रेन ड्रेन सुनती आई है।
अब ब्रेन डिसरप्शन की चर्चा बढ़ रही है।
अगर प्रतिद्वंद्वी देश आपके वैज्ञानिकों को भर्ती कर ले, डरा दे, खरीद ले, डिजिटल रूप से हैक कर ले, या उनकी रिसर्च चुरा ले, तो बिना गोली चलाए आपकी बढ़त खत्म हो सकती है।
कॉर्पोरेट दुनिया में भी यही हो रहा है।
बड़ी टेक कंपनियां एक-दूसरे के इंजीनियरों को भारी पैकेज देकर खींचती हैं।
राष्ट्र इस खेल का ज्यादा कठोर संस्करण खेल सकते हैं।
अमेरिका की चुनौती
अमेरिका के सामने दो संकट हैं।
पहला, वह अपनी तकनीकी बढ़त बचाना चाहता है।
दूसरा, उसे यह साबित करना है कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रणाली अपने ही वैज्ञानिकों की सुरक्षा कर सकती है।
अगर वैज्ञानिकों के परिवार असुरक्षित महसूस करेंगे, तो टैलेंट इस सेक्टर से दूर जा सकता है।
यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा झटका होगा।
चीन की चुनौती
चीन तेजी से रक्षा टेक्नोलॉजी में आगे बढ़ रहा है।
लेकिन उसकी व्यवस्था अत्यधिक गोपनीय है।
जब पारदर्शिता कम होती है, तो अफवाहें ज्यादा पैदा होती हैं।
यह बीजिंग के लिए भी समस्या है।
भारत को क्यों चिंता करनी चाहिए?
भारत भी हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी, स्पेस मिशन, डिफेंस एआई और रणनीतिक रिसर्च में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
Defence Research and Development Organisation, Indian Space Research Organisation और भारत के न्यूक्लियर संस्थानों में काम करने वाले वैज्ञानिक राष्ट्रीय संपत्ति हैं।
भारत को दो चीजें तुरंत मजबूत करनी होंगी।
एक, वैज्ञानिक सुरक्षा।
दूसरा, साइबर सुरक्षा।
साथ ही मानसिक स्वास्थ्य सहायता भी जरूरी है। हाई-प्रेशर रिसर्च भूमिकाओं में काम करने वाले लोग भारी तनाव झेलते हैं।
साजिश थ्योरी का बाजार भी समझिए
जब भी कोई रहस्यमयी घटना होती है, इंटरनेट उसे तुरंत वैश्विक षड्यंत्र में बदल देता है।
कभी एलियंस।
कभी सीक्रेट एजेंसियां।
कभी डीप स्टेट।
हकीकत अक्सर ज्यादा जटिल और कम ग्लैमरस होती है।
जिम्मेदार पत्रकारिता का मतलब है सवाल पूछना, लेकिन सबूत के बिना फैसला न देना।
आगे क्या?
अगर जांच एजेंसियां ठोस सबूत लाती हैं, तो यह वैश्विक सुरक्षा का बड़ा मामला बनेगा।
अगर यह घटनाएं असंबंधित निकलती हैं, तब भी एक बड़ा सबक रहेगा।
दुनिया ने समझ लिया है कि भविष्य की ताकत तेल के कुओं में नहीं, दिमागों में बैठी है।
जो देश अपने वैज्ञानिकों की रक्षा नहीं कर पाएंगे, वे भविष्य की दौड़ हार सकते हैं।
नतीजा
फिलहाल सच और सनसनी के बीच बहुत धुंध है।
कुछ घटनाएं सचमुच असामान्य लगती हैं।
कुछ दावे अभी अधूरे हैं।
लेकिन एक बात साफ है।
इक्कीसवीं सदी का सबसे खतरनाक युद्ध शायद सीमाओं पर नहीं, लैब्स के भीतर लड़ा जाएगा।
और अगर वैज्ञानिक डर में काम करेंगे, तो पूरी दुनिया असुरक्षित होगी।




