यूरोप में 40°C तापमान अक्सर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन जाता है, जबकि भारत के कई हिस्सों में लोग दशकों से ऐसी गर्मी के साथ जीवन जीते आए हैं। इसका कारण केवल तापमान नहीं बल्कि ह्यूमिडिटी, शहरी ढांचा, भवन निर्माण, सामाजिक व्यवहार, स्वास्थ्य तैयारी और सरकारी हीटवेव प्रबंधन है। जलवायु परिवर्तन के दौर में दोनों क्षेत्रों के लिए एक-दूसरे से सीखना अहम होता जा रहा है।
हर वर्ष जैसे ही यूरोप में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंचता है, कई देशों में हेल्थ अलर्ट जारी हो जाते हैं। अस्पतालों में मरीज बढ़ने लगते हैं, सार्वजनिक जीवन प्रभावित होता है और प्रशासन लोगों को घरों में रहने की सलाह देता है। दूसरी ओर भारत के कई शहर दशकों से 40 से 45 डिग्री तापमान झेलते आए हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत में हीटवेव खतरनाक नहीं होती, बल्कि दोनों क्षेत्रों की परिस्थितियां अलग हैं। यही अंतर इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि केवल थर्मामीटर पर दर्ज तापमान किसी हीटवेव की गंभीरता तय नहीं करता। शरीर पर वास्तविक असर कई अन्य कारकों से तय होता है।
मौसम विज्ञान में विशेषज्ञ अक्सर "फील्स लाइक टेम्परेचर" या "हीट इंडेक्स" की बात करते हैं। इसमें तापमान के साथ नमी, हवा की गति और सूर्य के विकिरण का संयुक्त प्रभाव शामिल होता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लोग लंबे समय से तीखी गर्मी के बीच जीवन जीते आए हैं। उनके दैनिक व्यवहार, कपड़े, भोजन और काम करने के समय में मौसम के अनुसार बदलाव देखने को मिलता है। इसके विपरीत यूरोप के अनेक हिस्सों में लंबे समय तक ठंडा मौसम सामान्य रहा है। इसलिए अचानक आने वाली तीव्र गर्मी वहां अधिक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन जाती है।
यूरोप के अधिकांश देशों में आवासीय भवनों का डिज़ाइन सर्द मौसम को ध्यान में रखकर विकसित हुआ। मोटी दीवारें, बेहतर इंसुलेशन और गर्मी को अंदर रोकने वाली संरचना वहां की आवश्यकता रही है। जब बाहरी तापमान 40 डिग्री तक पहुंचता है तो यही संरचना कई बार समस्या बन जाती है। घरों के भीतर गर्मी लंबे समय तक फंसी रहती है। अनेक पुराने भवनों में एयर कंडीशनिंग की व्यवस्था भी सीमित है। परिणामस्वरूप रात के समय भी पर्याप्त राहत नहीं मिलती।
मानव शरीर समय के साथ स्थानीय मौसम के अनुसार स्वयं को कुछ हद तक अनुकूल बना लेता है। वैज्ञानिक इसे हीट अडैप्टेशन या हीट एक्लाइमेटाइजेशन कहते हैं।
यूरोप की आबादी में वरिष्ठ नागरिकों का अनुपात भारत की तुलना में अधिक है। अत्यधिक गर्मी का असर इस वर्ग पर अधिक गंभीर होता है। हृदय रोग, श्वसन संबंधी समस्याएं और पुरानी बीमारियों वाले लोगों में हीट स्ट्रेस तेजी से बढ़ सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि हीटवेव के दौरान मृत्यु के अधिकांश मामलों में बुजुर्ग, अकेले रहने वाले लोग और पहले से बीमार व्यक्ति अधिक प्रभावित होते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई राज्यों और शहरों में Heat Action Plan लागू किए हैं। मौसम विभाग की अग्रिम चेतावनी, स्कूलों के समय में बदलाव, पीने के पानी की व्यवस्था, सार्वजनिक जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य विभाग की तैयारी जैसे कदम धीरे-धीरे मजबूत हुए हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि देशभर में इन योजनाओं का क्रियान्वयन समान स्तर पर नहीं है। कई छोटे शहर और ग्रामीण क्षेत्र अब भी पर्याप्त संसाधनों की कमी से जूझते हैं।
यह मान लेना गलत होगा कि भारत गर्मी का सामना बिना नुकसान के कर लेता है। हर वर्ष भीषण हीटवेव के दौरान अनेक राज्यों में लू लगने, निर्जलीकरण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के मामले सामने आते हैं। बिजली की मांग बढ़ती है, जल संकट गहराता है और कृषि पर असर पड़ता है। इसलिए भारत की चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
पिछले दशक में यूरोप ने कई रिकॉर्ड तोड़ गर्मियां देखी हैं। वहीं भारत में भी हीटवेव की अवधि और तीव्रता बढ़ने के संकेत मिले हैं। जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार वैश्विक तापमान में वृद्धि ने चरम मौसम की घटनाओं की संभावना बढ़ाई है। इसका प्रभाव केवल एक महाद्वीप तक सीमित नहीं है। यही कारण है कि हीटवेव अब केवल मौसम की खबर नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, इकोनॉमी, ऊर्जा, कृषि और शहरी नियोजन से जुड़ा बड़ा नीति विषय बन चुकी है।
यूरोप भारत से सामुदायिक स्तर पर गर्मी से बचाव, सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था, जीवनशैली में समयानुसार बदलाव और कम लागत वाले कूलिंग उपायों से सीख ले सकता है। भारत यूरोप से ऊर्जा दक्ष भवन, शहरी हरित क्षेत्र, वैज्ञानिक शहरी नियोजन, आधुनिक कूलिंग तकनीक और जलवायु अनुकूल इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की दिशा में प्रेरणा ले सकता है। 40°C अपने आप में पूरी कहानी नहीं बताता। असली सवाल यह है कि समाज, शहर, स्वास्थ्य व्यवस्था और लोग उस तापमान का सामना कितनी तैयारी के साथ करते हैं। यूरोप में 40 डिग्री तापमान अधिक घातक दिखने का कारण केवल मौसम नहीं, बल्कि भवन निर्माण, जनसंख्या संरचना, ऐतिहासिक जलवायु, सामाजिक व्यवहार और सार्वजनिक तैयारी का संयुक्त प्रभाव है। वहीं भारत में लंबे अनुभव के बावजूद बढ़ता शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं। हीटवेव अब किसी एक देश की समस्या नहीं रही। बदलती जलवायु के दौर में भारत और यूरोप, दोनों के लिए एक-दूसरे के अनुभवों से सीखना आने वाले वर्षों में लाखों लोगों की सुरक्षा के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।