
संसद की गरिमा बनाम सत्ता की सुविधा: एक कठिन सवाल
लोकसभा स्पीकर का बयान और लोकतंत्र की कसौटी
लोकसभा में स्पीकर के बयान और उस पर प्रियंका गांधी की तीखी प्रतिक्रिया ने संसदीय मर्यादा, सत्ता की जवाबदेही और विपक्ष के अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री के सदन में न आने के पीछे दी गई सुरक्षा आशंका, विपक्ष पर लगाए गए आरोप और “काले धब्बे” जैसी भाषा ने लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल खड़े किए हैं। यह संपादकीय विश्लेषण इन्हीं सवालों को संतुलित दृष्टि से परखता है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
संसद की आत्मा और एक असहज बयान
लोकसभा किसी इमारत का नाम नहीं, बल्कि एक परंपरा है। यह वह जगह है जहाँ असहमति भी नियमों के भीतर सम्मान पाती है। ऐसे में जब सदन के सभापति स्वयं यह कहते हैं कि प्रधानमंत्री को इसलिए नहीं बुलाया गया क्योंकि “कुछ भी हो सकता था”, तो सवाल सिर्फ एक दिन की कार्यवाही का नहीं रहता। सवाल यह बन जाता है कि क्या हमारी संस्थाएं डर से संचालित होने लगी हैं। एक आम नागरिक की तरह सोचें। अगर स्कूल का प्रधानाचार्य कहे कि बहस के डर से मुख्य अतिथि को मंच पर नहीं बुलाया गया, तो भरोसा डगमगाता है। संसद में यह डगमगाहट कहीं गहरी चोट करती है।
आशंका का आधार और सत्ता की जिम्मेदारी
स्पीकर का तर्क है कि उन्हें पुख्ता जानकारी मिली थी। यह शब्द भारी है। पुख्ता जानकारी का मतलब क्या केवल आशंका है या कोई ठोस इनपुट। लोकतंत्र में फैसले संकेतों पर नहीं, प्रमाणों पर टिके होते हैं। यदि वाकई खतरा था, तो सुरक्षा व्यवस्था का प्रश्न उठता है, न कि बहस टालने का। प्रधानमंत्री का सदन में आकर जवाब देना कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि जवाबदेही का मूल सिद्धांत है। यहां सत्ता की सहूलियत और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी आमने सामने खड़ी दिखती हैं।
विपक्ष पर आरोप और संवाद की कमी
विपक्ष पर यह कहना कि वे अप्रत्याशित घटना कर सकते थे, एक गंभीर आरोप है। यह आरोप पूरे विपक्षी स्पेस को संदिग्ध ठहराता है। प्रियंका गांधी का प्रतिवाद इसी बिंदु से निकलता है। उनका कहना कि प्रधानमंत्री स्पीकर के पीछे छिप रहे हैं, एक राजनीतिक आरोप है, पर इसके पीछे की भावना को समझना जरूरी है। जब संवाद बंद होता है, तब भाषा तीखी होती है। संसद का काम ही संवाद को खुला रखना है, चाहे स्वर कितने ही असहज क्यों न हों।
“काला धब्बा” और शब्दों की राजनीति
स्पीकर द्वारा विपक्षी आचरण को “काला धब्बा” कहना केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है। शब्द सत्ता की मानसिकता को उजागर करते हैं। संसदीय इतिहास में कई बार हंगामा हुआ, नारे लगे, वॉकआउट हुए। हर बार उसे कलंक कहना एकतरफा दृष्टि होगी। आलोचना और अव्यवस्था में फर्क होता है। यदि फर्क मिटा दिया जाए, तो विरोध अपने आप अपराध बन जाता है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
नेता प्रतिपक्ष की आवाज और लोकतांत्रिक संतुलन
प्रियंका गांधी का एक अहम सवाल है कि नेता प्रतिपक्ष को बोलने से क्यों रोका गया। यह सवाल भावनात्मक नहीं, संरचनात्मक है। संसदीय प्रणाली में सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन नेता प्रतिपक्ष की आवाज से बनता है। यदि वह आवाज बाधित होती है, तो सदन एकतरफा मंच बन जाता है। यह ऐसे ही है जैसे अदालत में बचाव पक्ष को बोलने से रोक दिया जाए। फैसला तब भी आएगा, पर न्याय अधूरा लगेगा।
सुरक्षा बनाम प्रतीकात्मक उपस्थिति
प्रधानमंत्री की उपस्थिति केवल भाषण नहीं, एक प्रतीक है। वह संकेत देती है कि सत्ता सवालों से नहीं डरती। सुरक्षा का प्रश्न वास्तविक हो सकता है, पर सुरक्षा का काम जोखिम को मैनेज करना है, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोकना नहीं। दुनिया भर की संसदों में विरोध, शोर और असहमति के बीच भी शीर्ष नेता सामने आते हैं। यही परंपरा विश्वास पैदा करती है।
स्पीकर की भूमिका और संवैधानिक अपेक्षा
सभापति का पद संवैधानिक है, राजनीतिक नहीं। उनसे अपेक्षा होती है कि वे दोनों पक्षों के बीच पुल बनें, दीवार नहीं। जब स्पीकर की भाषा स्वयं एक पक्ष को कठघरे में खड़ा करे, तो निष्पक्षता पर प्रश्न उठता है। यह कहना कि पोस्टर लाने से सदन नहीं चलेगा, एक व्यावहारिक बात है। पर उसी सांस में पूरे विरोध को अनुचित ठहरा देना संतुलन बिगाड़ देता है।
प्रियंका का हमला: राजनीति या चेतावनी
प्रियंका गांधी के शब्द तीखे हैं, पर उन्हें केवल राजनीतिक हमला कहकर खारिज करना आसान रास्ता होगा। उनका यह कहना कि प्रधानमंत्री में सदन में आने का साहस नहीं था, एक नैरेटिव है। लेकिन इसके पीछे छिपा सवाल यह है कि क्या सत्ता आलोचना से असहज हो रही है। जब आलोचना को साजिश बताया जाने लगे, तो बहस का मैदान सिमट जाता है।
लोकतंत्र की सेहत और छोटे संकेत
लोकतंत्र बड़े फैसलों से नहीं, छोटे संकेतों से कमजोर या मजबूत होता है। एक दिन का स्थगन, एक भाषण का न होना, एक शब्द का चयन। ये सब मिलकर माहौल बनाते हैं। आम नागरिक शायद इन तकनीकी बातों पर ध्यान न दे, पर उसे यह जरूर दिखता है कि नेता एक दूसरे से बात करने को तैयार हैं या नहीं। भरोसा यहीं से बनता या टूटता है।
वैकल्पिक दृष्टि: क्या डर वास्तविक था
एक वैकल्पिक नजरिया यह भी है कि स्पीकर ने सच में स्थिति को विस्फोटक समझा हो। भीड़ का मनोविज्ञान कभी कभी अप्रत्याशित होता है। अगर ऐसा था, तो पारदर्शिता जरूरी थी। खुलकर बताना चाहिए था कि किस तरह की जानकारी थी और कैसे जोखिम आंका गया। गोपनीयता के नाम पर अस्पष्टता अविश्वास पैदा करती है।
संस्थाएं व्यक्तियों से बड़ी होती हैं
प्रधानमंत्री आएं या न आएं, विपक्ष बोले या न बोले, असली मुद्दा यह है कि संस्थाएं कैसे काम कर रही हैं। संसद किसी एक नेता या दल की बपौती नहीं। यह साझा विरासत है। जब हर पक्ष अपने तत्काल फायदे से ऊपर उठकर संस्थागत मर्यादा को देखता है, तभी लोकतंत्र सांस लेता है।
आगे का रास्ता: टकराव नहीं, नियम
इस पूरे प्रकरण से एक सबक निकलता है। टकराव को नियमों से संभाला जाता है, आरोपों से नहीं। स्पीकर को भी और विपक्ष को भी अपने अपने दायरे की याद दिलानी होगी। और सत्ता को यह समझना होगा कि सवालों का सामना करना कमजोरी नहीं, ताकत है।
असहमति से डर नहीं
असहमति लोकतंत्र का शोर है। यह कभी असुविधाजनक होती है, कभी थकाने वाली। पर इसके बिना व्यवस्था चुप हो जाती है। लोकसभा में हुआ यह विवाद एक चेतावनी है। अगर हम डर के आधार पर फैसले लेने लगे, तो परंपराएं धीरे धीरे खोखली हो जाएंगी। सवाल यह नहीं कि किसने क्या कहा। असली सवाल यह है कि क्या हम बहस से भाग रहे हैं।




