
India and EU leaders during the historic trade agreement announcement Shah Times
भारत–ईयू समझौता: बड़े वादे, बड़ी कसौटी
मदर ऑफ ऑल डील्स और भारत का असली इम्तिहान
भारत–यूरोप व्यापार: फायदे, फिक्र और भविष्य
भारत और यूरोपीय संघ के बीच लगभग दो दशक बाद फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पूरा हो गया है. इसे ऐतिहासिक कहा जा रहा है, लेकिन हर बड़ी डील अपने साथ सवाल भी लाती है. यह संपादकीय उन वादों, जोखिमों और चुनौतियों को परखता है, जो इस समझौते के साथ भारत के सामने खड़ी हैं.
📍 New Delhi ✍️ Asif Khan
एक बड़ा ऐलान, बड़ी उम्मीदें
नई दिल्ली में हुई घोषणा सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं थी. यह उस लंबी बातचीत का आखिर था, जो सालों से चल रही थी. जब यूरोपीय नेताओं ने इसे मदर ऑफ ऑल डील्स कहा और प्रधानमंत्री ने इसे भारत का सबसे बड़ा व्यापार समझौता बताया, तो संदेश साफ था. दुनिया को दिखाया जा रहा था कि भारत अब ग्लोबल टेबल पर सिर्फ सुनने वाला नहीं, बल्कि शर्तें तय करने वाला खिलाड़ी है.
लेकिन इतिहास बताता है कि हर बड़ी घोषणा के बाद असली कहानी जमीन पर लिखी जाती है. कागज़ पर बनी सहमति और फैक्ट्री गेट पर दिखने वाला असर, दोनों में फर्क होता है.
टैरिफ घटेगा, कीमतें गिरेंगी, पर किसके लिए
इस समझौते का सबसे चर्चित हिस्सा टैरिफ कटौती है. शराब, बीयर, वाइन, जैतून का तेल, मेडिकल उपकरण, मशीनरी और कारों पर टैक्स कम होगा. आम उपभोक्ता के तौर पर यह सुनने में अच्छा लगता है. कौन नहीं चाहता कि बेहतर क्वालिटी का सामान सस्ता मिले.
लेकिन यहीं एक सवाल उठता है. जब यूरोपीय शराब सस्ती होगी, तो देशी उत्पादकों का क्या होगा. छोटे ब्रुअरी या वाइन मेकर, जो पहले ही सीमित बाजार में जूझ रहे हैं, वे बड़े यूरोपीय ब्रांड्स से कैसे मुकाबला करेंगे. यह वही सवाल है, जो हर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट में उठता रहा है.
उद्योग बनाम उद्योग, बराबरी या असमानता
यूरोपीय यूनियन की इंडस्ट्री टेक्नोलॉजी, कैपिटल और स्केल में बहुत आगे है. भारत की मैन्युफैक्चरिंग ने बीते वर्षों में रफ्तार पकड़ी है, लेकिन दोनों के बीच फर्क अभी भी बड़ा है.
समर्थक कहते हैं कि यह डील भारतीय उद्योग को ग्लोबल वैल्यू चेन में जोड़ेगी. आलोचक पूछते हैं कि क्या हम तैयार हैं. उदाहरण के लिए, मेडिकल डिवाइस सेक्टर को ही लें. टैक्स हटने से मशीनें सस्ती होंगी, अस्पतालों को फायदा होगा. लेकिन घरेलू निर्माता, जो अभी सीखने की प्रक्रिया में हैं, उनके लिए प्रतिस्पर्धा और कठिन हो जाएगी.
रोज़गार का वादा और ज़मीनी हकीकत
हर बड़ी ट्रेड डील के साथ रोज़गार का वादा जुड़ा होता है. कहा जा रहा है कि निवेश बढ़ेगा, फैक्ट्रियां लगेंगी और नौकरियां आएंगी. यह संभव है, लेकिन अपने आप नहीं होगा.
अगर नीति, स्किल और इंफ्रास्ट्रक्चर साथ नहीं चले, तो नौकरियां बाहर से आएंगी और भारत सिर्फ बाजार बनकर रह जाएगा. यह डर नया नहीं है. पहले भी कई सेक्टर्स में ऐसा हुआ है, जहां मुनाफा बढ़ा लेकिन लोकल एम्प्लॉयमेंट सीमित रहा.
ग्रीन फंड और पर्यावरण की राजनीति
यूरोपीय संघ की तरफ से 500 मिलियन यूरो की ग्रीन सहायता एक सकारात्मक कदम लगता है. क्लीन एनर्जी, कार्बन कटौती और इंडस्ट्रियल ट्रांजिशन, ये सभी जरूरी हैं.
लेकिन यहां भी एक सवाल है. क्या यह फंड भारत की प्राथमिकताओं के हिसाब से इस्तेमाल होगा या यूरोप के तय एजेंडे के मुताबिक. कई बार ग्रीन शर्तें विकासशील देशों पर अतिरिक्त दबाव बन जाती हैं. भारत को यह संतुलन साधना होगा कि पर्यावरण भी बचे और विकास भी रुके नहीं.
रणनीतिक साझेदारी या सिर्फ व्यापार
इस डील को सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रखा जा रहा. सुरक्षा, इंडो पैसिफिक, मैरीटाइम और साइबर सहयोग की बातें भी हो रही हैं. दो बड़े लोकतंत्रों का साथ आना, मौजूदा वैश्विक हालात में एक संकेत है.
लेकिन भारत की विदेश नीति की ताकत उसकी रणनीतिक स्वायत्तता रही है. सवाल यह है कि क्या बढ़ता यूरोपीय जुड़ाव इस स्वतंत्रता को सीमित करेगा या मजबूत करेगा. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत बातचीत की मेज पर कितना स्पष्ट और दृढ़ रहता है.
किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चिंता
ट्रेड डील की चर्चा में किसान अक्सर पीछे छूट जाते हैं. जैतून का तेल, डेयरी और प्रोसेस्ड फूड जैसे क्षेत्रों में यूरोपीय उत्पाद सस्ते होंगे. इससे उपभोक्ता को फायदा मिल सकता है, लेकिन घरेलू किसानों पर दबाव बढ़ेगा.
सरकार कहती है कि संवेदनशील सेक्टर्स को सुरक्षा दी गई है. फिर भी अनुभव बताता है कि आयात बढ़ते ही कीमतें गिरती हैं और किसान सबसे पहले प्रभावित होता है. यह चिंता नजरअंदाज नहीं की जा सकती.
एमएसएमई के लिए मौका या खतरा
छोटे और मध्यम उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. इस डील से उन्हें यूरोपीय बाजार तक पहुंच मिल सकती है. यह एक बड़ा मौका है.
लेकिन यूरोपीय स्टैंडर्ड, सर्टिफिकेशन और नियम बेहद सख्त हैं. बिना सरकारी मदद और तैयारी के, ज्यादातर एमएसएमई वहां तक पहुंच ही नहीं पाएंगे. ऐसे में फायदा कुछ बड़े खिलाड़ियों तक सीमित रहने का खतरा है.
राजनीतिक संदेश और घरेलू असर
इस समझौते का राजनीतिक संदेश भी साफ है. भारत खुद को ग्लोबल साउथ का लीडर और भरोसेमंद पार्टनर के रूप में पेश कर रहा है. घरेलू राजनीति में भी इसे एक उपलब्धि की तरह दिखाया जा रहा है.
लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है. समर्थन और आलोचना, दोनों साथ चलें तभी नीति मजबूत होती है. सिर्फ तारीफ से न तो उद्योग मजबूत होता है, न किसान सुरक्षित रहते हैं.आखिर में, असली कसौटी क्या है
भारत–ईयू ट्रेड डील एक मौका है, लेकिन यह कोई जादुई समाधान नहीं. इससे भारत को फायदा भी हो सकता है और नुकसान भी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे कैसे लागू किया जाता है.
अगर सरकार घरेलू उद्योग, किसान और एमएसएमई को साथ लेकर चली, तो यह डील सच में इतिहास बना सकती है. अगर नहीं, तो यह भी उन समझौतों में शामिल हो जाएगी, जिनका फायदा कुछ को और बोझ बहुतों को पड़ा.
मदर ऑफ ऑल डील्स कहने से पहले, हमें मदर ऑफ ऑल सवालों से भी आंख नहीं चुरानी चाहिए.





